कच्चा तेल कोई एक समान तरल नहीं है, बल्कि यह हजारों हाइड्रोकार्बन अणुओं का मिश्रण है। इसमें कार्बन और हाइड्रोजन परमाणुओं की जंजीरें होती हैं। छोटी जंजीरें हल्की होती हैं जो महंगे पेट्रोल और जेट ईंधन बनाती हैं, जबकि लंबी और भारी जंजीरें सस्ते डामर जैसा उत्पाद देती हैं।

Iranian oil quality : ईरानी तेल की गुणवत्ता इतनी अनूठी है कि रिफाइनरियों के लिए इसे छोड़ना सिर्फ राजनीतिक फैसला नहीं, बल्कि तकनीकी और आर्थिक आत्महत्या जैसा साबित हो सकता है। जब भी आप अपनी कार में पेट्रोल भरवाते हैं या किसी हवाई जहाज में सफर करते हैं, तो उस ईंधन के पीछे एक रिफाइनरी इंजीनियर की मेहनत और गणित छिपा होता है। दशकों से दुनिया भर के इंजीनियर चाहे विरोधी देश हों या कड़े प्रतिबंधों का दौर, ईरान के तेल को चुनते आए हैं। सवाल उठता है कि आखिर इस दीवानगी की वजह क्या है? इसका जवाब राजनीति में नहीं, बल्कि शुद्ध केमिस्ट्री में छिपा है।
कच्चा तेल कोई एक समान तरल नहीं है, बल्कि यह हजारों हाइड्रोकार्बन अणुओं का मिश्रण है। इसमें कार्बन और हाइड्रोजन परमाणुओं की जंजीरें होती हैं। छोटी जंजीरें हल्की होती हैं जो महंगे पेट्रोल और जेट ईंधन बनाती हैं, जबकि लंबी और भारी जंजीरें सस्ते डामर जैसा उत्पाद देती हैं। ईरान का कच्चा तेल रसायनिक रूप से एक ऐसे 'स्वीट स्पॉट' पर बैठा है, जिसे बदलना दुनिया की बड़ी रिफाइनरियों के लिए एक दुःस्वप्न साबित होता है।
किसी भी तेल की गुणवत्ता दो पैमानों पर मापी जाती है—घनत्व (API ग्रेविटी) और सल्फर की मात्रा।
ईरानी लाइट क्रूड की सबसे बड़ी ताकत इसका 'डिस्टिलेशन यील्ड' है।इसके एक बैरल से लगभग 20% हल्का हिस्सा (पेट्रोल आदि) और 50% 'मिडिल डिस्टिलेट्स' (डीजल, जेट फ्यूल, हीटिंग ऑयल) प्राप्त होता है। इसका मतलब है कि प्रत्येक बैरल का करीब 70% हिस्सा सीधे प्रीमियम ईंधन में बदल जाता है। रिफाइनरी इंजीनियरों के लिए यह कन्वर्जन रेट सबसे ज्यादा मुनाफे का सौदा होता है। अगर यह सप्लाई कटती है, तो रिफाइनरियों की कार्यक्षमता और मुनाफा दोनों गिरने लगते हैं।
अक्सर सवाल पूछा जाता है कि चीन और भारत जैसे देश अमेरिकी शेल ऑयल या वेनेजुएला के तेल पर क्यों नहीं शिफ्ट हो जाते? इसका जवाब फिर से केमिस्ट्री देती है: