क्या हालात व्यक्ति को भ्रष्ट होने के लिए मजबूर करते हैं? क्या कोई भ्रष्टाचार के दलदल में गर्दन तक धंसने के बाद स्वयं को बाहर निकाल सकता है और क्या दलदल से बाहर आए व्यक्ति अपनी ईमानदार छवि को पुनर्स्थापित कर सकता है? इन तमाम प्रश्नों का उत्तर है-'हां'! क्योंकि मैंने ऐसा होते देखा है, सुना है और अब आपको बताना चाहता हूं।
आयकर विभाग में एक बड़े अफसर थे- विनोद शर्मा (बदला हुआ नाम)। विनोद जी हद दर्जे के ईमानदार अधिकारी थे, धर्मभीरू थे और रिश्वत का एक पैसा लेना भी पाप समझते थे। मोक्ष के मार्ग में रिश्वत को बाधा के रूप में देखते थे। परमात्मा ने ईमानदार विनोद जी को संतान के रूप में दो बेटियां दी थीं। पत्नी बहुत ही सुशील और आदर्श ग्रहणी थी। जब तक बेटियां छोटी थीं और पढ़ रही थीं तो विनोद जी वेतन से घर चला रहे थे। होनहार बेटियां पढती भी जा रही थीं और बढ़ती भी जा रही थीं। वह समय भी आया जब बेटियां शादी की उम्र में पहुंच गई।
विनोद जी ने लड़कियों के लिए सुयोग्य वर की तलाश शुरू कर दी। अच्छे रिश्ते, महंगे दहेज की मांग के चलते सिरे नहीं चढ़ पा रहे थे। लड़के वालों को लगता था बाप आयकर विभाग में इतना बड़ा अफसर है, तो उसके पास रिश्वत का मोटा माल होगा। लेकिन विनोद जी के मामले में तो उल्टा ही था, उनके पास ईमानदारी तो थी मगर पैसा नहीं था। रिश्ते बहुत आए पर तय एक भी नहीं हुआ।
...और एक दिन डेड ऑनेस्ट विनोद जी ने बेईमान होने का फैसला कर लिया। विनोद जी ने हर छोटे बड़े काम करने की एवज में मोटी रिश्वत लेना शुरू कर दिया। जिस शहर में तबादला हुआ वहीं, मोटी रिश्वत ली। दो-तीन साल की 'मेहनत' से विनोद जी ने लाखों रुपए जुटा लिए और बेटियों के रिश्ते तलाशने शुरू किए। कम समय में बढ़िया रिश्ते मिल गए। दोनों बेटियों की शादी में विनोद जी ने पानी की तरह पैसा बहाया। 'रिश्वत बटोरो अभियान' के चार साल में विनोद जी ने अपनी दोनों बेटियों को विदेश में उच्च शिक्षा भी दिलाई थी, जिससे आसानी से कुछ ज्यादा ही अच्छे रिश्ते मिले। विनोद जी प्रसन्न थे। उनकी जिम्मेदारी पूरी हो गई थी।
बेटियों के हाथ पीले करने के तीन माह बाद विनोद जी एक बार फिर अपने मूल रूप में आ गए। पूर्व की भांति विनोद जी ने एक पैसा रिश्वत लेना भी हराम माना, पाप समझा और रिश्वत लेने के पाप के प्रायश्चित के रूप में विनोद जी ने रिटायर होने तक एक नया पैसा भी रिश्वत के रूप में स्वीकार नहीं किया। रिटायर होने के बाद विनोद जी ने एक प्राइवेट कंपनी में जॉब तलाश किया क्योंकि बैठकर खाने के लिए उनके पास पैसा नहीं था। फंड की सारी राशि उन्होंने फ्लैट खरीदने में लगा दी और पेंशन से वे बेटियों को तीज त्यौहार पर उपहार देते रहे यह कहानी बहुत कुछ कहती है, नहीं क्या?