
Uttrakhand Sthapna Diwas : आज उत्तर प्रदेश के छोटे भाई यानि कि उत्तराखंड राज्य की स्थापना दिवस है। आपको बता दें कि आज से 23 साल पहले तक जब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था, तब यहां के नेताओं पर प्रदेश की राजधानी लखनऊ जाने के लिए पैसे नहीं होते थे। लखनऊ से ही उनके टिकट कराए जाते थे और तब वह बमुश्किल वहां पहुंचते थे। लेकिन जब पहुंचते थे तो उनकी सुनवाई होती थी और जिस भी दफ्तर में जाते थे सबसे पहले उनके काम होते थे।
यह दो दशक पहले की बात है। उसके बाद कहा जाने लगा कि उत्तर प्रदेश में पहाड़ के लोगों की सुनवाई नहीं होती। यह तथाकथित बात उत्तराखंड के नेताओं ने अफवाह के तौर पर खूब फैलाई। उन्हीं नेताओं ने जिनको लखनऊ जाने पर टिकट के पैसे मिलते थे और उनके काम भी होते थे। लेकिन दर्द उनका यह रहता था कि उनको सत्ता की मलाई नहीं मिल रही थी।
उत्तर प्रदेश से अलग राज्य गठन का आंदोलन चलाया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में 40 लोगों की बलि ले ली गई, हालांकि उसके बाद 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग नए राज्य उत्तरांचल जो बाद में उत्तराखंड बना का गठन हो गया। पिछले 23 सालों में यहां का विकास हुआ हो या ना हुआ हो लेकिन नेताओं का विकास जरूर हुआ। जो नेता उत्तर प्रदेश के रहते ग्राम प्रधान तक नहीं बन पाते थे वह विधायक बन गए और जो विधायक नहीं बन पाते थे वह मंत्री और मुख्यमंत्री बन गए। अपने- अपने गुट बन गए। कहीं कुमाऊंवाद तो कहीं गढ़वालवाद, कहीं ठाकुरवाद तो कहीं ब्राह्मणवाद, कहीं मैदानवाद तो कहीं पहाड़वाद। यही वाद विवाद उत्तराखंड के विकास में बाधक बन गए।
नेता चेहरे बदलते रहे चोला बदलते रहे। जो लोग पहले कांग्रेस में थे वह भाजपा के हो गए। जो भाजपा के थे वह कांग्रेस में चले गए। क्योंकि सबके अपने-अपने हित थे अपनी अपनी झोली भरनी थी। जनता का पेट काटना था। पिछले 23 सालों से उत्तराखंड के नेता यही तो करते आ रहे हैं।
पहले एक मुख्यमंत्री नौचमी नारायण ऐसे बने जिन्होंने लाल बत्तियां रेवड़ी की तरह बांटी। हालात यह हो गये कि एक 18 साल की खूबसूरत बाला जब उनके सामने मुस्कुराती आती तो बदले में वह लाल बत्ती पा जाती। लेकिन जनता को क्या मिला ? लॉलीपॉप मिला। जो पिछले 23 सालों से मिलता ही आ रहा है। कभी वादों में, तो कभी घोषणाओं में। कभी फाइलों में तो कभी पार्टी के घोषणापत्रों में।
ऐसा नहीं है कि कुछ हुआ नहीं। 23 साल में बहुत बड़ी-बड़ी बातें हुई। कहा गया कि हम पहाड़ी राज्य बनाएंगे। पहाड़ी राज्य की राजधानी पहाड़ में होगी। पहाड़ी एक पहाड़ी का दर्द समझेगा और उनकी समस्याएं सुलझाई जायेगी। लेकिन ना तो पहाड़ी राज्य ही बन पाया ना ही पहाड़ी राजधानी बन पाई। चौंकाने वाली बात यह रही कि एक पहाड़ी दूसरे पहाड़ी का दर्द तक नहीं समझ पाया। तब जब अधिकारी भी पहाडी और नेता भी पहाडी। फल स्वरूप समस्याएं जस की तस रही। अच्छे स्कूल बने नहीं, सरकारी स्कूलों में पढाई होती नहीं। अस्पतालों में डाक्टर नही। ना पहाड़ों में उद्योग लगे और ना ही पहाड़ों की खेती फसलों को बर्बाद कर रहे जानवरों पर अंकुश लगा। पहाड़ी लोग खेती छोड़ नोएडा, गाजियाबाद, दिल्ली, मुम्बई की प्रदूषित जिंदगी में प्रवेश कर गए, क्योंकि पापी पेट का जो सवाल ठहरा।
