ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के बीच मुकेश भारद्वाज ने क्यों छेड़ दिया ‘भारत रत्न’ का राग ? जनसत्ता के व्यंग्य लेख में SIR, चुनाव आयोग, विपक्ष की चुप्पी और सत्ता की राजनीति पर ऐसा तंज कसा गया है, जो कई सवाल छोड़ जाता है।

Noida News : नोएडा से प्रकाशित जनसत्ता समाचार पत्र देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्र समूह द इंडियन एक्सप्रेस के हिंदी अखबार का नाम है। जनसत्ता के संपादक और नोएडा में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारद्वाज ने 3 अक्टूबर 2026 के अंक में एक विचारोत्तेजक व्यंग्य लेख लिखा है। ‘भारत रत्न का करो जतन’ शीर्षक से प्रकाशित इस लेख में उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, विपक्षी दलों की राजनीतिक रणनीति, चुनाव आयोग की भूमिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर तीखे व्यंग्य के माध्यम से अपनी बात रखी है। नोएडा से प्रकाशित जनसत्ता समाचार पत्र के इस लेख को सभी को जरुर पढ़ना चाहिए । Noida News
मुकेश भारद्वाज का यह लेख अपनी व्यंग्यात्मक शैली, राजनीतिक संदर्भों और लोकतंत्र से जुड़े गंभीर सवालों के कारण ध्यान खींचता है। लेख में उन्होंने विपक्ष की एकजुटता, विभिन्न राजनीतिक दलों की चुप्पी और चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों को आधार बनाया है। लेखक ने व्यंग्यात्मक अंदाज में सुझाव दिया है कि विपक्ष को मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग करने के बजाय उन्हें भारत रत्न देने की मांग करनी चाहिए। चेतना मंच अपने पाठकों के लिए जनसत्ता के 3 अक्टूबर 2026 के अंक में प्रकाशित मुकेश भारद्वाज का यह चर्चित व्यंग्य लेख प्रस्तुत कर रहा है। Noida News
लेखक: मुकेश भारद्वाज, संपादक, जनसत्ता
'बहुत जहीन था, वो खेल जीत सकता था मगर वो खेल का नक्शा बदल कर बैठ गया' टीवी पत्रकारों की तरह इस बार हमें भी विपक्ष से एक बड़ी शिकायत है। हमारी भी शिकायत यही है कि विपक्ष ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और उन पर कार्रवाई के पीछे क्यों पड़ा है? विपक्ष से हमारा नम्र अनुरोध है कि वह भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए वही मांग करे जो डबल इंजन वाले मुख्यमंत्री कर चुके हैं। जो मांग जंतर मंतर पर पिछले दिनों देनों गूंजी है। विपक्ष को सलाह है, मुख्य चुनाव आयुक्त को भारत रत्न देने की मांग पुरजोर तरीके से करे। पिछले लंबे समय से विपक्ष आरोप लगा रहा था कि भारत में सभी संस्थाएं सत्ता के साथ अनुबंध कर रही हैं। संस्थाओं ने अपनी स्वायत्तता का प्रमाणपत्र सत्ता-पक्ष के 'अमानत घर' में जमा कर दिया है। अभी तक यह सब आरोप था। लोकतंत्र में इस तरह के आरोप लगते रहते हैं। लेकिन ज्ञानेश कुमार के रूप में देश को पहली बार इस आरोप का पुख्ता सबूत मिला कि देश की संस्थाएं, सत्ता के साथ समझौता कर रही हैं। आजादी के बाद से ही देश की कई संस्थाओं पर कई तरह के आरोप लगे। संस्थाओं पर लगे इन आरोपों पर सत्ता की वैसी ही चुप्पी हुआ करती थी, जैसे विपक्ष का कोई दल यह देख कर चुप्पी साध लेता है कि अन्य दल को महज इसलिए परेशान किया जा रहा है कि वह विपक्ष है। अखिलेश यादव पर कोई आरोप लगता है तो मायावती चुप रहती हैं। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो कांग्रेस से लेकर वाम दलों ने आंखें फेर लीं। केरल में माकपा नेतृत्व पर आरोप लगे तो कांग्रेस का भाव था-हम आपके हैं कौन ! इस संदर्भ में तो आम आदमी पार्टी विडंबना का प्रतीक ही बन गई। आम आदमी पार्टी कहीं जीतती है तो उसे सत्ता पक्ष की 'ब' पार्टी बता दिया जाता है। वहीं सत्ता पक्ष ने आम आदमी पार्टी के पूरे नेतृत्व को ही जेल पहुंचा दिया। आम आदमी पार्टी के पक्ष में बोलना तो दूर विपक्ष ने अजीब सी चुप्पी साध रखी थी। राहुल गांधी से लेकर सोनिया गांधी की सरकारी एजंसियों के सामने पेशी हो रही थी तो अन्य विपक्षी दलों में सुई पटक सन्नाटा था। राजद और जद (एकी) एक-दूसरे की मुसीबत में 'मैं न बोलूंगा' वाला राग अलाप चुके हैं। ममता बनर्जी आज इंडिया गठबंधन में इसलिए बोल रही हैं क्योंकि फिलहाल उनकी पार्टी का निशान भी उनके पास नहीं है। नीतीश कुमार पर वैसी बहस चल रही है, जो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री के कानों में भी नहीं पड़ रही है। ज्ञानेश कुमार