मनपा नतीजों से बदली महाराष्ट्र की सियासी तस्वीर, खिला कमल

महाराष्ट्र की 29 महानगरपालिकाओं के चुनाव में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सबसे बड़ी पार्टी के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। सीएम फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा ने 25 नगर निगमों में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। इस जीत के साथ ही राज्य की राजनीति में फडणवीस का कद और ऊंचा हो गया है।

Devendra Fadnavis in BJP's victory
भाजपा की जीत में देवेंद्र फडणवीस (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar17 Jan 2026 11:29 AM
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चुनावी नतीजों के मुताबिक नागपुर, मुंबई, नवी मुंबई, मीरा-भाईंदर सहित करीब 20 महानगरपालिकाओं में बीजेपी ने दमदार प्रदर्शन किया। इसके अलावा पनवेल, जालना, नांदेड़, धुलिया, सोलापुर, इचलकरंजी, जलगांव, नाशिक, पुणे, पिंपरी-चिंचवड, संभाजीनगर और सांगली जैसी प्रमुख महानगरपालिकाओं में भी भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज की है।

शिंदे और अजित के गढ़ में सेंध

बता दें कि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का अपने गढ़ ठाणे में प्रदर्शन मिला-जुला रहा है। हालांकि वे ठाणे मनपा में अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल रहे, लेकिन पार्टी को अपेक्षित बढ़त नहीं मिल सकी। वहीं, शरद पवार के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले उपमुख्यमंत्री अजित पवार अपने गढ़ पुणे और पिंपरी-चिंचवड को बचाने में नाकाम रहे है।

मुंबई में महायुति को बहुमत

मुंबई महानगरपालिका में भाजपा और शिंदे गुट की शिवसेना ने मिलकर बहुमत हासिल किया है। वसई-विरार में भले ही बहुजन विकास आघाड़ी को बहुमत मिला हो, लेकिन भाजपा ने वहां भी अपनी स्थिति पहले से बेहतर की है। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं में खासा उत्साह देखा जा रहा है।

महायुति का सबसे बड़ा चेहरा बने फडणवीस

महानगरपालिका चुनावों में मिली इस सफलता के बाद देवेंद्र फडणवीस महायुति के सबसे प्रभावशाली नेता के रूप में उभरकर सामने आए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा सरकार में नेतृत्व को लेकर शिंदे और अजित पवार के पास फिलहाल कोई मजबूत विकल्प नहीं है।

अमृता फडणवीस ने जताई खुशी

मुख्यमंत्री की पत्नी अमृता फडणवीस ने चुनावी जीत पर खुशी जताते हुए कहा कि युवाओं ने गुड गवर्नेंस और विकास के नाम पर वोट किया है। उन्होंने देवेंद्र फडणवीस को महाराष्ट्र का ‘इंफ्रा मैन’ बताते हुए कहा कि वे समाज के हर वर्ग के प्रति जिम्मेदार हैं और यही बात उनकी नीतियों में भी साफ दिखाई देती है। हानगरपालिका चुनावों के नतीजों ने न केवल भाजपा की संगठनात्मक मजबूती को दिखाया है, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में देवेंद्र फडणवीस को एक बार फिर केंद्र में ला खड़ा किया है।

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26 जनवरी को ही क्यों लागू हुआ संविधान? चौंका देगा इतिहास

Republic Day: भारत हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाता है। यह दिन हमारे संविधान के लागू होने और भारत के लोकतंत्र बनने का प्रतीक है। संविधान 26 नवंबर 1949 को तैयार हुआ और दो महीने बाद 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया ताकि पूर्ण स्वराज की भावना और स्वतंत्रता संग्राम की याद बनी रहे।

Bhartiya Samvidhan
Constitution of India
locationभारत
userअसमीना
calendar17 Jan 2026 12:09 PM
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भारत हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाता है। यह दिन सिर्फ एक राष्ट्रीय अवकाश नहीं है बल्कि हमारे लोकतंत्र और संविधान का जश्न है। भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ लेकिन देश 26 जनवरी 1950 को ही संविधान अपनाकर औपचारिक रूप से गणतंत्र बना। अक्सर लोगों को यह सवाल होता है कि संविधान 26 नवंबर 1949 को तो तैयार हो गया था लेकिन इसे लागू करने में दो महीने क्यों लगे? इस सवाल का जवाब भारत की आजादी और स्वराज के आंदोलन से जुड़ा है।

संविधान 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया

भारत का संविधान एक लिखित दस्तावेज है जिसे तैयार करने में लगभग 2 साल, 11 महीने और 18 दिन लगे। इसका श्रेय डॉ. भीमराव अंबेडकर और संविधान सभा के सदस्यों को जाता है जिन्होंने देश के लिए एक मजबूत और आधुनिक संविधान तैयार किया। संविधान 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा में पारित किया गया और आधिकारिक रूप से अपनाया गया। इस दिन को भारत के लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

26 जनवरी 1950 को संविधान लागू क्यों हुआ?

संविधान अपनाए जाने के दो महीने बाद ही यानी 26 जनवरी 1950 को इसे लागू किया गया। इसकी खास वजह यह थी कि 1930 में 26 जनवरी को लाहौर अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज (Complete Independence) की घोषणा की थी। इस ऐतिहासिक तारीख को चुनकर भारत ने यह संदेश दिया कि आजादी सिर्फ ब्रिटिश शासन से मुक्ति नहीं है, बल्कि देश ने अपने संविधान के साथ लोकतांत्रिक शासन की नींव भी रखी।

गणतंत्र दिवस का इतिहास

26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ ही भारत ने गणराज्य बनने की घोषणा की। इस दिन भारतीय राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया और देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुरुआत हुई। इसके बाद से 26 जनवरी को राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया गया और इसे हर साल गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

गणतंत्र दिवस क्यों मनाया जाता है?

