दुकान चलाने के लिए क्यों जरूरी QR कोड? सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
Supreme Court
भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 05:40 PM
Supreme Court : सावन के पावन महीने में जहां देशभर में कांवड़ यात्रा पूरे जोश और भक्ति भाव से चल रही है, वहीं उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकार के एक फैसले को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सवाल खड़े कर दिए हैं। इन दोनों राज्यों की सरकारों ने कांवड़ मार्ग पर मौजूद दुकानदारों के लिए QR कोड लगाना अनिवार्य कर दिया है, जिसमें दुकान मालिक की पूरी पहचान दर्ज होगी। इस आदेश को चुनौती देते हुए अब यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच चुका है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिया एक हफ्ते का समय
जस्टिस एम.एम. सुंद्रेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने इस मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी किया है और पूछा है कि आखिर दुकानदारों से उनकी पहचान जाहिर करने वाला QR कोड क्यों लगवाया जा रहा है। अदालत ने जवाब दाखिल करने के लिए दोनों सरकारों को एक हफ्ते की मोहलत दी है और साफ किया है कि अगली सुनवाई में यह स्पष्ट होना चाहिए कि यह आदेश क्यों जारी किया गया।
याचिका में क्या कहा गया है?
इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए दायर याचिका में कहा गया है कि यह सरकारों का कदम सुप्रीम कोर्ट के पिछले साल दिए गए अंतरिम आदेश का उल्लंघन है, जिसमें कहा गया था कि किसी दुकानदार को उसकी पहचान उजागर करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
QR कोड आदेश का क्या है मकसद?
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकार का तर्क है कि सावन के दौरान लाखों कांवड़ यात्री एक ही मार्ग से गुजरते हैं और सुरक्षा व निगरानी के मद्देनजर यह फैसला लिया गया है। कांवड़ रूट पर लगे खानपान और अन्य दुकानों पर QR कोड लगाने से दुकान मालिक की पहचान डिजिटल रूप में उपलब्ध रहेगी, जिससे किसी भी आपात स्थिति या विवाद में कार्रवाई आसान हो सकेगी।
सरकारों ने मांगा था दो हफ्ते का समय
उत्तर प्रदेश के एडवोकेट जनरल जीतेंद्र कुमार सेठी ने कोर्ट से जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्तों की मोहलत मांगी थी, लेकिन याचिकाकर्ता वरिष्ठ वकील शादान फरासत ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि कांवड़ यात्रा 10–12 दिन की ही होती है और देरी से जवाब देने का कोई औचित्य नहीं बनता। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस तर्क को मानते हुए दोनों सरकारों को अगले मंगलवार तक जवाब देने का आदेश दिया है।
यह मामला अब धार्मिक आस्था, प्रशासनिक निगरानी और नागरिक स्वतंत्रता के संतुलन से जुड़ता नजर आ रहा है। अगली सुनवाई में सरकारें क्या तर्क देती हैं और सुप्रीम कोर्ट क्या रुख अपनाता है इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं।