Women Of Sikhi - बेटों की कुर्बानी देने वाली 12 बहादुर सिख महिलाओं का नाम ब्रिटेन के स्पेशल कैलेंडर में शामिल
भारत
चेतना मंच
15 Apr 2023 11:01 PM
Women Of Sikhi - सिख धर्म जो अपनी वीरता के लिए जाना जाता है, इस धर्म में ना सिर्फ वीर पुरुषों का जन्म हुआ, बल्कि इस धर्म में कई ऐसी वीरांगनाएं पैदा हुई जो अपनी धर्म की रक्षा के लिए कुर्बानी देने से पीछे नहीं हटी। आज के इस पोस्ट में हम सिख धर्म की उन 12 महिलाओं के बारे में बात करने वाले हैं जिन्होंने अपने धर्म की रक्षा के लिए अपने बेटे की कुर्बानी दे दी। जिनके लिए ब्रिटेन के संगठन महाला-9 ने चैरिटी ग्रुप रियालाइज वन के साथ मिलकर एक कैलेंडर रिलीज किया, जिसको 'वुमन ऑफ सिखी (Women Of Sikhi)' नाम दिया और जिसमें इन 12 बहादुर महिलाओं का नाम शामिल किया।
आइए जानते हैं सिख धर्म की वो महिलाएं कौन हैं जिन्होंने अपने धर्म की रक्षा के लिए अपने बेटों की कुर्बानी दे दी -
Women Of Sikhi -
बेबे नानकी (Bebe Nanaki) -
इन्हें पहली सिख महिला के रूप में जाना जाता है। यह सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक की बड़ी बहन थी। बेबे नानकी ने ही सबसे पहले गुरु नानक के कौशल और गहन दृष्टिकोण को पहचाना था। यह सदैव गुरु नानक के जीवन का सहारा बनी रही ।
माता सुलखनी (Mata Sulkhani)-
सिख धर्म के संस्थापक और पहले गुरु नानक देव की पत्नी थी माता सुलखनी। सिख समुदाय की नींव रखने के लिए यह नानक देव के साथ एक स्तंभ के रूप में खड़ी रही। बीबी नानकी का इन्होंने जीवन पर्यंत सम्मान किया। पंजाब में घर वापस आने वाले सभी सभाओं की देखभाल इन्होंने की।
माता खीवी (Mata Khivi) -
सिख धर्म के दूसरे गुरु अंगद देव की पत्नी माता खीवी को सिख समुदाय के शुरुआती दौर की एक प्रमुख महिला के रूप में जाना जाता है। लंगर सेवा करने के लिए यह दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। सिखों के पवित्र ग्रंथ 'श्री गुरु ग्रंथ साहिब' में उल्लेखित होने वाली ये एकमात्र सिख महिला है ।
बीबी अमरो (Bibi Amaro) -
सिख धर्म के दूसरे गुरु अंगद देव और खीवी की बेटी थी बीबी अमरो (Bibi Amaro)। इनके पति के चाचा अमरदास जो सिख धर्म के तीसरे गुरु बने थे, वो धर्म गुरु अंगद देव के शिष्य थे और उनसे मिलने कभी कबार उनके पास जाया करते थे। जहां पर एक बार उन्होंने बीबी अमरों की मधुर आवाज में गुरबाणी सुनी। बीबी अमरो की आवाज से अमर दास इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने बीवी अमरो को सिख धर्म का प्रचार करने के लिए गठित 22 मंजिलों में से एक का प्रमुख नियुक्त कर दिया।
बीबी भानी (Bibi Bhani)-
ये सिखों के तीसरे गुरु अमर दास की बेटी और सिखों के चौथे गुरू रामदास की पत्नी थी। मात्र 47 साल की अवस्था में इनके पति का देहांत हो गया। तब इन्होंने 6 सालों तक उपाधि ग्रहण कर आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति की। और अपने सबसे छोटे बेटे गुरु अर्जन देव को सिख गुरु की उपाधि प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया।
माता नानकी (Mata Nanaki) -
ये सिख धर्म के छठवें गुरु, गुरु हरगोविंद सिंह की पत्नी थी। माता नानकी ने 5 सिख गुरुओं की देखभाल और सेवा की। गुरु हरगोविंद सिंह के समय में अमृतसर में सिख समुदाय के विस्तार को देखा और इस अवधि के दौरान ये एक नेत्री की भूमिका में भी थी। इनके बेटे गुरु तेग बहादुर सिख धर्म के नौवें गुरु बने। सिख काल के मार्गदर्शन की ये निरंतर शक्ति बनी रहीं।
Wonen Of Sikhi -
माता कौलन (Mata Kaulan)-
माता कौलन मुस्लिम गुरु रुस्तम खान की गोद ली हुई बेटी थी, जो बाद में सूफी संत मियां मीर की शिष्य बन गई थी। इन्हें गुरुवाणी से काफी लगाव था यही वजह है कि जब इन्हें गुरु हरगोबिंद सिंह की पहली झलक मिली तभी से वह सच्चे दिल से उनकी शिष्या बन गई। बाद में गुरु हरगोविंद सिंह के सहयोग से वह लाहौर से आकर अमृतसर में रहने लगी।
माता भागो (Mata Bhago)-
यह एक प्रतिष्ठित सिख योद्धा के रूप में भी जानी जाती हैं। 1704 में इन्होंने मुगलों के खिलाफ गुरु गोविंद सिंह की सेना का नेतृत्व किया था और मुगलों की सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था। हालांकि इस युद्ध में ये गंभीर रूप से घायल हुई थी। इस युद्ध के बाद उन्होंने अपना शेष जीवन निहंगिनी के रूप में गुरु की सेना में सेवा करते हुए बिताया।
बीबी मुमताज साहिब (Bibi Mumtaz Sahib) -
इनका जन्म मुस्लिम समुदाय में निहंग खान की बेटी के रूप में हुआ। इनके पिता गुरु गोविंद सिंह के भक्त थे। पंजाब के रोपड़ में बीबी मुमताज साहिब की याद में एक गुरुद्वारा बनवाया गया है।
साहिब कौर (Sahib Kaur) -
यह सिख धर्म के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह की पत्नी थी जिन्हें खालसा पंथ की मां के रूप मे भी जाना जाता है। सन 1699 में आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ की नींव रखी गई थी साहिब कौर खालसा समुदाय को अपने बच्चों के रूप में संबोधित करते थे और गुरु गोविंद सिंह के शस्त्रों की दैनिक पूजा करती थी उनके नाम पर एक आधुनिक रूप में एक 'कौर' शब्द जोड़ा गया जो बाद में खालसा पंथ में बपतिस्मा लेने के बाद महिलाओं को दिया जाने वाला नाम है।
दीप कौर (Deep Kaur)-
गुरु गोविंद सिंह को देखने के लिए दीपक और अपने गांव से आनंदपुर साहिब तक की यात्रा की जो काफी प्रसिद्ध हो गई। दर्शन इस यात्रा के दौरान उन्हें चार बदमाशों ने लूटने की कोशिश की जिन से बचने के लिए बहुत ही बहादुरी के साथ दीप कौर ने तलवार पकड़ी और 3 बदमाशों को मार गिराया जबकि एक चोर को नीचे गिरा दिया। उनकी बहादुरी की यह खबर गुरु गोविंद सिंह तक पहुंची। जब वह आनंदपुर साहिब पहुंची तो गुरु गोविंद सिंह ने उनकी बहादुरी की प्रशंसा की। वह मंडली में शामिल अन्य महिलाओं के लिए भी प्रोत्साहन बनी।