
बिहार की सियासत इन दिनों जातिगत समीकरणों और नेताओं की तल्ख़ बयानबाज़ी से गर्म है। जातीय समीकरणों की तनी रस्साकशी और नेताओं की तल्ख ज़ुबानी जंग ने माहौल और गरमा दिया है। ऐसे में बीजेपी के दो कद्दावर राजपूत चेहरे—पूर्व केंद्रीय मंत्री आरके सिंह और मौजूदा सांसद राजीव प्रताप रूडी—खुलेआम अपनी नाराजगी दर्ज करा चुके हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन दिग्गजों की नाराजगी चुनावी समर में बीजेपी के लिए नई मुश्किलों का दरवाज़ा खोलने वाली है? Bihar News
पूर्व केंद्रीय मंत्री आरके सिंह ने हाल ही में प्रशांत किशोर के आरोपों पर बीजेपी और जेडीयू को खुलकर जवाब देने की नसीहत दी है। सिंह का कहना है कि जब प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी जैसे नेताओं पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं, तो पार्टी और सरकार की चुप्पी उनकी साख को चोट पहुँचा रही है। उन्होंने साफ शब्दों में चुनौती देते हुए कहा—“अगर आरोप सही हैं तो इस्तीफा दीजिए, और अगर झूठे हैं तो पीके पर मानहानि का मुकदमा चलाइए।” आरके सिंह का यह बयान न केवल बीजेपी बल्कि जेडीयू के गलियारों में भी भूचाल ला गया है। इतना ही नहीं, उन्होंने यहां तक कह दिया कि यदि उनकी बात को बगावत मानकर पार्टी कार्रवाई करती है, तो उन्हें इसकी बिल्कुल भी परवाह नहीं है। Bihar News
दूसरी तरफ़, सारण से सांसद और बीजेपी के वरिष्ठ नेता राजीव प्रताप रूडी भी अपनी उपेक्षा से खासे नाराज़ नज़र आ रहे हैं। उन्होंने हाल ही में तल्ख़ तेवर अपनाते हुए कहा कि राजपूत समाज को बरसों से “सफलता की सीढ़ी” की तरह इस्तेमाल तो किया गया, लेकिन उसका वास्तविक हक़ कभी नहीं मिला। रूडी ने भले ही किसी पार्टी का नाम न लिया हो, लेकिन उनके बयान साफ इशारा करते हैं कि साइडलाइन किए जाने से वे गहरी बेचैनी महसूस कर रहे हैं। ऊपर से बीजेपी सांसद निशिकांत दूबे के आरोप और भीतरखाने की राजनीति ने उनकी नाराज़गी को और हवा दे दी है। कई मौकों पर रूडी यह संकेत भी दे चुके हैं कि पार्टी में कुछ ताकतें उनकी राजनीतिक ज़मीन को कमजोर करने की कोशिश कर रही हैं।
बिहार की राजनीति में राजपूत समाज हमेशा से निर्णायक साबित हुआ है। भले ही जातिगत सर्वे बताते हों कि ठाकुर समुदाय राज्य की कुल आबादी का सिर्फ 3.5% हिस्सा है, लेकिन उनकी राजनीतिक पकड़ बड़ी सीटों पर निर्णायक साबित होती है। यह समाज करीब 30-35 विधानसभा और 7-8 लोकसभा सीटों में नतीजे पलटने की क्षमता रखता है। 2020 के विधानसभा चुनाव में 28 राजपूत विधायक चुने गए थे, जिनमें से आधे से ज़्यादा यानी 15 बीजेपी के टिकट पर जीत दर्ज कर चुके थे। इतिहास बताता है कि किसी गांव में मात्र 200 राजपूत वोट भी आसपास के मतों की दिशा बदल सकते हैं। यही कारण है कि किसी भी पार्टी के लिए इस समुदाय को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है। Bihar News
राज्य में नीतीश कुमार की सरकार में भले ही चार राजपूत मंत्री शामिल हों, लेकिन केंद्र में इस समुदाय का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनाव में छह राजपूत सांसद जीतकर आए, फिर भी किसी को भी मंत्री पद नहीं मिला। आरके सिंह चुनाव हार गए और राजीव प्रताप रूडी लगातार मंत्रालय से बाहर हैं। यही लंबित असंतोष अब खुली सियासी नाराजगी का रूप ले रहा है। वहीं, बीजेपी ने धीरे-धीरे बिहार में अपनी राजनीतिक रणनीति को ओबीसी और गैर-सवर्ण वोटरों की ओर केंद्रित कर दिया है। इस बदलाव ने राजपूत नेताओं के मन में असुरक्षा और चिंता पैदा कर दी है। सवाल यह है कि क्या बीजेपी समय रहते इन नाराज नेताओं की खीज को संतुलित कर पाएगी, नहीं तो परंपरागत रूप से उसके साथ खड़ा रहने वाला राजपूत समाज कहीं हाथ से फिसल न जाए। Bihar News