
बिहार की राजनीति इन दिनों बेहद पेचीदा मोड़ पर है। 2025 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर महागठबंधन और एनडीए दोनों ही ओर से चुनावी प्रचार अपने चरम पर है, लेकिन महागठबंधन में तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री घोषित करने को लेकर कांग्रेस का असमंजस सबसे ज्यादा सुर्खियों में है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सीमित संसाधनों के बावजूद आरजेडी के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया—सिर्फ 9 सीटों पर चुनाव लड़कर 3 जीत हासिल की। पप्पू यादव को जोड़ने पर स्थिति लगभग बराबरी की हो गई, जिससे कांग्रेस को बिहार में अपनी ताकत पर भरोसा हुआ। फिर सवाल उठता है—क्या वजह है कि कांग्रेस तेजस्वी यादव को सीएम चेहरा बनाने से बच रही है, और क्या है इसके पीछे की रणनीति? Bihar Assembly Election 2025
हाल ही में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने मिलकर दो हफ्तों तक बिहार की सड़कों पर ‘वोटर अधिकार यात्रा’ निकाली, जिसे आम जनता का भरपूर समर्थन मिला। लेकिन इस जोरदार जुलूस के बावजूद, राहुल गांधी ने तेजस्वी को महागठबंधन का मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित नहीं किया। कांग्रेस के बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावेरू ने भी स्पष्ट कर दिया कि बिहार का मुख्यमंत्री जनता तय करेगी। इस बयान ने साफ संदेश दे दिया कि कांग्रेस अभी तेजस्वी को सीएम फेस के रूप में स्वीकार करने के मूड में नहीं है, और यह असमंजस राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का नया विषय बन गया है।
कांग्रेस बिहार में अपनी खोई हुई राजनीतिक ताकत को फिर से हासिल करने के इरादे से सक्रिय है। 1980 के दशक तक पार्टी राज्य की सबसे प्रभावशाली शक्ति रही, लेकिन 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के उदय के साथ इसका असर लगातार घटता गया। 2020 के विधानसभा चुनाव में 70 सीटों पर चुनाव लड़कर केवल 19 सीटें जीतना पार्टी के लिए बड़ी चोट थी। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन और ‘वोटर अधिकार यात्रा’ ने कांग्रेस नेतृत्व को नया आत्मविश्वास दिया। अब चुनौती यही है कि तेजस्वी यादव को सीएम चेहरा बनाने पर आरजेडी का दबदबा और बढ़ सकता है, जो कांग्रेस के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के खिलाफ है। इसी कारण पार्टी फिलहाल बहुत सतर्क और रणनीतिक रवैया अपनाए हुए है।
कांग्रेस की रणनीति में सबसे अहम हथियार है सीटों की अधिकतम सौदेबाजी। अगर तेजस्वी यादव को सीएम चेहरा मान लिया गया, तो आरजेडी के पास सीटों को लेकर दबदबा बढ़ जाएगा और कांग्रेस की सौदेबाजी की ताकत कमजोर पड़ सकती है। 2020 में आरजेडी ने उदारता दिखाते हुए कांग्रेस को 70 सीटें दी थीं, लेकिन इस बार पार्टी अपनी मजबूत और जीतने योग्य सीटों पर खुद का अधिकार जताना चाहती है। तेजस्वी को सीएम चेहरा न मानकर कांग्रेस साफ संदेश दे रही है कि वह गठबंधन में केवल औपचारिकता में शामिल नहीं है—उसकी अपनी रणनीतिक आवाज़ और दबदबा बने रहना जरूरी है।
युवा और लोकप्रिय नेता होने के बावजूद, तेजस्वी यादव की राजनीतिक छवि विवादों से पूरी तरह मुक्त नहीं है। आरजेडी पर लंबे समय से भ्रष्टाचार और ‘जंगलराज’ के आरोप लगे रहे हैं, वहीं तेजस्वी पर आय से अधिक संपत्ति का मामला भी विचाराधीन है। कांग्रेस इस विवादास्पद छवि से दूरी बनाए रखना चाहती है ताकि अपनी विश्वसनीयता पर कोई आंच न आए। पार्टी का मानना है कि सीएम फेस का ऐलान चुनाव परिणाम आने के बाद करना ज्यादा सुरक्षित और रणनीतिक कदम होगा, जिससे गठबंधन और वोटरों दोनों के बीच भ्रम की स्थिति भी कम रहे।
बिहार की राजनीति में जाति और समुदाय का समीकरण हमेशा निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। आरजेडी का मजबूत आधार यादव और मुस्लिम समुदाय है, वहीं कांग्रेस का वोट बैंक सवर्ण, दलित, मुस्लिम और कुछ OBC समुदायों में फैला हुआ है। तेजस्वी यादव को सीएम चेहरा मान लेने से गठबंधन का वोट आधार संकीर्ण हो सकता है और कांग्रेस की व्यापक रणनीति पर असर पड़ सकता है। इसलिए पार्टी चाहती है कि कोई तटस्थ या कम विवादास्पद चेहरा सामने आए, जो गठबंधन को अधिक से अधिक समाजिक समर्थन और व्यापक जनादेश दिला सके। Bihar Assembly Election 2025