
बिहार विधानसभा चुनाव का माहौल गरम है और महागठबंधन आज (28 अक्टूबर) शाम को अपना घोषणा पत्र जारी करने जा रहा है। पहले चरण की वोटिंग 6 नवंबर को होगी, ऐसे में सियासी पारा चढ़ा हुआ है। माना जा रहा है कि इस घोषणा पत्र में बेरोजगारी, महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, पेंशन योजना, कृषि सुधार, कानून-व्यवस्था और कर्जमाफी जैसे मुद्दे प्रमुख रहेंगे। लेकिन असली सवाल यह है क्या राजनीतिक दल अपने घोषणा पत्र में जो चाहें, वो वादा कर सकते हैं? इन वादों की निगरानी कौन करता है और अगर इन्हें पूरा न किया जाए तो क्या कोई जवाबदेही तय होती है? Bihar Elections 2025
दरअसल, घोषणा पत्र किसी भी पार्टी का राजनीतिक आईना होता है, जिसमें उसकी विचारधारा, नीतियां और जनता के प्रति वादे झलकते हैं। मतदाता इन्हीं वादों के आधार पर तय करते हैं कि किस पर भरोसा किया जाए। पर अक्सर ऐसा होता है कि सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने के बाद कई वादे कागज़ों में ही दबकर रह जाते हैं। हालांकि, राजनीतिक दलों की मनमानी पर पूरी तरह लगाम लगाने की ज़िम्मेदारी चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों से तय होती है, ताकि लोकतंत्र में चुनावी वादे केवल ‘जुमला’ बनकर न रह जाएं। Bihar Elections 2025
हर चुनाव से पहले पार्टियों का घोषणा पत्र जनता के सपनों से भरा होता है कोई मुफ्त बिजली का वादा करता है, तो कोई युवाओं को नौकरी और किसानों को कर्जमाफी का भरोसा देता है। लेकिन क्या ये वादे कानूनी तौर पर बंधे हुए होते हैं? जवाब है नहीं। राजनीतिक दल अपनी मर्ज़ी से कोई भी वादा नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 में चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि सभी दलों को एक जैसी प्रतिस्पर्धा का मौका देने और वोटरों को भ्रमित होने से बचाने के लिए चुनावी घोषणा पत्र को लेकर ठोस दिशानिर्देश (Guidelines) तय किए जाएं। Bihar Elections 2025
इसके बाद चुनाव आयोग ने यह व्यवस्था की कि घोषणा पत्र अब आचार संहिता (Model Code of Conduct) का हिस्सा माना जाएगा। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनावी वादे भले ही आरपी एक्ट की धारा 123 के तहत “भ्रष्ट आचरण” (Corrupt Practice) की श्रेणी में नहीं आते, पर ‘फ्रीबीज’ या मुफ्त चीज़ें बांटने के वादे मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं। Bihar Elections 2025
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव आयोग ने देशभर की राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों से चर्चा कर एक स्पष्ट रूपरेखा तय की ताकि चुनावी घोषणाएं सिर्फ आकर्षक नारे बनकर न रह जाएं, बल्कि जिम्मेदारी से भरे वादे साबित हों।
इन दिशा-निर्देशों की सबसे अहम शर्त यह है कि कोई भी पार्टी अपने घोषणा पत्र में ऐसा कोई वादा शामिल नहीं कर सकती जो संविधान की मूल भावना या कानून के दायरे से बाहर हो। समय-समय पर यह देखा गया कि नेता जनता को सीधे आर्थिक लाभ देने वाले वादे करने लगे जैसे मुफ्त योजनाएं, नगद सहायता या कर्जमाफी।
ऐसी प्रवृत्तियों पर रोक लगाने के लिए चुनाव आयोग ने 2019 में नया आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया कि पार्टियां अपने घोषणा पत्र में यह स्पष्ट करें कि वादों को पूरा करने के लिए धन कहां से आएगा और उसका वित्तीय प्रबंधन कैसे होगा। आयोग ने यह भी हिदायत दी कि सिर्फ वही वादे किए जाएं जो व्यावहारिक हों और पूरे किए जा सकें, ताकि मतदाता भ्रमित न हों और लोकतंत्र में भरोसा कायम रहे।
यह सबसे अहम और दिलचस्प सवाल है अगर कोई राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद अपने चुनावी वादे पूरे नहीं करता, तो क्या उसे सजा मिलती है? जवाब है नहीं। दरअसल, भारतीय कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी पार्टी को घोषणा पत्र के वादों को कानूनी तौर पर पूरा करने के लिए बाध्य करे। कई बार नागरिकों ने अदालतों का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन हर बार नतीजा यही निकला राजनीतिक वादे कानून की नहीं, बल्कि नैतिकता की ज़िम्मेदारी हैं।
यह भी सच है कि चुनाव के बाद जब वादे अधूरे रह जाते हैं, तो जनता में नाराजगी तो होती है, लेकिन अदालत इन मामलों में सीधी कार्रवाई नहीं कर सकती। कानून के दायरे में घोषणा पत्र को एक राजनीतिक दृष्टि-पत्र (Vision Document) माना जाता है न कि कोई कानूनी अनुबंध। इसलिए, अगर पार्टी अपने वादे निभाने में असफल रहती है, तो उसकी सबसे बड़ी सजा जनता का अविश्वास होती है, जो अगले चुनाव में वोट के रूप में साफ झलकता है।
चुनावी वादों को लेकर अदालतों के दरवाज़े भी कई बार खटखटाए गए, लेकिन अब तक किसी राजनीतिक दल को इस आधार पर सज़ा नहीं मिली है। साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट में वकील मिथिलेश कुमार पांडे ने एक जनहित याचिका (PIL) दायर की थी। इसमें मांग की गई थी कि अगर कोई पार्टी अपने घोषणा पत्र में किए वादे पूरे नहीं करती, तो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एच.एल. दत्तू और न्यायमूर्ति अमिताव रॉय की पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ पूछा क्या कोई ऐसा कानून है जो घोषणा पत्र के वादों को कानूनी रूप से लागू करने योग्य बनाता है? जवाब में स्पष्ट किया गया कि घोषणा पत्र एक राजनीतिक घोषणा है, कानूनी अनुबंध नहीं। यह केवल किसी पार्टी की नीतियों और विचारधारा को जनता के सामने रखने का माध्यम है। Bihar Elections 2025
साल 2022 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी ऐसा ही मामला सामने आया। याचिका में आरोप था कि भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में किए वादे पूरे नहीं किए, इसलिए पार्टी पर आपराधिक मामला दर्ज किया जाए। मगर अदालत ने दो टूक कह दिया घोषणा पत्र में किए वादे पूरे न करना अपराध नहीं है। न्यायमूर्ति दिनेश पाठक ने अपने फैसले में लिखा कि राजनीतिक घोषणा पत्र केवल विचार, नीति और दृष्टिकोण का बयान है, इसे अदालत के ज़रिए लागू नहीं कराया जा सकता। Bihar Elections 2025