क्या दीपावली का त्योहार केवल दीप जलाने, मिठाइयां बांटने और आतिशबाजी करने तक सीमित रह गया है ? क्या हम इस पर्व के वास्तविक धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संदेश को भूलते जा रहे हैं ?

Noida News : दीपावली को हम रोशनी, खुशियों और समृद्धि का त्योहार कहते हैं। इस दिन घरों में दीप जलते हैं, मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा होती है तथा लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं और उपहार देकर खुशियां बांटते हैं। लेकिन क्या दीपावली का वास्तविक अर्थ केवल घरों को रोशनी से सजाना और आतिशबाजी करना रह गया है? क्या अंधकार पर प्रकाश की विजय का संदेश देने वाला यह पर्व आज स्वयं प्रदूषण और दिखावे की चपेट में नहीं आ गया है? नोएडा के वरिष्ठ नागरिक, प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और जागरूक नागरिक अजीत सिंह ने दीपावली के धार्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व का विश्लेषण करते हुए ऐसे कई सवाल उठाए हैं, जिन पर समाज और सरकार दोनों को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। अजीत सिंह का मानना है कि दीपावली केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि अज्ञानता पर ज्ञान, बुराई पर अच्छाई और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। इस पर्व का वास्तविक संदेश तभी सार्थक होगा, जब हम बाहरी रोशनी के साथ-साथ अपने विचारों और व्यवहार में भी सकारात्मकता का प्रकाश फैलाएंगे। Noida News
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अजीत सिंह बताते हैं कि दीपावली शब्द दो शब्दों 'दीप' और 'अवली' से मिलकर बना है। इसका अर्थ है दीपों की पंक्ति। सदियों से भारतीय संस्कृति में मिट्टी के दीपक जलाने की परंपरा चली आ रही है। धार्मिक और शुभ कार्यों में मिट्टी के दीपकों को विशेष महत्व दिया जाता है। इन दीपकों में सरसों का तेल अथवा शुद्ध घी डालकर रुई की बत्ती जलाई जाती है। भारतीय परंपरा में मिट्टी के दीपक को सादगी, पवित्रता और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक माना गया है। पूजा-पाठ, मंगल आरती और संध्या आरती में भी दीप प्रज्वलित करने की परंपरा है। दीपक की लौ मनुष्य को सकारात्मकता, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक चेतना का संदेश देती है।
उनका कहना है कि दीपक का वास्तविक महत्व केवल उसके प्रकाश में नहीं, बल्कि उस संदेश में छिपा है जो वह मनुष्य को अंधकार से बाहर निकलने और जीवन में अच्छे विचार अपनाने की प्रेरणा देता है। Noida News
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दीपावली के धार्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए अजीत सिंह बताते हैं कि त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने अपने पिता के आदेश का पालन करते हुए 14 वर्षों का वनवास पूरा किया। इस दौरान उन्होंने रावण और उसकी आसुरी शक्तियों का अंत कर बुराई पर अच्छाई की विजय स्थापित की। जब भगवान श्रीराम माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे तो पूरी अयोध्या नगरी में उत्सव का माहौल था। उनके स्वागत और आगमन की खुशी में नगरवासियों ने घी और तेल के दीपक जलाकर पूरी नगरी को रोशनी से जगमगा दिया था। इसी परंपरा को दीपोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। यह प्रसंग भारतीय संस्कृति में दीपावली के सबसे महत्वपूर्ण संदेश को सामने रखता है कि कितनी भी बड़ी बुराई क्यों न हो, अंततः विजय सत्य और अच्छाई की ही होती है। Noida News
