भारत में ढोंगी बाबाओं का जाल कोई नया नहीं है, लेकिन हाल के मामलों ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि आखिर क्यों पढ़ी-लिखी और प्रभावशाली महिलाएं भी इनके चंगुल में फंस जाती हैं?

Web of Fake Gurus : भारत में ढोंगी बाबाओं का जाल कोई नया नहीं है, लेकिन हाल के मामलों ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि आखिर क्यों पढ़ी-लिखी और प्रभावशाली महिलाएं भी इनके चंगुल में फंस जाती हैं? महाराष्ट्र के नासिक में सामने आए अशोक खरात केस ने इस बहस को और तेज कर दिया है, जहां सैकड़ों महिलाओं के शोषण और ब्लैकमेलिंग के आरोप लगे हैं।
महिलाओं के बाबाओं के जाल में फंसने के पीछे सबसे बड़ा कारण डर और असुरक्षा है। महिलाओं को परिवार टूटने का डर लगा रहता है। पति या रिश्तों के बिगड़ने का डर भी उनके अंदर होता है। महिलाओं में सामाजिक बदनामी का भय भी होता है और यही डर उन्हें ऐसे लोगों की ओर धकेलता है जो चमत्कार और समाधान का दावा करते हैं।
यह मानना गलत होगा कि सिर्फ अशिक्षित महिलाएं ही शिकार बनती हैं। असलियत यह है कि कई पढ़ी-लिखी और हाई-प्रोफाइल महिलाएं भी ऐसे मामलों में फंसती हैं। इसका कारण है उनकी भावनात्मक निर्भरता, आत्मनिर्भरता की कमी और निर्णय लेने में आत्मविश्वास की कमी का होना।
ढोंगी बाबा सिर्फ अंधविश्वास नहीं बेचते, वे मनोविज्ञान का खेल खेलते हैं। ऐसे बाबा लोग पहले भरोसा जीतते हैं फिर निजी जानकारी हासिल करते हैं और बाद में उसी से ब्लैकमेल करते हैं। अशोक खरात जैसे मामलों में यही पैटर्न साफ दिखता है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में अंधविश्वास के खिलाफ कड़े कानून हैं, फिर भी ऐसे मामले सामने आते हैं। इसका मतलब साफ है कि कानून है, लेकिन लागू करने में ढिलाई है। शिकायत दर्ज कराने में सामाजिक दबाव बाधा बनता है।
ढोंगी बाबाओं के खिलाफ सबसे बड़ी चुप्पी समाज और असली धर्मगुरुओं की है। कोई खुलकर विरोध नहीं करता और धर्म के नाम पर सब कुछ सह लिया जाता है। इससे पाखंडियों का हौसला बढ़ता है। भारतीय समाज में महिलाओं को बचपन से ही व्रत, पूजा, कर्मकांड
से जोड़ा जाता है। लेकिन यही धार्मिकता कई बार अंधभक्ति में बदल जाती है, जहां तर्क और सवाल पूछने की जगह खत्म हो जाती है।
सबसे अहम कारण है आर्थिक और मानसिक आत्मनिर्भरता की कमी। निर्णय खुद नहीं ले पाना, हर समस्या का बाहरी समाधान ढूंढना
और कोई बचा ले वाली मानसिकता का होना। यही स्थिति उन्हें बाबाओं के जाल में फंसा देती है। इस समस्या का हल सिर्फ कानून नहीं है, बल्कि जागरूकता, आत्मनिर्भरता और तर्कशील सोच का होना जरूरी है।