आज हालात यह है कि पहाड़ खाली हो रहे हैं। पिछले 23 साल में अब तक 12 लाख लोग अपने अपने घरों को छोड़ रोजी रोटी को विदेश में निकल गए। घरों में है तो वह बूढ़ी आमा जो हर शनिवार को इस उम्मीद में लगी रहती है शायद इस बार का इतवार वह अपने बेटे के साथ नाती- पोतों के साथ मनाएगी। लेकिन वह इतवार आमा की जिंदगी में शायद कभी नहीं आता। उसका बेटा शहर से 1 दिन आता तो सिर्फ उसकी अर्थी को कंधा देने ही आता है।
यह वही उत्तराखंड है जहां के नेता मुख्यमंत्री बनने से पहले लोगों को बड़ा बड़ा सपना दिखाते हैं। लेकिन जब मुख्यमंत्री बन जाते हैं तो अपनी-अपनी ढपली बजाते हैं। अपना-अपना फायदा उठाते हैं और जेब भरकर अपने चले जाते हैं। ऐसा ही एक मुख्यमंत्री बना जो अपने बेटे को और एक टकले को इस प्रदेश को लूटने के लिए देकर दिल्ली में अट्टहास करता रहा। प्रदेश लूटता रहा यहां तक कि 2017 की आपदा में 10 हजार लोग अपनी जान गवां बैठे, लेकिन वह संवेदनहीन सत्ता का लालची उन लोगों के दर्द पर मरहम तक नहीं लगा पाया। उससे पहले जो इस प्रदेश का हुकुमरान बना वह कहीं सिरगुटिया में तो कहीं कुंभ के मेले में घोटाला कर गोवा में शानदार होटल बना गया। उससे पहले वाला बेशक ईमानदार था, लेकिन उसके शासनकाल में एक सारंगी ने ऐसी भ्रष्टाचार की धुन बजाई जिसने प्रदेश में घपले घोटाले के नई परंपरा चलाई।
दुर्भाग्य देखिए कि अब तक इस प्रदेश के जितने भी मुखिया बने सभी आईएएस अधिकारियों की हाथों की कठपुतली बनकर रह गए। एक शर्मा पहले था जिसको प्रदेश को भ्रष्टाचार का घुन लगाने में कोई शर्म नहीं आती थी। यही नहीं बल्कि वह बड़ी बेशर्मी से प्रदेश के मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को भी इस काली करतूत में शामिल कर लेता था। वह बताता था कि घोटाला कहां कहां होता है और उसके कहे अनुसार घोटाले होते चले गए और उत्तराखंड एक घोटाला प्रदेश के रूप में चर्चित हो गया। शर्मा से शुरू हुआ यह सिलसिला आज भी जारी है। तब शर्मा था तो आज एक बिहारी है। यह बिहारी अधिकारी मुख्यमंत्री को अपनी उंगली पर नचा रहा है और उधर मुख्यमंत्री "हरी घास" की खुशबू में सब सुध- बुध खो बैठे हैं।
प्रदेश में जनता त्राहिमाम कर रही है, लेकिन मुख्यमंत्री नशे की आगोश में है। जनता जब दर्द से ज्यादा चिल्लाती है तो उसे भी भांग पैदा करने की हिदायत दे दी जाती है। आखिर पहाड़ियों को नशेड़ी जो बनाने का अभियान चलाया हुआ है। शायद यही वजह है कि "सूर्य अस्त- पहाड़ी मस्त और प्रदेश अस्त-व्यस्त" ही अब उत्तराखंड का नारा और बदकिस्मती बन गई है। Uttrakhand Sthapna Diwas