अजीत सिंह ने दीपावली के साथ जुड़े अन्य धार्मिक पर्वों का उल्लेख करते हुए बताया कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को प्रकृति और गोवर्धन पर्वत के महत्व का संदेश दिया था। भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को समझाया कि गोवर्धन पर्वत और प्रकृति उनके जीवन, पशुधन और आजीविका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जब देवराज इंद्र ने क्रोधित होकर ब्रज में भारी वर्षा कराई तो भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों और उनके पशुओं की रक्षा की। इसी प्रसंग की स्मृति में दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। इस अवसर पर अन्नकूट का प्रसाद बनाकर श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है। इसी प्रकार भगवान शिव द्वारा त्रिपुरासुर का वध किए जाने की धार्मिक मान्यता से जुड़ा देव दीपावली का पर्व कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह दीपावली के लगभग 15 दिन बाद आता है। इस प्रकार दीपोत्सव भारतीय धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग रूपों में खुशियों और आस्था का संदेश देता है। Noida News
अजीत सिंह का कहना है कि दीपावली की सबसे खूबसूरत विशेषताओं में से एक यह है कि यह पर्व धार्मिक सीमाओं से आगे बढ़कर सामाजिक एकता और आपसी प्रेम का संदेश देता है। आज दूसरे धर्मों के लोग भी अपने मित्रों और परिचितों को दीपावली की शुभकामनाएं देते हैं। लोग एक-दूसरे के घर जाते हैं, मिठाइयां और उपहार बांटते हैं तथा खुशियों में शामिल होते हैं। इससे समाज में सांप्रदायिक सद्भाव और भाईचारा मजबूत होता है। भारत के अतिरिक्त नेपाल, श्रीलंका, सिंगापुर, मलेशिया, फिजी, गुयाना और अमेरिका सहित दुनिया के अनेक देशों में दीपावली बड़े उत्साह से मनाई जाती है। विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोग अपने परिवार और मित्रों के साथ इस पर्व को मनाते हैं। अमेरिका में भी विभिन्न राज्यों और संस्थानों में दीपावली के आयोजन तथा सार्वजनिक अवकाश की व्यवस्थाएं देखने को मिलती हैं। Noida News
दीपावली से पहले घरों, दुकानों, कार्यालयों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों की साफ-सफाई कराने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि स्वच्छ और पवित्र स्थान पर मां लक्ष्मी का वास होता है। व्यापारी वर्ग इस दिन को नए कार्यों और शुभ शुरुआत के लिए भी महत्वपूर्ण मानता है। लोग नए वस्त्र पहनते हैं, एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपहार बांटते हैं। उद्योग जगत में कर्मचारियों को बोनस देने की परंपरा भी दीपावली के अवसर पर विशेष महत्व रखती है।
लेकिन अजीत सिंह का एक महत्वपूर्ण विचार यह है कि जिस प्रकार हम दीपावली से पहले अपने घर और कार्यस्थल को साफ करते हैं, उसी प्रकार हमें अपने मन को भी स्वच्छ करना चाहिए। यदि मन में ईर्ष्या, द्वेष, नफरत और नकारात्मक विचार भरे हों तो केवल घर को सजाने से जीवन में वास्तविक सुख नहीं आ सकता।
उनका मानना है कि मन की शुद्धता और अच्छे आचरण से ही परिवार और समाज को स्वर्ग के समान बनाया जा सकता है। Noida News
दीपावली के बदलते स्वरूप पर चिंता व्यक्त करते हुए अजीत सिंह ने पटाखों के बढ़ते इस्तेमाल को गंभीर समस्या बताया है। उनका कहना है कि दीपावली का मूल उद्देश्य अंधकार को समाप्त कर प्रकाश फैलाना है, लेकिन आज आतिशबाजी की प्रतिस्पर्धा में इस पर्व के पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं की अनदेखी की जा रही है। उनके अनुसार, पटाखों का अत्यधिक प्रयोग वायु और ध्वनि प्रदूषण को बढ़ाता है। दीपावली के दौरान और उसके तुरंत बाद दिल्ली-एनसीआर सहित देश के अनेक शहरों में वायु गुणवत्ता की स्थिति खराब हो जाती है। मौसम में बदलाव और हवा में मौजूद प्रदूषक कणों के कारण धुंध यानी स्मॉग की समस्या भी बढ़ सकती है। इसका सबसे अधिक प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों और सांस, अस्थमा तथा हृदय संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों पर पड़ता है। जहरीली हवा के कारण खांसी, गले में खराश, सांस लेने में परेशानी और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ सकती हैं। अजीत सिंह का कहना है कि पटाखों की होड़ में कई बार लोग यह भी भूल जाते हैं कि आतिशबाजी के कारण आग लगने की घटनाएं होती हैं। अनेक बच्चे और अन्य लोग दुर्घटनाओं का शिकार होते हैं। कुछ मामलों में आंखों और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचता है। इसके बावजूद हर वर्ष पटाखों के इस्तेमाल में प्रतिस्पर्धा बढ़ती दिखाई देती है। Noida News
