भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने देश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को फिर चर्चा में ला दिया है। आखिर भारत के किन तीन कालजयी ग्रंथों को मिली यह खास पहचान और इसके बाद देश के खाते में कौन सी नई उपलब्धि जुड़ गई? जानिए पूरी खबर।

National News : भारत की हजारों साल पुरानी ज्ञान, साहित्य और संस्कृति की विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक और बड़ी पहचान मिली है। दुनिया के सबसे चर्चित महाकाव्यों में शामिल महाभारत, प्राचीन भारतीय शासन व्यवस्था, कूटनीति का ज्ञान देने वाला कौटिल्य का अर्थशास्त्र और कश्मीर के इतिहास को समेटे कल्हण की राजतरंगिणी को यूनेस्को (UNESCO) ने अपने मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल किया है। इस उपलब्धि को भारत की ऐतिहासिक और बौद्धिक विरासत के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खास बात यह है कि इन तीनों कृतियों के शामिल होने के बाद इस क्षेत्रीय रजिस्टर में भारत की प्रविष्टियों की संख्या बढ़कर छह हो गई है।
इन तीनों ऐतिहासिक कृतियों को यूनेस्को के क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल करने का फैसला इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कमेटी फॉर एशिया एंड द पैसिफिक (MOWCAP) के 11वें सत्र में लिया गया। इसकी जानकारी इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने दी। इन तीनों कृतियों को रजिस्टर में शामिल कराने के लिए नामांकन से जुड़े दस्तावेज तैयार करने में IGNCA ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संस्कृति मंत्रालय की ओर से भी इस उपलब्धि को भारत की सभ्यतागत विरासत के लिए गर्व का क्षण बताया गया है।
महाभारत भारतीय साहित्य और दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है। परंपरागत रूप से महर्षि वेदव्यास को इसका रचयिता माना जाता है। यह केवल कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें धर्म, कर्तव्य, न्याय, सत्ता, नैतिकता और मानवीय संबंधों से जुड़े गहरे विचार भी मिलते हैं। महाभारत का ही महत्वपूर्ण हिस्सा भगवद्गीता है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म, धर्म और जीवन के उद्देश्य का संदेश दिया है। इस महाकाव्य की दार्शनिक और सांस्कृतिक महत्ता ने इसे दक्षिण एशिया की साझा विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। यूनेस्को के क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल महाभारत की विशेष पांडुलिपि भोजपत्र पर लिखी गई है और यह पुणे स्थित भंडारकर प्राच्यविद्या अनुसंधान संस्थान में संरक्षित है।
आचार्य कौटिल्य, जिन्हें चाणक्य के नाम से भी जाना जाता है, द्वारा रचित अर्थशास्त्र प्राचीन भारत की राजनीतिक और प्रशासनिक सोच का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इस ग्रंथ में शासन व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, कर प्रणाली, कूटनीति, विदेश नीति, सैन्य रणनीति और राज्य संचालन से जुड़े विस्तृत सिद्धांत दिए गए हैं। अर्थशास्त्र को केवल आर्थिक विषयों की पुस्तक समझना गलत होगा। इसमें एक मजबूत राज्य की स्थापना, प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावी बनाने और विभिन्न परिस्थितियों में रणनीतिक निर्णय लेने के तरीके भी बताए गए हैं। यूनेस्को में शामिल इस कृति की प्राचीन ताड़पत्र पांडुलिपि मैसूर स्थित ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में संरक्षित है।
12वीं शताब्दी में कश्मीरी इतिहासकार कल्हण द्वारा संस्कृत भाषा में रचित राजतरंगिणी को भारतीय इतिहास लेखन की महत्वपूर्ण कृतियों में गिना जाता है। इस ग्रंथ में कश्मीर के राजाओं, उनके शासनकाल, राजनीतिक घटनाओं और उस दौर के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का क्रमबद्ध विवरण मिलता है। राजतरंगिणी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें इतिहास को दर्ज करते समय पुराने वृत्तांतों, परंपराओं और उपलब्ध साक्ष्यों का सहारा लिया गया है। यही वजह है कि इसे कश्मीर के ऐतिहासिक अध्ययन का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। इस पांडुलिपि का संरक्षण श्रीनगर के श्री प्रताप सिंह पुस्तकालय परिसर स्थित ओरिएंटल रिसर्च लाइब्रेरी में किया गया है।
यूनेस्को के मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में भारत की तीन अन्य ऐतिहासिक और साहित्यिक रचनाओं को वर्ष 2024 में शामिल किया गया था। इनमें तुलसीदास की रामचरितमानस, पंचतंत्र और भारतीय काव्यशास्त्र से जुड़ा सहृदयालोक-लोचन शामिल हैं। अब महाभारत, अर्थशास्त्र और राजतरंगिणी को भी इस सूची में जगह मिलने के बाद भारत की कुल प्रविष्टियों की संख्या छह हो गई है।
यूनेस्को का मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कार्यक्रम दुनिया की महत्वपूर्ण दस्तावेजी विरासत को संरक्षित करने और उसके महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से चलाया जाता है। इसके तहत ऐसी पांडुलिपियों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और अन्य अभिलेखीय धरोहरों को पहचान दी जाती है, जिनका मानवता के इतिहास और ज्ञान पर महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल ऐतिहासिक दस्तावेजों को पहचान देना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखना, उनके संरक्षण को बढ़ावा देना और आने वाली पीढ़ियों तक उनके ज्ञान को पहुंचाना भी है। भारत की इन तीनों कृतियों को एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में मिली मान्यता देश की प्राचीन साहित्यिक, ऐतिहासिक और बौद्धिक परंपराओं के अंतरराष्ट्रीय महत्व को दर्शाती है।
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