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देश की राजनीति में बड़ा बदलाव लाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक साथ तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए हैं। इन प्रस्तावों का सीधा संबंध महिला आरक्षण, लोकसभा सीटों की संख्या में वृद्धि और निर्वाचन क्षेत्रों के नए सिरे से पुनर्गठन से है।

Delimitation Bill 2026 : देश की राजनीति में बड़ा बदलाव लाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक साथ तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए हैं। इन प्रस्तावों का सीधा संबंध महिला आरक्षण, लोकसभा सीटों की संख्या में वृद्धि और निर्वाचन क्षेत्रों के नए सिरे से पुनर्गठन से है। यदि ये विधेयक पारित हो जाते हैं, तो आने वाले वर्षों में न सिर्फ संसद और विधानसभाओं की संरचना बदल सकती है, बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा भी नए दौर में प्रवेश कर सकती है। सरकार का उद्देश्य वर्ष 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून को पूरी तरह लागू करने का रास्ता साफ करना है। इसी मकसद से महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेशों से संबंधित संशोधन विधेयक संसद में लाए गए हैं। इन प्रस्तावों के जरिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की व्यवस्था को जमीन पर उतारने की तैयारी की जा रही है। Delimitation Bill 2026
इन विधेयकों का महत्व केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है। इनके जरिए देश की संसदीय संरचना में बड़ा संस्थागत बदलाव प्रस्तावित किया गया है। सरकार लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 तक ले जाने का विचार रखती है। प्रस्ताव के मुताबिक इनमें 815 सीटें राज्यों के हिस्से में और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए निर्धारित की जा सकती हैं। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन का प्रस्ताव रखा गया है। साथ ही निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के लिए परिसीमन आयोग के गठन का भी प्रावधान किया गया है। यानी यह केवल आरक्षण का मामला नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व की पूरी नई संरचना का खाका है। सरकार ने विधेयक में यह स्पष्ट किया है कि जनसंख्या का आधार वही जनगणना होगी, जिसके आधिकारिक आंकड़े प्रकाशित हो चुके हों। फिलहाल देश में 2011 की जनगणना ही अंतिम प्रकाशित जनगणना है। ऐसे में सीटों के पुनर्गठन का आधार यही बन सकता है। यहीं से विपक्ष का विरोध तेज हो गया है। विपक्षी दलों का कहना है कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन परिसीमन की प्रक्रिया 2026 के बाद होने वाली नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर होनी चाहिए। दक्षिण भारत के कुछ राज्य, खासकर तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना, इस मुद्दे पर अपनी आशंका जता चुके हैं। उनका तर्क है कि यदि सीटों का पुनर्गठन पुराने जनसंख्या आंकड़ों या किसी विवादित फार्मूले से किया गया, तो राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन प्रभावित हो सकता है। Delimitation Bill 2026
चूंकि यह मामला संविधान संशोधन से जुड़ा है, इसलिए इसे पारित कराने के लिए संसद में साधारण बहुमत नहीं, बल्कि दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। मौजूदा संख्या बल को देखें तो सरकार अपने दम पर इस लक्ष्य तक पहुंचती नहीं दिखती। ऐसे में यह स्पष्ट है कि महिला आरक्षण को अमली जामा पहनाने और सीटों के नए ढांचे को मंजूरी दिलाने के लिए सरकार को विपक्ष का सहयोग लेना पड़ेगा। यही वजह है कि सरकार लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा। संसदीय कार्य मंत्री की ओर से भी संकेत दिया गया है कि यह मुद्दा राजनीतिक टकराव का नहीं, बल्कि महिलाओं को उनका अधिकार देने का है, इसलिए सभी दलों को साथ आना चाहिए। Delimitation Bill 2026
सरकार ने यह भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में लगभग 50 प्रतिशत तक वृद्धि का फार्मूला अपनाया जा सकता है, ताकि किसी एक क्षेत्र को नुकसान और दूसरे को असामान्य फायदा न हो। इसी तर्क के आधार पर कहा जा रहा है कि तमिलनाडु की 39 सीटें बढ़कर लगभग 59 तक पहुंच सकती हैं, जबकि केरल की 20 सीटें बढ़कर 30 के आसपास हो सकती हैं। इसी तरह दूसरे राज्यों में भी नई संख्या तय करने का काम परिसीमन आयोग करेगा। यह आयोग नवीनतम उपलब्ध जनगणना, संवैधानिक प्रावधानों और कानूनी मानकों के आधार पर तय करेगा कि किस राज्य को कितनी लोकसभा और विधानसभा सीटें मिलेंगी। Delimitation Bill 2026
इस प्रस्तावित बदलाव का असर केवल लोकसभा तक सीमित नहीं रहेगा। राज्य विधानसभाओं की सीटों के पुनर्निर्धारण का रास्ता भी इससे खुलेगा। यानी आने वाले समय में कई राज्यों की विधानसभा संरचना भी बदल सकती है। हालांकि संविधान का वह प्रावधान जस का तस है, जिसमें विधानसभा सीटों की एक सीमा तय की गई है, लेकिन गणना का आधार बदले जाने से राजनीतिक प्रतिनिधित्व का स्वरूप बदलना तय माना जा रहा है। Delimitation Bill 2026
गौरतलब है कि लोकसभा सीटों की मौजूदा संरचना लंबे समय से लगभग स्थिर बनी हुई है। इसका आधार 1971 की जनगणना रही है और इस व्यवस्था को समय-समय पर आगे बढ़ाया जाता रहा। अब 2026 के बाद यह स्थिति बदलने की संभावना तेज हो गई है। ऐसे में यह बहस केवल महिला आरक्षण की नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक पुनर्संरचना की है, जो आने वाले दशक की राजनीति को नई दिशा दे सकती है। Delimitation Bill 2026
विपक्ष का कहना है कि महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण देने में उसे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसे लागू करने का तरीका पारदर्शी और न्यायसंगत होना चाहिए। उनकी मांग है कि महिला आरक्षण को मौजूदा लोकसभा संरचना के आधार पर लागू किया जाए और परिसीमन की प्रक्रिया नई जनगणना के बाद ही शुरू हो। विपक्षी दलों को यह आशंका भी है कि यदि सीटों का बंटवारा विवादित तरीके से हुआ, तो कुछ राज्यों का राजनीतिक वजन बढ़ सकता है और कुछ का घट सकता है। Delimitation Bill 2026
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