भारत के मैदानी इलाकों में तरबूज की बुवाई का उत्तम समय फरवरी और मार्च का महीना है,लगभग ₹30,000 की लागत में आप अच्छी मात्रा में तरबूज की खेती कर सकते हैं, उत्तर-पूर्वी और पश्चिमी भारत में नवंबर से जनवरी के बीच बुवाई की जाती है, जबकि महाराष्ट्र में दिसंबर-जनवरी में इसकी खेती शुरू होती है।

Watermelon Cultivation: देश में गर्मियों के मौसम की शुरुआत हो चुकी है और इस दौरान किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर तरबूज की खेती की जा रही है। जो कि लगभग ₹30,000 की लागत में आप अच्छी मात्रा में तरबूज की खेती कर सकते हैं। गर्मी के मौसम में तरबूज की बाजार में भारी मांग रहती है, जिसे देखते हुए किसान इस फसल को अच्छा खासा मुनाफा देने वाला माना जाता है।अन्य फलों की तुलना में तरबूज की खेती में कम समय, कम खाद और कम पानी की आवश्यकता होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, उचित तरीके से और बड़े पैमाने पर खेती करने पर यह आय का एक बेहतरीन स्रोत बन सकता है।
बता दें कि तरबूज एक गर्मियों का फल है जिसकी मांग पूरे साल रहती है। इसकी खेती में शुरुआती लागत बहुत ज्यादा नहीं है, और यदि सही तरीके से की जाए तो यह बहुत लाभकारी साबित हो सकती है। लगभग ₹30,000 की लागत में आप अच्छी मात्रा में तरबूज की खेती कर सकते हैं। इसमें बीज, खाद, सिंचाई, और अन्य आवश्यक संसाधन शामिल हैं। यदि आप इस फसल की सही देखरेख करते हैं, तो 3 से 4 महीने के अंदर ही आप 4 से 5 लाख रुपये तक की कमाई कर सकते हैं।
बता दें कि भारत के मैदानी इलाकों में तरबूज की बुवाई का उत्तम समय फरवरी और मार्च का महीना है, जिससे गर्मियों में फल मिलते हैं। हालांकि, उत्तर-पूर्वी और पश्चिमी भारत में नवंबर से जनवरी के बीच बुवाई की जाती है, जबकि महाराष्ट्र में दिसंबर-जनवरी में इसकी खेती शुरू होती है। इसकी खेती के लिए 25 से 32 डिग्री सेल्सियस का तापमान और रेतीली या रेतीली दोमट भूमि सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
बता दें कि उच्च उपज के लिए खेत की तैयारी बेहद महत्वपूर्ण है। खेत को प्लाउ की सहायता से जोतकर खरपतवारों और कीटों को नष्ट किया जाता है, जिसके बाद हैरो से जुताई कर भूमि को समतल बनाया जाता है। पौधों को मजबूती देने के लिए पॉलिथीन बैग या ट्रे में नर्सरी तैयार की जाती है, जिसमें काली मिट्टी, बालू और गोबर की खाद को 1:1:1 के अनुपात में मिलाया जाता है। लगभग 12 दिन पुराने पौधों को मुख्य खेत में रोपा जाता है।
बता दें कि रोपाई के लिए 1.2 मीटर चौड़ी और 30 सेमी ऊंची क्यारियां बनाई जाती हैं। बुवाई से पहले खरपतवारनाशी दवाओं का छिड़काव करना लाभदायक रहता है। खेत की अंतिम जुताई के समय 8 टन गोबर की सड़ी खाद, 1 किलोग्राम एजोस्पिरिलम, 1 किलोग्राम फॉस्फोबैक्टीरिया और 40 किलोग्राम नीम केक का उपयोग किया जाता है। फसल के 10-20 दिन बाद 22-22 किलोग्राम फोस्फोरस, यूरिया और पोटाश देने की सिफारिश की गई है, जिसे फर्टिगेशन के जरिए भी दिया जा सकता है।
तरबूज की खेती में पानी की बचत के लिए ड्रिप सिंचाई प्रणाली को सबसे बेहतर माना जाता है। इससे फसल को समान मात्रा में नमी मिलती है। बुवाई के 78-90 दिन बाद तरबूज पकने लगते हैं और इन्हें कैंची या चाकू की मदद से काटा जाता है। किसानों को सलाह दी जाती है कि कटाई के बाद फसल के अवशेषों को नष्ट कर दें और मिट्टी के क्षय को रोकने के लिए फसल चक्र का पालन करें। गर्मियों में डिहाइड्रेशन से बचने के लिए लोगों द्वारा तरबूज के अधिक सेवन किए जाने के कारण किसानों का मुनाफा लाखों में पहुंच सकता है। Watermelon Cultivation