Noida News : आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में हमारे पास सब कुछ है—सुंदर घर, नई कारें, ब्रांडेड कपड़े, महंगे फोन और दवाओं से भरी अलमारियां। लेकिन नहीं है तो सिर्फ —अपनेपन की गर्माहट। रिश्तों की वह मिठास, जो कभी चाय के प्याले के साथ छत पर बैठकर बातें करने से आती थी, आपको नहीं लगता क्या? अब वह मोबाइल (Mobile) स्क्रीन की ठंडी रोशनी में खो रही है?
हमारे समाज में यह चलन सा बनता जा रहा है कि कोई चीज़ टूट जाए तो मरम्मत नहीं होती, हम नई ले आते है। यही हाल अब रिश्तों का भी हो गया है। लोग अपने रूठे को मनाने की बजाय नए दोस्तों की भीड़ में नया संबंध खोज लाते हैं। रिश्तों का यह ‘यूज़ एंड थ्रो’ कल्चर बच्चों तक भी पहुंच रहा है। छोटे-छोटे बच्चे आज एंज़ायटी से जूझ रहे हैं, क्योंकि उनके आसपास वह माहौल ही नहीं बचा जहाँ कोई उन्हें बिना एजेंडा अपनाये या उनकी सुने। स्कूल या डे केयर से घर में आकर वे भी कोनों में सिमट जाते हैं, स्क्रीन पर खो जाते हैं।
युवाओं की स्थिति और भी चिंताजनक है। माता-पिता दोनों वर्किंग हैं। घर में सब कुछ है, सिवाय समय, संवाद व, अपनत्व के। कभी छोटे-2 घरों में भी रिश्तों की महक होती थी। मोहल्लों में ताई, चाची, बुआ, फूफा, नाना, दादा—हर कोई किसी न किसी की जिंदगी का हिस्सा होते थे। घर के भीतर छोटी सी राजनीति, चुहल और शिकायतें ही तो थीं जो हमें ‘इंसान’ बनाए रखती थीं। आज की चुप्पी में वो ‘जीवन की बात’ ही कहीं गुम हो रही है।
हमारे पास हर सुविधा है लेकिन उन सुविधाओं को जीने वाले परिवार के लोग ही नहीं बचे हैं। बच्चे अब पहले की तरह दौड़कर माँ-बाप को गले नहीं लगाते, बल्कि सीधे टीवी या फोन की स्क्रीन में घुस जाते हैं। दोष किसका है जब हमने कभी उन्हें समय ही नहीं दिया, कहानियाँ नहीं सुनाईं, आंचल की छांव नहीं दी—तो हम कैसे उम्मीद करें कि वे हमें बुढ़ापे में सहारा देंगे? वृद्ध आश्रमों के खुलम खुला प्रचार इसी का परिणाम नहीं हैं क्या?
अब तो 'प्राइवेसी' का अर्थ भी बदल गया है। पहले यह पति-पत्नी के निजी क्षणों तक सीमित थी, अब यह बच्चों के मोबाइल से लेकर बुजुर्गों की उपेक्षा तक पहुँच रही है। पति पत्नी के बीच अब साथ बैठना कम, सोशल मीडिया (Social media) पर दिखावे की पोस्ट ज्यादा हो रही हैं। परिवार अब ‘साथ’ में नहीं, ‘साइट’ पर होता है।
अकेलापन अब केवल बुजुर्गों की समस्या नहीं रह गई, यह अब बच्चों, युवाओं और यहाँ तक कि मिड-ऐज लोगों की भी हकीकत है। हमारे पास दवाइयाँ हैं लेकिन दिल के दर्द की दवा नहीं। हमारे पास एसी है लेकिन रिश्तों की गर्माहट नहीं।
आज जब हमारे बच्चे नींद के बजाय थकावट में डूबे हैं, जब खिलौनों की जगह मोबाइल है, जब रिश्तों की जगह ‘लाइक’ और ‘फॉलो’ है—तो सोचिए हम किस ओर जा रहे हैं? क्या हमारी उपलब्धियाँ इतनी बड़ी हैं कि हम अपनों को भूल जाएं?
अब भी समय है
चलिए फिर से मोहल्लों को ज़िंदा करें, और थोड़ी सी प्राइवेसी के बीच अपनत्व की साझेदारी करें। क्योंकि अगर ऐसा नहीं किया, तो एक दिन दवाइयों से भरा घर और सोशल मीडिया से घिरे लोग भी हमें उस तन्हाई से नहीं बचा पाएंगे… जो आज सबसे बड़ा रोग बन चुकी । दवाइयाँ बहुत हैं पर लोग अकेलेपन से मर रहे हैं। Noida News :