शास्त्र कथन है - 'सत्यमेव जयते'! हमेशा सत्य की विजय होती है, लेकिन सत्य की जय तभी हो सकती है, जब सत्य उजागर हो। सत्य जब सामने आएगा ही नहीं तो विजय असत्य की होगी और यही हो रहा है। अगर आप सच्चे हैं, तो आपके मन में कोई भय किसी सत्य के उजागर होने का नहीं होगा। शर्त यही है कि आप सच्चे हों, यदि आप सच्चे नहीं हैं तो आप सच का सामना करने से कतराएंगे, भयभीत रहेंगे और इसी के साथ साम, दाम, दंड और भेद का इस्तेमाल कर सत्य को दबाने का भरपूर प्रयास करेंगे। यदि आपके पास ताकत है, तो आप अपने इस अभियान में सफल भी जरूर हो जाएंगे। दरअसल जो सत्ता है - आदिकाल से उसका स्वभाव, उसकी मानसिकता उस सत्य को ही उजागर होने की अनुमति देती है, जो उसके हित में हो, उसकी स्वार्थ पूर्ति और उसके अहंकार तुष्टि में बाधक न हो। सत्ता उसी को सत्य मानती है, जिसे वह स्वयं सत्य के रूप में स्वीकार कर पाने का साहस जुटा पाती है। बाकी तो बड़े से बड़ा सच भी उसे कचोटता है और मनमाफिक झूठ उसे भीतर तक आनंदित करता है, आज भी यही हो रहा है।
जब राजाओं का जमाना था, उस समय सभी राजाओं के दरबारों में ऐसे कवि, ऐसे भांड होते थे जो अपने अन्नदाता की प्रशंसा में गीत घड़ते थे, तारीफ में गीत गाते थे। सत्य बोलने लिखने वालों को राज दरबारों में भी जगह नहीं मिलती थी। अपवाद तो हर स्थिति - परिस्थिति में सदैव उपलब्ध रहते ही हैं। अन्नदाता राजा को अपनी बुराई यानी कि सच सुनने की आदत ही नहीं होती थी, तो कवियों को झूठ लिखना और भांडों को झूठ गाना पड़ता था। मुझे व्यक्तिगत रूप से ऐसा लगता है कि इस 'असत्य पोषण प्रथा' के चलते राजाओं का इतिहास भी सच्चा नहीं लिखा गया होगा, लिखा जा ही नहीं सकता है। शायद आज भी ऐसा ही हो रहा है, नहीं क्या?
अब जमाना बहुत बदल गया है। राजाओं की निंदा करने वालों को जेलों में सड़ना पड़ता था, सूली पर टंगना पड़ता था। न्यायप्रिय राजा भी झूठ और चाटुकारों से घिरे होने के चलते, निर्दोष को भी दंड देने का पाप कर बैठते थे। जो सच बोलने वाला चाटुकारों का प्रिय नहीं होता था, वे लंपट उसे राजा का द्रोही बनाकर प्रस्तुत कर दिया करते थे और इस तरह सत्य का गला घोट दिया जाता था। ऐसे दरबारी - षड्यंत्र इतिहास का हिस्सा रहे हैं आज भी कुछ ज्यादा बदला नहीं है।
अब राजशाही नहीं है लेकिन सत्ता के शिखर पर बैठा व्यक्ति, स्वयं को राजा से कम नहीं समझता है। अब लोकतंत्र है और सत्ता पर काबिज व्यक्ति को जनता ही चुनकर भेजती है जनप्रतिनिधि और जन सेवक के रूप में, परंतु सत्तासीन नेता जनता को अपनी प्रजा, अपनी रियाया मानता है और उसके साथ वैसा ही व्यवहार करता है। सत्ता के शिखर पुरुष प्रजा को केवल उस सत्य से ही रूबरू होते हुए देखना चाहता है, जो सत्य उसकी छवि एक महान न्याय प्रिय विकास पुरुष के रूप में स्थापित कर सकता हो और इस तरह के असत्य को सत्य के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए यदि कुछ सच्ची आवाजों को दबाना पड़े तो सत्ता पुरुष इसे कतई गलत नहीं मानता है।
'राजाजी' की प्रजा को सच देखने सुनने का अधिकार भी नहीं मिलता है क्योंकि सच बोलने और दिखाने वालों को 'राजाजी' पसंद नहीं करते हैं। दरबारी भांड भी चाहते हैं, प्रजा वही देखे जो 'राजाजी' की शान के खिलाफ न हो। समय बदल जाता है, लेकिन शासक का सोच आदिकाल से एक जैसा ही चला आ रहा है - 'सच वही जो राजा को भाये, असली सच भाड़ में जाये।' अपवाद से इंकार नहीं।