
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की आहट के बीच राहुल गांधी ने बिहार की सियासत में ऐसा शंखनाद किया है, जिसने कांग्रेस को अचानक सुर्खियों में ला खड़ा किया है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले कांग्रेस ने अपनी सबसे बड़ी सियासी बाजी खेल दी है और उस बाजी के केंद्र में खड़े हैं राहुल गांधी। साढ़े तीन दशक से सत्ता से दूर रही कांग्रेस अब ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के जरिए पुराने किले में दस्तक दे रही है। Bihar Assembly Election 2025
आजादी से लेकर 80 के दशक तक बिहार पर कांग्रेस का दबदबा था, लेकिन मंडल राजनीति ने उसका जनाधार छिन्न-भिन्न कर दिया। अब राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और तेजस्वी यादव की तिकड़ी एक बार फिर मैदान में उतरी है, और पूरा दारोमदार राहुल गांधी की देसी राजनीति और उनके नए अंदाज़ पर टिका है। सवाल यही है—क्या यह आक्रामक अभियान कांग्रेस को 2025 में सत्ता के करीब ले जा पाएगा ?
17 अगस्त को सासाराम से शुरू हुई यह 16 दिवसीय यात्रा एक सितंबर को पटना में समाप्त होगी। इन दिनों राहुल गांधी अपने ‘देसी अंदाज’ से बिहारियों के बीच नया कनेक्शन बनाने की कोशिश कर रहे हैं—कभी बुलेट मोटरसाइकिल पर सवार, तो कभी मखाना के खेतों में किसानों संग बातचीत, और कभी गले में गमछा डालकर भीड़ का अभिवादन करते हुए। यह नया रूप कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जोश भर रहा है और भीड़ भी राहुल-तेजस्वी की सभाओं में बड़ी संख्या में जुट रही है। यात्रा के दौरान राहुल ने चुनाव आयोग पर मतदाता सूची में गड़बड़ी का आरोप लगाया और मंच से उन लोगों को भी बुलाया जिनके नाम सूची से गायब हैं। वहीं कार्यकर्ता “वोट चोर गद्दी छोड़” के नारों से माहौल गरमा रहे हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले राहुल गांधी ने अपनी ‘वोटर अधिकार यात्रा’ को रणनीतिक मोर्चे पर बदल दिया है। 1300 किलोमीटर का यह सफर 23 जिलों से गुजरते हुए उस भूगोल को छू रहा है, जहां से बिहार की सियासत की दिशा तय होती है। सीमांचल की मुस्लिम-बहुल आबादी से लेकर मिथिलांचल के ब्राह्मण गढ़ और मगध के एनडीए प्रभाव वाले जिलों तक—राहुल गांधी हर मोर्चे पर कांग्रेस की पकड़ दोबारा मजबूत करने की कोशिश में हैं। प्रियंका गांधी महिला वोटरों से सीधा संवाद कर रही हैं और तेजस्वी यादव साथ खड़े हैं, लेकिन इस पूरे अभियान का असली चेहरा और चेहरा बदलने की उम्मीद राहुल गांधी ही बने हुए हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में बिहार से महज़ तीन सीटों पर सिमटी कांग्रेस ने यह समझ लिया कि सिर्फ गठबंधन के भरोसे पार्टी का भविष्य नहीं बदलेगा। इसी के बाद राहुल गांधी ने संगठन में बड़े बदलाव किए। भूमिहार समाज से आए अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद को हटाकर दलित नेता राजेश राम को प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी गई। सुशील पासी और शहनवाज़ आलम को सह-प्रभारी बनाया गया, जबकि कन्हैया कुमार और पप्पू यादव को मैदान में उतारकर युवा व पिछड़े वोटरों को साधने की कोशिश की गई।
पिछले तीन विधानसभा चुनावों पर नज़र डालें तो कांग्रेस 10 फ़ीसदी वोट शेयर से आगे नहीं बढ़ पाई। 2010 में पार्टी महज़ 4 सीटें जीत सकी, 2015 में राजद गठबंधन के सहारे 27 सीटें, और 2020 में 19 पर सिमट गई। लोकसभा चुनावों में भी स्थिति कुछ बेहतर नहीं रही—2014 में 2, 2019 में 1 और 2024 में 3 सीटों तक। यानी कांग्रेस अब भी बिहार में अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रही है। निस्संदेह राहुल गांधी की यात्रा ने बिहार की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। एनडीए खेमे में बेचैनी बढ़ी है और कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा हुआ है। लेकिन असली सवाल यही है—क्या यह जनसंपर्क अभियान कांग्रेस को 35 साल बाद सत्ता के करीब ले जाएगा, या फिर यह कोशिश भी उसी ‘वनवास’ की लंबी कड़ी बन जाएगी ? Bihar Assembly Election 2025