गणतंत्र दिवस हमें याद दिलाता है कि भारत का संविधान लागू हो चुका है और अब हर नागरिक के अधिकार और कर्तव्य सुनिश्चित हैं। यह दिन न्याय, स्वतंत्रता और समानता का प्रतीक है। साथ ही यह दिन हमें यह भी याद दिलाता है कि देश की स्वतंत्रता केवल ब्रिटिश शासन से मुक्ति नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक शासन और संविधान की गारंटी भी है।

गणतंत्र दिवस का महत्व

26 जनवरी हमें यह सिखाता है कि सभी नागरिक समान हैं और देश के शासन में उनकी भूमिका अहम है। यह दिन संविधान के महत्व को बताता है और याद दिलाता है कि लोकतंत्र सिर्फ सरकार का नहीं बल्कि हर नागरिक का अधिकार और जिम्मेदारी है। गणतंत्र दिवस का जश्न सिर्फ परेड और समारोह तक सीमित नहीं है। यह हमें हमारे संविधान, लोकतंत्र और देशभक्ति की याद दिलाने का दिन है।

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BMC Mayor List: मुंबई में 25 साल बाद टूटा शिवसेना का किला, जाने 25 साल का इतिहास

2026 के चुनावों ने बीएमसी की राजनीति का समीकरण बदल दिया है। भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने न केवल शिवसेना के लंबे शासन को चुनौती दी है, बल्कि यह संकेत भी दिया है कि मुंबई की जनता अब नई राजनीतिक दिशा चाहती है।

BMC Mayor List
बीएमसी चुनाव 2026 (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar16 Jan 2026 09:33 PM
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देश की सबसे अमीर महानगरपालिका बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) एक बार फिर सुर्खियों में बनी है। 227 वार्डों वाली इस नगर निगम के 2026 के चुनावों ने मुंबई की राजनीति में नया इतिहास रचा है। बता दें कि 1931 से शिवसेना का गढ़ मानी जाने वाली बीएमसी ने इस बार भाजपा (भारतीय जनता पार्टी ) ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है। शुरुआती रुझानों से लेकर अंतिम परिणामों तक, यह साफ हो गया कि मुंबई की जनता ने बदलाव के पक्ष में वोट दिया है।

बीएमसी: एक छोटे बोर्ड से देश की सबसे अमीर संस्था तक

बृहन्मुंबई महानगरपालिका की नींव 19वीं सदी में रखी गई थी। वर्ष 1807 में इसकी शुरुआत बेहद सीमित दायरे में हुई थी, जब इसका कार्य केवल सेशंस कोर्ट तक सीमित था। बाद में शहर की साफ-सफाई, नगर व्यवस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारियां इसे सौंपी गईं। 1907 में प्राथमिक शिक्षा का दायित्व भी बीएमसी के अधीन आ गया। इसके बाद 1931 में बॉम्बे अधिनियम संख्या 21 के तहत अध्यक्ष के पद को ‘मेयर’ नाम दिया गया। इसी के साथ मुंबई को अपना पहला ‘प्रथम नागरिक’ मिला।

यहां देखें 1931 से 2022 तक बीएमसी मेयर की पूरी सूची

75 हजार करोड़ का बजट, कई राज्यों से ज्यादा ताकत

बता दें कि बीएमसी की असली ताकत उसके विशाल बजट में झलकती है। लगभग 75 हजार करोड़ रुपये का वार्षिक बजट भारत के कई छोटे राज्यों के कुल बजट से भी अधिक है। करीब 1 करोड़ 87 लाख की आबादी वाले मुंबई शहर की बुनियादी सुविधाओं—पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और सफाई—की जिम्मेदारी बीएमसी पर ही है। राजनीतिक दृष्टि से यहां मराठी, गुजराती और उत्तर भारतीय मतदाताओं की बड़ी भूमिका रही है, जिसके चलते ‘मराठी बनाम गैर-मराठी’ जैसे मुद्दे अक्सर चुनावी बहस का केंद्र बनते रहे हैं।

शिवसेना का लंबा शासन और दिग्गज मेयर

बीएमसी के इतिहास में पिछले 25 वर्षों तक शिवसेना का दबदबा रहा है। पार्टी ने नगर निगम की सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाए रखी थी। इससे पहले भी कई दिग्गज नेता मेयर पद तक पहुंचे। 1971 में डॉ. हेमचंद्र गुप्ते मेयर बने। इसके बाद सुधीर जोशी, मनोहर जोशी और छगन भुजबल जैसे कद्दावर नेताओं ने इस प्रतिष्ठित पद को संभाला और मुंबई की राजनीति को दिशा दी।

2026 चुनाव: बदलाव की बयार

2026 के चुनावों ने बीएमसी की राजनीति का समीकरण बदल दिया है। भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने न केवल शिवसेना के लंबे शासन को चुनौती दी है, बल्कि यह संकेत भी दिया है कि मुंबई की जनता अब नई राजनीतिक दिशा चाहती है। बीएमसी का मेयर पद सिर्फ एक संवैधानिक पद नहीं, बल्कि मुंबई के ‘असली राजा’ की पहचान माना जाता है। 1931 से शुरू हुई यह यात्रा आज भी उतनी ही प्रभावशाली और सत्ता के केंद्र में बनी हुई है।


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