अजीत सिंह ने सुझाव दिया है कि आतिशबाजी को व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा का विषय बनाने के बजाय नियंत्रित और सामूहिक आयोजन के रूप में विकसित किया जा सकता है। उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां कई राष्ट्रीय उत्सवों के अवसर पर सरकारी अथवा अधिकृत आयोजनों के माध्यम से आतिशबाजी के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। शहरों के लोग एक निर्धारित स्थान पर एकत्र होकर इन कार्यक्रमों का आनंद लेते हैं। भारत में भी सरकार और प्रशासन चाहे तो पर्यावरण के अनुकूल उत्सव आयोजित करने की दिशा में प्रभावी कदम उठा सकते हैं। पटाखों के निर्माण, बिक्री, भंडारण और इस्तेमाल के लिए निर्धारित नियमों का कड़ाई से पालन कराया जाना चाहिए। अवैध पटाखा कारखानों और बिना अनुमति बिक्री करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही स्कूलों में बच्चों को वायु प्रदूषण और पटाखों से होने वाले नुकसान के बारे में जागरूक किया जाना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी स्वयं जिम्मेदारी के साथ दीपावली मनाने की आदत विकसित करे। Noida News
दीपावली के आर्थिक और सामाजिक पक्ष पर भी अजीत सिंह ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि त्योहारों के आसपास बाजारों में खरीदारी बढ़ जाती है, लेकिन इसके साथ महंगाई का बोझ भी आम लोगों पर पड़ता है। त्योहारों के मौसम में मिठाइयों, खाद्य पदार्थों और अन्य आवश्यक वस्तुओं में मिलावट की शिकायतें भी सामने आती हैं। मिलावटखोर इस अवसर का फायदा उठाकर लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ करते हैं। अजीत सिंह का मानना है कि सरकार को महंगाई और मिलावटखोरी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। खाद्य पदार्थों की नियमित जांच होनी चाहिए और मिलावट करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने बोनस की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि दीपावली के अवसर पर कर्मचारियों को बोनस मिलने से उनके परिवारों में भी खुशियां आती हैं। हालांकि आम आदमी को त्योहार के दौरान बढ़ती कीमतों से राहत मिलना भी उतना ही आवश्यक है। Noida News
अजीत सिंह के विचारों का सार यह है कि दीपावली का वास्तविक आनंद तभी है जब हम अपने आसपास के लोगों के जीवन में भी खुशियों का प्रकाश फैलाएं। मिट्टी के दीपक जलाएं, पर्यावरण की रक्षा करें, जरूरतमंदों की सहायता करें, मिलावट से बचें और आपसी भाईचारे को मजबूत बनाएं। दीपावली हमें यह सिखाती है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, एक छोटा सा दीपक भी उसे चुनौती दे सकता है। इसी प्रकार समाज में फैली बुराइयों, अज्ञानता, भेदभाव, भ्रष्टाचार और नकारात्मकता को दूर करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। नोएडा के वरिष्ठ नागरिक और सामाजिक कार्यकर्ता अजीत सिंह का यह विश्लेषण समाज को आत्ममंथन करने का अवसर देता है। उनका संदेश स्पष्ट है कि दीपावली केवल घरों को रोशन करने का पर्व नहीं है, बल्कि अपने भीतर की चेतना को जगाने, विचारों को शुद्ध करने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का अवसर भी है। सच्ची दीपावली वही है, जिसमें दीपक घरों में ही नहीं, बल्कि हर इंसान के मन में भी जले और जिसकी रोशनी से समाज का अंधकार दूर हो। Noida News
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