
Waqf : वक्फ अधिनियम के हालिया संशोधन को चुनौती देने वाली पांच याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिवक्ता और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उच्चतम न्यायालय में एक के बाद एक मजबूत और व्यावहारिक दलीलें पेश कीं। उन्होंने अदालत को यह समझाने की कोशिश की कि वक्फ की अवधारणा चाहे जितनी धार्मिक क्यों न हो, लेकिन ज़मीन जैसे संसाधनों पर इससे जुड़ी प्रक्रियाएं पूरी तरह से कानूनी रूप से नियंत्रित हैं।
SG ने अपने तर्कों की शुरुआत करते हुए यह स्पष्ट किया कि वक्फ बनाना और वक्फ को किसी उद्देश्य के लिए दान देना, ये दोनों प्रक्रियाएं एक जैसी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि, “किसी भी गलत मंशा को रोकने के लिए वक्फ बनाने से पहले मुस्लिम समुदाय के व्यक्ति के पास कम से कम पांच साल की धार्मिक प्रैक्टिस होना ज़रूरी है। यह नियम इसलिए बना है ताकि कोई कानून की आड़ में दूसरों की संपत्ति पर अनुचित दावा न कर सके।”
मेहता ने कोर्ट को यह भी समझाया कि यदि कोई जमीन सरकारी है या विशेष रूप से संरक्षित श्रेणी (जैसे आदिवासी भूमि) में आती है, तो उसे केवल वक्फ घोषित कर देने से उस पर सरकार या समुदाय के वैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो सकते। “मैं आदिवासी ज़मीन नहीं खरीद सकता क्योंकि राज्य कानून इसकी अनुमति नहीं देता, तो फिर कोई वक्फ के नाम पर ऐसी ज़मीन कैसे ले सकता है?” — उन्होंने तीखे लहज़े में सवाल उठाया।
SG मेहता ने कोर्ट से आग्रह किया कि अंतिम निर्णय से पहले किसी तरह की अंतरिम रोक न लगाई जाए। उन्होंने चेताया कि अगर इस बीच कोई संपत्ति वक्फ के नाम हो जाती है, तो फिर उसे कानूनी रूप से वापस लेना लगभग असंभव हो जाएगा, क्योंकि वक्फ को एक बार ‘अल्लाह की संपत्ति’ मान लिया जाए, तो उसके खिलाफ कार्यवाही बेहद जटिल हो जाती है।
राजस्थान सरकार के वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने भी केंद्र के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि “वक्फ बाय यूजर” इस्लाम की मूल शिक्षाओं का हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा कि यह परंपरा भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर मान्य नहीं है और सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले में भी इसे तीन बार खारिज किया गया है।
SG ने बताया कि वर्ष 1923 से लेकर 2013 तक वक्फ बनाने का अधिकार केवल मुस्लिमों तक सीमित था। 2013 में इसे बदलते हुए 'कोई भी व्यक्ति' शब्द जोड़ा गया, लेकिन वर्तमान संशोधन में इसे फिर से हटा दिया गया है। मेहता ने यह भी कहा कि यदि कोई हिंदू व्यक्ति मस्जिद बनाना चाहता है तो वह इसे वक्फ घोषित किए बिना भी सार्वजनिक ट्रस्ट के माध्यम से बना सकता है, जैसा कि बॉम्बे ट्रस्ट अधिनियम में प्रावधान है।
SG ने जनजातीय क्षेत्रों में वक्फ के ज़रिए जमीन हड़पने की शिकायतों का उल्लेख करते हुए कहा कि “अगर कोई मुस्लिम शरिया कानून के तहत निजी अधिकार चाहता है, तो उसे पहले यह साबित करना होता है कि वह मुसलमान है। वक्फ मामलों में भी यही सिद्धांत लागू होना चाहिए।”
मेहता ने अदालत से कहा कि यह मामला केवल वैचारिक बहस नहीं है, बल्कि इसमें व्यावहारिक और प्रशासनिक समस्याएं जुड़ी हैं, जिनका हल खोजा जाना ज़रूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका इरादा वक्फ अधिनियम 1995 को चुनौती देने का नहीं है, लेकिन यदि अदालत याचिकाओं को उच्च न्यायालय भेजने पर विचार कर रही है, तो फिर सभी याचिकाकर्ताओं को समान रूप से भेजा जाना चाहिए।
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