भारत एक कृषि प्रधान देश है। भारत एक उभरती अर्थव्यवस्था वाला देश है। भारत विकासशील देश है, लेकिन आप माने या न माने मेरा तो यह मानना कि भारत 'नारा प्रधान' देश है। यहां कृषि, किसान, अर्थव्यवस्था, कानून व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था से ज्यादा 'नारे' महत्वपूर्ण हैं। नारे जनता तक जल्दी पहुंचते हैं और शीघ्र प्रभाव दिखाते हैं, इसलिए नारे सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं। सच पूछो तो जनता से भी ज्यादा। सरकारों का सोच रहा है नारों से जनता का पेट भर दो। जनता नारे ओढ़े, नारे बिछाए, नारे पीए, नारे खाए, बीमारी में नारे रूपी औषधि से काम चलाए। नारे के जरिए यहां से वहां जाए। वर्तमान सरकार भी नारों की पक्की पैरोकार है, इसके दिए नारों की भी भरमार है।
वर्तमान सरकार मुक्ति के बहुत अधिक पक्ष में है, शायद इसीलिए कि प्रत्येक व्यक्ति मुक्ति चाहता है। मुक्ति का सबसे अधिक महत्व है, यह धर्म ग्रंथों और महापुरुषों ने भी बतलाया है।
सरकार आपको, मुझे बोले तो हम सब को मुक्ति दिलाने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देती है। सरकार के नारे इस बात की पुष्टि करते हैं - 'देश को आतंक से मुक्ति दिलाएंगे, समाज को भयमुक्त बनाएंगे, गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाएंगे, समाज को अपराध मुक्त बनाएंगे, सड़कों को गड्ढा मुक्त बनाएंगे, राष्ट्र को भ्रष्टाचार मुक्त बनाएंगे, देश को गरीबी मुक्त बनाएंगे। इस नारे के लिए तो तारीख भी तय हो चुकी है- 2022 की 25 दिसंबर। अरे हां! इस सरकार का एक सबसे महत्वाकांक्षी नारा है - 'भारत को कांग्रेस मुक्त बनाएंगे'। इसी नारे पर सबसे ज्यादा जोर है सरकार का।
उपरोक्त कोई भी नारा पूरी तरह से कामयाब नहीं हुआ है और ना ही होने की कोई संभावना दूर-दूर तक दिखाई देती है। नारों की सफलता रेगिस्तान में वर्षा की तरह संदिग्ध है। सरकार के अलावा सभी इस बात को स्वीकार करते हैं कि कृषि का हाल अच्छा नहीं है, किसान परेशान है, अशिक्षा का प्रतिशत घटा नहीं है, सड़कों पर गड्ढों की भरमार है, स्वच्छता के नाम पर ड्रामा ज्यादा हो रहा है, भ्रष्टाचार सभी सरकारी दफ्तरों में अधिकांश कुर्सियों पर बाबू और अफसरों के साथ बैठा मौज कर रहा है, देश के प्रत्येक हिस्से से अपराधों की अनगिनत खबरें रोजाना आती ही हैं, प्रदूषण दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है, जिसे दिवाली पर पटाखे छोड़ने पर पाबंदी लगाने जैसे उपायों से खत्म करने की कोशिश की जा रही है। सात साल से ज्यादा हो गए गंगा साढ़े सात मीटर भी साफ नहीं हुई है। गंगा निर्मलता और अविरलता के लिए तरस रही है। ...और सबसे मजे की बात तो यह है कि 'सबका साथ सबका विकास' का नारा देने वाली सरकार के शासन में भारत में भुखमरी बढ़ी है। आंकड़े बताते हैं कि ग्लोबल हंगर इंडेक्स की नई रिपोर्ट में हम बहुत नीचे आ गिरे हैं। हमारा 'नारा प्रधान' देश कब सबका पेट भरने योग्य होगा, कोई बताता ही नहीं है।