नि:संकोच : ताला नहीं लगाया तो साइकिल चोरी हो ही जाएगी!
भारत
चेतना मंच
10 Dec 2021 04:23 PM
विनय संकोची
एक दिन फुल्लू जी देर शाम मंदिर गए। मंदिर के बाहर साइकिल खड़ी की और हाथ पांव धोकर दर्शन करने मंदिर के अंदर गए। सभी देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के आगे मत्था टेका, मन्नत मांगी। दानपात्र में पांच रुपए का फटा हुआ नोट डाला। पुजारी से प्रसाद लिया और बाहर आ गए। बाहर आए ही थे कि एक पुराना दोस्त मिल गया। काफी देर तक बातें होती रहीं। फिर मित्र के आग्रह पर एक ढाबे पर बैठकर चाय पी। फिर मित्र को विदा कर टहलते हुए फुल्लू जी घर पहुंचे और पांव पसार कर सो गए। फुल्लू जी सुबह जागे तो साइकिल की याद आई। यह भी याद आया कि साइकिल में ताला नहीं लगाया था। अनिष्ट की आशंका से फुल्लू जी मंदिर की ओर दौड़ पड़े। मंदिर पहुंचे तो चैन मिला, साइकिल जहां छोड़ दी थी वहीं खड़ी थी।
फुल्लू जी को लगा कि भगवान को धन्यवाद देना तो बनता है। वह मंदिर में गए और एक-एक कर सभी देवी-देवताओं का धन्यवाद किया, न जाने किस की कृपा से साइकिल पर चोरों की नजर नहीं पड़ी थी। परम संतुष्टि के भाव से भरे फुल्लू जी मंदिर के बाहर आए, तो साइकिल गायब थी। इधर-उधर दौड़े, इस-उस से पूछा, मगर साइकिल न मिलनी थी, न ही मिली। फुल्लू जी माथा पकड़ कर बैठ गए और लगे भगवान को कोसने। एक बुजुर्ग व्यक्ति ने फुल्लू जी से उनकी परेशानी का कारण पूछा, तो उन्होंने अपनी व्यथा-कथा विस्तार से सुना कर कहा-'परमात्मा ने मुझ गरीब के साथ बड़ा भारी अन्याय किया है।' इस पर बुजुर्ग ने कहा- 'बेटा! परमात्मा एक बार को भूल माफ कर सकता है, लेकिन जानबूझकर की गई लापरवाही का दण्ड जरूर देता है। कल शाम तुम भूल से बिना ताला लगी साइकिल को छोड़ गए, तो प्रभु ने उसकी रखवाली की। लेकिन यह तो तुम्हारी लापरवाही थी कि आज तुम बिना साइकिल को ताला लगाए मंदिर में चले गए।' फुल्लू जी थके कदमों से घर को लौट आए। मानसिक असावधानी को लापरवाही कहते हैं। लापरवाही किसी के लिए भी, किसी भी स्तर पर हानिकारक होती है। लापरवाही विशुद्ध घाटे का सौदा है। इसमें लाभ की कोई गुंजाइश नहीं। लापरवाही पड़ोसी से संबंधों को लेकर हो, लापरवाही परिवार, समाज, राष्ट्र के प्रति हो कभी सुखद परिणाम नहीं देती है। अपनी लापरवाही को दूसरों पर थोपना लापरवाही से होने वाले नुकसान को बढ़ाने का काम ही करता है।
दंभी, अहंकारी और दुर्बुद्धि बहुतायत में लापरवाह पाए जाते हैं। इनका अहंकार लापरवाही को सींचने का काम ही करता है। अहंकारी व्यक्ति को प्रत्येक कार्य सहज और अपनी क्षमताओं की सीमा में लगता है। अहंकारी शासक के लापरवाह निर्णयों का दंड प्रजा को भोगना पड़ता है। घमंडी शासक को अंदाज होता है कि उसकी लापरवाही के क्या और कितने दुष्परिणाम होंगे, लेकिन वह उनकी परवाह नहीं करता है। अहंकारी शासक दूसरों की हानि या लाभ की चिंता नहीं करता है, वह प्रजा को ही नहीं अपने दरबारियों को भी तुच्छ समझता है। अपने सलाहकारों को कुछ नहीं मानता है। लापरवाह शासक अपनी भूल को कभी सुनता ही नहीं है, अपितु लापरवाही की आलोचना करने वालों, भर्त्सना करने वालों के दोष गिनाने लगता है। आत्ममुग्धा नायिका की भांति बेपरवाह शासक, साबित करने में लग जाता है कि जो गलती गिनाई जा रही हैं, वे उससे पूर्व के शासक न जाने कितनी बार दोहरा चुके हैं। लापरवाह कुतर्की होता है और अपनी हर गलत बात को सही साबित करने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है। इस तरह के उदाहरण आज भी शासन-प्रशासन में खूब देखे जा सकते हैं।
साइकिल में ताला न लगाना फुल्लू जी की अपनी लापरवाही थी, अपनी गलती थी, लेकिन साइकिल चोरी के लिए परमात्मा को कोसने लगे। जब सत्ता हाथ से फिसलती है, तो राजनेता अपनी गलतियों की लापरवाही को नहीं, जनता को कोसते हैं और जब जनता को सरकार से मनमाफिक सुविधाएं नहीं मिलती हैं, तो वह अपनी चयन-बुद्धि को नहीं सरकार को बुरा भला कहते हैं। विवेकहीनता भी लापरवाही का ही रूप है। विवेक का उपयोग नहीं करेंगे, तो साइकिल को ताला लगाना जरूर भूल जाएंगे और साइकिल चोरी हो जाएगी, कभी मिलेगी भी नहीं।