
बिहार में राजनीतिक परिदृश्य में प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी चर्चा में है। चर्चा है कि वे एनडीए के समीकरणों को हिला सकते हैं। लेकिन हाल ही में उनका व्यवहार थोड़ा बदलता दिखाई दे रहा है। पत्रकारों के साथ बातचीत में वे जल्दी आपा खो देते हैं, और कुछ मामूली सवालों पर उलझ जाते हैं। यह संकेत हो सकता है कि या तो उन्हें सत्ता में आने का अहसास हुआ है, या उन्हें अब समझ में आया है कि उनकी पार्टी चुनावी मैदान में उतनी प्रभावी नहीं है जितना वे सोच रहे थे। पिछले दो साल से पीके बिहार में रोजगार, शिक्षा, भ्रष्टाचार मुक्त शासन और जातिविहीन राजनीति के मुद्दों को लेकर लगातार प्रयास कर रहे हैं, ताकि जनता में नई राजनीतिक चेतना पैदा हो। Prashant Kishore
उनकी रणनीति दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की शुरुआती राजनीति से मिलती-जुलती है। जैसे केजरीवाल ने 2013 में अन्ना हजारे के आंदोलन की लहर पर सवार होकर दिल्ली की स्थापित पार्टियों को चुनौती दी और 2015 में शानदार जीत हासिल की, वैसे ही पीके भी 2022 से 5,000 किलोमीटर की पदयात्रा कर बिहार के गांव-गांव में घूम रहे हैं, भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि 2025 में जनसुराज 243 में से 200 से अधिक सीटें जीत सकती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रशांत किशोर वास्तव में दिल्ली जैसी सफलता बिहार में दोहरा पाएंगे, या उन्हें अभी लंबा रास्ता तय करना होगा? जनता की उम्मीदें और बिहार की जमीनी राजनीतिक जटिलताएं इस परीक्षा को और चुनौतीपूर्ण बना रही हैं। Prashant Kishore
दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को सफलता मिली क्योंकि उन्हें मध्यम वर्ग, प्रवासी मजदूर और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों का जबरदस्त समर्थन मिला। फ्री बिजली‑पानी जैसी तत्काल लाभ देने वाली योजनाओं ने वोटरों में बदलाव की लहर पैदा कर दी। लेकिन बिहार का राजनीतिक परिदृश्य इससे बहुत अलग है। यहाँ चुनाव केवल मुद्दों या योजनाओं तक सीमित नहीं रहते; जाति निर्णायक भूमिका निभाती है। यादव, कुशवाहा, मुस्लिम और दलित जैसे जातिगत समीकरण वोटिंग पैटर्न तय करते हैं। प्रशांत किशोर का ‘जाति भूलो, रोजगार चुनो’ का नारा सुनने में तो प्रेरक लगता है, लेकिन जमीन पर इसका असर सीमित है। बिहार की राजनीति आज भी लालू यादव, नीतीश कुमार और बीजेपी के बीच बाइपोलर समीकरण के इर्द‑गिर्द घूमती है। इस माहौल में किसी नए राजनीतिक विकल्प को उतारना उतना आसान नहीं है जितना लगता है।
अरविंद केजरीवाल ने सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की थी। सूचना के अधिकार और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों में उनकी सक्रियता ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई और व्यापक समर्थन जुटाया। वहीं, प्रशांत किशोर की दुनिया बिल्कुल अलग है—वे चुनावी रणनीतिज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, केजरीवाल और ममता बनर्जी जैसी बड़ी राजनीतिक हस्तियों के लिए उन्होंने रणनीतियाँ तैयार की हैं। उनकी छवि अधिकतर ‘कंसल्टेंट’ की रही है, जो रणनीति और डेटा पर भरोसा करते हैं, लेकिन बिहार के मतदाता परंपरागत रूप से ऐसे नेताओं को तरजीह देते हैं जिन्होंने संघर्ष, क्रांति और लोकनायक नेतृत्व का पाठ खुद लिखकर दिखाया हो।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने दो साल के लगातार आंदोलन के बाद एक मजबूत संगठन खड़ा कर लिया था। वहाँ के घनी आबादी वाले मोहल्लों में हर गली‑मुहल्ले में पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता दिखाई देते थे, और उनकी पैठ जनता में गहरी थी। लेकिन बिहार का परिदृश्य इससे बिल्कुल अलग है। यहाँ का विशाल क्षेत्र और विविध जनसंख्या जनसुराज पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है। हालिया सर्वेक्षणों में पार्टी को सिर्फ 10‑12% वोट मिलने का अनुमान है, जिससे लगता है कि किंगमेकर बनने की राह अभी भी कठिन और लंबी है।
अरविंद केजरीवाल के पास जन लोकपाल आंदोलन जैसी राष्ट्रीय स्तर की लहर थी, जिसने उनके लिए जनता में व्यापक समर्थन और पहचान पैदा की। वहीं, प्रशांत किशोर के पास ऐसा कोई बड़ा आंदोलन नहीं है, जो पूरे राज्य में पैठ बना सके। बिहार में तेजस्वी यादव और कांग्रेस जाति आधारित मुद्दों और आरक्षण की मांगों के साथ सक्रिय हैं, और ये मुद्दे सीधे मतदाता के दिल को छूते हैं। इसके मुकाबले जनसुराज अभी तक इन प्रमुख सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर व्यापक प्रभाव छोड़ने में असमर्थ दिख रही है, जिससे उनकी राज्य स्तर पर पकड़ कमजोर रह सकती है। Prashant Kishore
केजरीवाल की राजनीति की शुरुआत से ही स्कूल, अस्पताल और लोक कल्याण जैसे मुद्दों पर फोकस रहा, लेकिन उन्होंने कभी मोदी और शाह जैसे बड़े नेताओं को चुनौती देने से पीछे नहीं हटे। प्रशांत किशोर भी स्थानीय नेताओं पर आरोप-प्रत्यारोप के जरिए सक्रिय हैं, लेकिन राष्ट्रीय और राज्य स्तर के प्रमुख विरोधियों के खिलाफ उनकी चुनौती उतनी जोरदार नहीं दिखती। यही वजह है कि बिहार में नाराज और असंतुष्ट वोटरों को अपने पाले में खड़ा करना उनके लिए अभी बड़ी चुनौती बनी हुई है। Prashant Kishore