
देश में कुत्तों और अन्य जानवरों के काटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों को सड़क से हटाकर शेल्टर होम्स में भेजने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश इसी समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि भारत में एंटी-रेबीज वैक्सीन क्यों पहले से नहीं दी जाती? आरएमएल हॉस्पिटल के डॉक्टर ने इसके पीछे का कारण स्पष्ट किया है। रेबीज एक घातक संक्रमण है, जो कुत्तों, बिल्लियों और बंदरों के काटने से फैल सकता है। भारत में इस बीमारी से बचाव के लिए वैक्सीन केवल तभी दी जाती है जब किसी व्यक्ति को काटा गया हो। डॉक्टरों के अनुसार, समय पर इलाज और वैक्सीनेशन के बिना बचाव लगभग असंभव है। Anti-Rabies Vaccine
दिलचस्प बात यह है कि कई देशों में एंटी-रेबीज वैक्सीन किसी भी काटने की घटना से पहले भी लगाई जा सकती है। भारत में न तो यह प्रैक्टिस अपनाई जाती है और न ही प्राइवेट हॉस्पिटल बिना काटे किसी को वैक्सीन देते हैं। यह स्थिति इसलिए है क्योंकि भारत में अन्य बच्चों को दी जाने वाली नियमित टीकों की तरह इसे रूटीन वैक्सीनेशन में शामिल नहीं किया गया है।
दिल्ली के राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल में कम्युनिटी मेडिसिन के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सागर बोरकर ने कहा कि एंटी-रेबीज वैक्सीन का उद्देश्य शरीर में इम्युनिटी बढ़ाना और खतरनाक वायरस से बचाव करना है। यह आमतौर पर उन्हीं लोगों को दी जाती है जिन्हें अधिक खतरा होता है, जैसे एनिमल डॉक्टर, पशु कर्मी या ऐसे इलाके जिनमें रेबीज का जोखिम अधिक हो। डॉ. बोरकर ने बताया कि वैक्सीन का प्रभाव लगभग तीन साल तक रहता है, इसलिए इसे नियमित रूप से नहीं लगाया जाता। अगर इस अवधि के दौरान किसी को रेबीज का संक्रमण होता है, तो WHO के दिशानिर्देशों के अनुसार दो बूस्टर खुराक दी जा सकती हैं। इन खुराकों की मात्रा और समय हेल्थ एक्सपर्ट द्वारा जख्म की गंभीरता, जानवर की स्थिति और अन्य फैक्टर्स के आधार पर तय किया जाता है। Anti-Rabies Vaccine