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नोएडा में ईएसआई की सुविधा होने के बावजूद, मजदूरों को इसका लाभ मिलना आसान नहीं है। सेक्टर 24 स्थित ईएसआई अस्पताल में इतनी भीड़ होती है कि इलाज के लिए पूरा दिन लग जाता है। इस वजह से मजदूरों को उस दिन की मजदूरी भी गंवानी पड़ती है।

Noida News : नोएडा की ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें और चमकती इंडस्ट्रियल यूनिट्स अक्सर विकास की कहानी बयां करती हैं, लेकिन इसी शहर के एक बड़े हिस्से में काम करने वाले हजारों फैक्ट्री मजदूरों की जिंदगी इस तस्वीर से बिल्कुल अलग है। यहां मजदूर रोजाना लंबी ड्यूटी, कम वेतन और बुनियादी श्रम अधिकारों की अनदेखी के बीच जीवन गुजार रहे हैं। नोएडा में ईएसआई की सुविधा होने के बावजूद, मजदूरों को इसका लाभ मिलना आसान नहीं है। सेक्टर 24 स्थित ईएसआई अस्पताल में इतनी भीड़ होती है कि इलाज के लिए पूरा दिन लग जाता है। इस वजह से मजदूरों को उस दिन की मजदूरी भी गंवानी पड़ती है। ईएसआई का हाल यह है कि जहां ओपीडी में डाक्टर इलाज करता है उस अस्पताल में दवाई नहीं मिलती। दवा के लिए फिर दूसरे सेक्टर में स्थित दवाखाना जाना पड़ता है। Noida News
खोड़ा जैसे इलाकों में रहने वाले मजदूरों की स्थिति और भी कठिन है। यहां बुनियादी सुविधाओं की कमी है और किसी भी सरकारी काम के लिए गाजियाबाद के दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जिसका मतलब है एक दिन की मजदूरी का नुकसान। नोएडा में लेबर विभाग और अधिकारी मौजूद होने के बावजूद, मजदूरों की समस्याओं पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिखती। न तो श्रम कानूनों का सही पालन हो रहा है और न ही मजदूरों को उनका हक मिल रहा है। Noida News
जब हालात ज्यादा बिगड़े, तो मजदूरों का गुस्सा सड़कों पर दिखाई दिया। प्रदर्शन के जरिए उन्होंने अपनी आवाज उठाई, लेकिन अब भी बड़ा सवाल यही है कि क्या उन्हें उनका हक मिलेगा या यह संघर्ष जारी रहेगा? नोएडा का यह चेहरा उस विकास मॉडल पर सवाल खड़ा करता है, जिसमें इंफ्रास्ट्रक्चर तो चमकता है, लेकिन उसे खड़ा करने वाले मजदूर ही बुनियादी अधिकारों से वंचित रहते हैं। जब तक मजदूरों को पारदर्शी वेतन, सही दस्तावेज और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक यह विकास अधूरा ही माना जाएगा। Noida News
हर सुबह सेक्टर 55 के पास खोड़ा चौक, ममूरा, सेक्टर 63-65 और आसपास के इलाकों में मजदूरों की भीड़ दिखाई देती है। कोई दिहाड़ी की तलाश में खड़ा है तो कोई शेयर आॅटो या साइकिल से फैक्ट्री की ओर भाग रहा है। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और कम उम्र की लड़कियां भी शामिल हैं। ज्यादातर मजदूर सुबह 7-8 बजे घर से निकलते हैं और रात 8-9 बजे लौटते हैं। यानी रोजाना 10 से 12 घंटे की ड्यूटी। इसके बदले उन्हें सिर्फ 10 से 10.5 हजार रुपये महीना मिलता है, जो मौजूदा महंगाई में परिवार चलाने के लिए बेहद कम है।
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कागजों पर इन मजदूरों का प्रॉविडेंट फंड (पीएफ) और ईएसआई कटता दिखाया जाता है, लेकिन असलियत में स्थिति अलग है। मजदूरों को सैलरी स्लिप नहीं दी जाती। अधिकांश को पीएफ नंबर तक पता नहीं। ईएसआई कार्ड या मेडिकल सुविधा का लाभ भी नहीं मिल पाता। ऐसे में अगर कोई मजदूर अपने हक के लिए आवाज उठाना चाहे, तो उसके पास कोई दस्तावेज ही नहीं होता। Noida News
कई मजदूर 10-15 साल से एक ही फैक्ट्री में काम कर रहे हैं, लेकिन उन्हें आज भी अकुशल श्रेणी में रखा गया है। प्रमोशन, वेतन वृद्धि और ओवरटाइम जैसी सुविधाएं लगभग खत्म हो चुकी हैं खासकर 2019 और कोरोना काल के बाद। Noida News
मजदूरों की कमाई और खर्च के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही है:
* किराया: 3000-4000
* राशन: 4000-5000
* बच्चों की पढ़ाई: 1000-1500
* बिजली और गैस: 1500-2000
इन हालात में मजदूरों को परिवार चलाने के लिए पत्नी और बच्चों को भी काम पर भेजना पड़ रहा है। Noida News
नोएडा की कई फैक्ट्रियों में ठेकेदारी व्यवस्था हावी है। ठेकेदार के जरिए काम करने वाले मजदूरों की स्थिति और खराब है:
* उन्हें सैलरी स्लिप नहीं मिलती
* पीएफ और ईएसआई का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं
* वेतन का एक हिस्सा ठेकेदार द्वारा काट लिया जाता है। इस सिस्टम में मजदूर पूरी तरह असुरक्षित रहते हैं। Noida News
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