वो वाहिद कारण हैं जब विपक्ष एक मंच पर आया । यह एकता इसलिए नहीं बनी कि ज्ञानेश कुमार के कारण कोई सौहार्दपूर्ण माहौल बना। यह बिहार और बंगाल के मतदाताओं के दर्द की साझेदारी थी। इसके पीछे बंगाल के वे 27 लाख मतदाता हैं, जिनका वोट काट दिया गया। इसके पीछे दिल्ली का वह बेला एस्टेट है जहां पिछले चुनाव में 729 मतदाताओं के नाम दर्ज थे, लेकिन मसविदा सूची में इनमें से केवल एक व्यक्ति का नाम शामिल है। जिन लोगों ने 2025 में मतदान किया था, वे भी अब चुनाव आयोग के लिए भूत बन चुके हैं। इसके पीछे अदालत की वे टिप्पणियां हैं जब कहा गया, एक चुनाव में वोट क्या हो जाएगा... उपचुनाव ही तो है...। इसके पीछे वे बीएलओ हैं जिन्होंने अति सख्ती और कम समयसीमा से मिले दबाव के कारण कथित रूप से जान दे दी और उनकी जान जाने के बाद एसआइआर की समयसीमा बढ़ा दी गई। भारत जैसे बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और विशाल भौगोलिक स्थिति वाले देश में ज्ञानेश कुमार एक ऐसे नाम बन चुके हैं जो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक की जनता के लिए प्रातः स्मरणीय हैं। जहां-जहां एसआइआर के लिए ज्ञानेश कुमार की अगुआई वाली टोली पहुंची वहां-वहां की जनता अपने अस्तित्व को आज भारत में दो तरह के राजनीतिक दल है। जो सत्ता पक्ष के साथ है उन्हें किसी तरह की कोई शिकायत नहीं है। जो विपक्ष में हैं उनके लिए हर कदम मुश्किल है। विपक्षी दलों की मुश्किलों का विरोधाभास उन्हें एक होने भी नहीं दे रहा है। इसलिए विपक्ष को कोशिश करनी चाहिए कि ज्ञानेश कुमार कुर्सी पर बने रहें, ताकि उनकी एकता बनी रहे। आगामी चुनावों का राजनीतिक माहौल और ज्यादा नाजुक होगा। समझौते के दाग वाले ज्ञानेश कुमार अब सत्ता पक्ष के लिए बोझ बन चुके हैं। कुमार सत्ता-पक्ष के लिए मुलायम मक्खन नहीं रहे जी आराम से गले के नीचे उतर जाए। अब वे गले की हड्डी हैं, जिसे न तो उगलते बनता है और न निगलते। यह हड्डी इतनी बुरी तरह फंस गई है कि निगलेंगे तो सत्ता पक्ष गलत और उगलेंगे तो ज्ञानेश कुमार गलत। हर स्थिति में गलत साबित होने के संकट में भी सत्ता पक्ष ने विपक्ष वाली रणनीति पर ध्यान नहीं दिया। रणनीति चुप्पी की। जब मायावती फंसें तो अखिलेश चुप और जब ममता बनर्जी फंसे तो कांग्रेस और वाम चुप। सत्ता-पक्ष को इन आरोपों से चुप्पी ही बचा सकती थी। लेकिन जब साख की सफेदी का बुरा वक्त आता है तो उसके बगल से कोई गाड़ी कीचड़ उछालती हुई निकल जाती है। बाढ़ प्रभावित कीचड़ वाले इलाके में सत्ता का सलाहकार लाल कालीन बिछा जाता है ताकि आपके दागी कदमों के निशान जनता देख ले। यह न्यायशास्त्र के लिए भी कालजयी मामला होगा, जहां आरोपी चोरी नहीं करने की दलील पर चुप है। लेकिन उसके पड़ोसी जाकर गवाही दे रहे हैं कि महाशय कभी चोरी कर ही नहीं सकते हैं। सत्ता पक्ष के प्रवक्ता से लेकर टीवी पत्रकार कह रहे हैं कि चोरी नहीं हुई है, चोर तो बस सोशल मीडिया के लिए रील बनाने के लिए आया था ताकि जागरूकता फैला सके, चोरों से बचने के तरीकों पर। यही पर शामत आती है 'सच' की। राजनीति में आरोपों से घिरने के बाद पक्ष-विपक्ष का पसंदीदा वाक्य है-सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं। सत्ता पक्ष से लेकर टीवी चैनल पर बैठे उनके 'प्रबक्ता' बार-बार कह रहे हैं कि वे ज्ञानेश कुमार के नहीं, सच के साथ हैं। एसआइआर एक जरूरी प्रक्रिया है और हम इसके साथ हैं। जरूरी प्रक्रिया पर गैरजरूरी इरादों को वाजिब ठहराने के शोर में इस बार 'सत्य' वाकई परेशान हो चुका है और हाथ जोड़ कर स से सत्य और असे असत्य के फर्क को समझने की विनती कर रहा है। इसलिए विपक्ष के पास सुनहरा मौका है कि वह सत्य के बचाव दस्ते के रूप में दिखे और कोशिश करे कि बतौर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार दिखते रहें। हैं थित की माल जो हैं। होली हालात इस मोड़ पर आ चुके हैं कि सत्य और ज्ञानेश कुमार के बीच अक्षांश और देशांतर का फर्क दिख रहा है। दोनों के साथ खड़े होकर 36 का आंकड़ा ही बन सकता है। राजनीतिक इतिहास में ऐसा समय अपवाद स्वरूप ही आता है जब सत्य की पहचान दूर से की जा सकती है। यह ऐतिहासिक राजनीतिक मौका प्रदान करने के लिए विपक्ष को ज्ञानेश कुमार के लिए भारत रत्न देने की अखिल भारतीय मुहिम शुरू करनी ही चाहिए। Noida News
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