
Bihar Election 2025 : बिहार देश का एक ऐसा राज्य जिसे प्राचीन सभ्यता की धरोहर, राजनीतिक चेतना और सामाजिक संघर्षों की भूमि माना जाता है, हर चुनावी मौसम में एक ऐसे अंधेरे दौर से गुजरता है, जहां लोकतंत्र की जगह हिंसा, भय और खूनखराबा सुर्खियां बटोरने लगते हैं। जैसे-जैसे मतदान की तारीख नज़दीक आती है, अपराध की रफ्तार भी तेज़ होती जाती है। सवाल यही है कि आखिर चुनावी माहौल मेंइतने अपराध क्यों बढ़ जाते है ? इस रिपोर्ट में हम सरकारी आंकड़ों और विशेषज्ञों की टिप्पणियों के ज़रिए उन कारणों की पड़ताल करेंगे, जो बिहार को हर चुनाव में हिंसा की गिरफ्त में ले लेते हैं।
NCRB रिपोर्ट (2023): राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2023 में उपचुनावों से ठीक पहले के दो महीनों में बिहार में संगीन अपराधों—जैसे हत्या, दंगे और लूट—में करीब 17% की वृद्धि दर्ज की गई।
पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सीवान, भोजपुर और बेगूसराय जैसे ज़िले सर्वाधिक प्रभावित रहे। SCRB (राज्य अपराध ब्यूरो) के आंकड़े (2020-2023): बिहार पुलिस के आँकड़े दर्शाते हैं कि चुनावी वर्षों में सामान्य महीनों की तुलना में 25 से 30 प्रतिशत अधिक हत्याएं और अपहरण के मामले दर्ज किए गए। यह प्रवृत्ति पंचायत से लेकर लोकसभा तक सभी चुनावों में देखी गई है।
Association for Democratic Reforms (ADR) की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार विधानसभा 2020 में चुने गए 243 में से 163 विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज थे, जिनमें से कई संगीन धाराओं—जैसे हत्या और बलात्कार—के अंतर्गत आरोपी थे। इससे साफ ज़ाहिर होता है कि राजनीतिक प्रक्रिया में अपराधियों की गहरी पैठ है। चुनाव जीतने के लिए हिंसा, डर और बाहुबल का सहारा लिया जाना अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक सामान्य रणनीति बन चुकी है।
बिहार की राजनीति जातीय समीकरणों पर टिकी रही है। चुनाव के समय ये समीकरण और अधिक तीखे हो जाते हैं। NCRB के अनुसार, 2022 में देश भर में हुए जातीय दंगों में से 18% अकेले बिहार में हुए — जिनमें से अधिकतर चुनावी समय के आसपास दर्ज किए गए।यह सामाजिक अस्थिरता अक्सर राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रायोजित भी होती है। चुनावों से पहले अवैध हथियारों की आपूर्ति में जबरदस्त उछाल देखा जाता है।
बिहार पुलिस द्वारा 2023 में 4,500 से अधिक अवैध हथियार जब्त किए गए, जिनमें से 70% हथियार केवल चुनाव से पूर्व दो महीनों में पकड़े गए थे।यह आंकड़े इस ओर इशारा करते हैं कि आज भी चुनावी रणनीति में ‘बाहुबल’ की अहम भूमिका बनी हुई है। चुनावी हिंसा का एक मकसद मतदाता को डराना-धमकाना भी होता है। गांवों में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी या प्रभावशाली समूह डर का माहौल पैदा करते हैं ताकि विपक्षी वोटर मतदान केंद्र तक न पहुंचे।
इसमें धमकी, मारपीट, घर जलाने, महिलाओं को डराने जैसी घटनाएं भी देखी जाती हैं। Bihar Election 2025