कुछ बातें बुरी होने के बावजूद बताने लायक होती हैं और बताने लायक भी इसलिए होती हैं, क्योंकि उन बुरी बातों से भी सबक मिलता है, उन बुरी बातों में भी एक संदेश छिपा होता है। आज आपसे एक बुरी लगने जैसी एक बात शेयर कर रहा हूं जो मुझे मेरे मित्र फुल्लू जी ने बताई थी।
...और वो बात यूं है कि तानाशाह स्टालिन एक दफा पोलित ब्यूरो की बैठक में जिंदा मुर्गी ले आए। बैठक के बीच उन्होंने हाथ में दबोची मुर्गी के पंख एक-एक कर उखाड़ने शुरू किए।
मुर्गी दर्द से चीखती-चिल्लाती रही। खून उसके अंगों से टपकता रहा। दिल को दहला देने वाली चीखों के बीच स्टालिन बगैर विचलित हुए मुर्गी के पंख तब तक उखाड़ते जब तक कि वह पूरी तरह पंख विहीन नहीं हो गई। इसके बाद स्टालिन ने मुर्गी को फर्श पर फेंक दिया। फिर जेब से कुछ मुर्गी दाना निकाला और दर्द से कांपती बिना पंख की मुर्गी की ओर उछालने लगे। मुर्गी दाना खाने लगी। स्टालिन उठकर चले तो मुर्गी पीछे-पीछे चली, बैठे तो उनके पैरों के पास बैठ गई और फैंके गए दाने चुगती रही।
यह सब करने के बाद स्टालिन अपने सहयोगियों से मुखातिब हुए। उन्होंने कहा - 'ये मुर्गी जनता की प्रतीक है। आप भले उसकी ताकत छीन लें, उसे मारें-पीटें, चाहे दुत्कार कर छोड़ दें। फिर आप उसे उस घड़ी कुछ टुकड़े दें, जब वह हर तरह से असहाय और हताश हो चुकी हो। तब, ऐसी परिस्थिति में वह जनता सदा के लिए आपके मुरीद हो जाएगी। वह सोचेगी सदा आप ही उसके रहनुमा थे। लोगों को याद ही नहीं रहेगा कि उसकी यह दशा दरअसल आप ही के कारण हुई।'
यह प्रसंग प्रेरणादायक है और किसी हद तक सच के बहुत बहुत नजदीक भी है। क्या इसको पढ़ते हुए आपको यह महसूस नहीं हो रहा कि आप और हम वह मुर्गी ही हैं, जिसके पंख स्टालिन नोच का आनंदित हो रहा था और अपने साथियों सहयोगियों को जनता होने का अर्थ बता रहा था। मुझे तो इसे पढ़ते-लिखते सिहरन महसूस हुई। आप संवेदनशील हैं तो आपके साथ भी ऐसा जरूर हुआ होगा। आप हम मुर्गी थे, मुर्गी हैं और मुर्गी ही रहेंगे। यही हमारी मतलब आम जनता की नियति है। सरकार किसी की भी हो पंख तो हमारे ही नोचे जाने हैं। लहूलुहान तो हमें ही होना है। दर्द से हमें ही बिलबिलाना है।...और विडंबना यह है कि हम मुर्गियों को हमारे पंख नोंचने वालों को खुद ही चुनना है। स्टालिन की यह तानाशाही होगी लेकिन अब यह व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। और मुर्गी विरोध करने की स्थिति में नहीं है। पंख नुचवाकर दाना पाने की आदत जो पड़ गई है।