
बाल-शब्दावली के विषय में सुप्रसिद्ध कवि प्रो. अशोक चक्रधर ने बड़ी ही सार्थक टिप्पणी लिखी है। पद्मश्री प्रो. अशोक चक्रधर ने लिखा है कि पंडित साहित्य चंचल 'साधक' बच्चों के मन में प्रवेश करना जानते हैं। इसका कारण यह है कि उनमें स्वयं एक बच्चा छुपा हुआ है। उनके अंदर का बच्चा बेहतरीन, चचल व सच्चा है। बच्चों को क्या चाहिये और क्या अच्छा लगता है, यह वे भली-भांति जानते हैं। चंचल यह भी जानते हैं कि यदि कुछ और 'अच्छा' है और वह बच्चों को अच्छा नही लग रहा तो स्वयं को उनके अनुकूल और अच्छा कैसे बनाया जाए और, इस प्रकार इन बाल कविताओं में उन्होंने बच्चों के मन में प्रवेश करने के साथ-साथ उनकी सौंदर्य-दृष्टि में प्रवेश किया। अंतत:, बच्चों के मनोलोक में जो समाज और सामाजिक संबंध है, उन द्वारों पर भी उन्होंने दस्तक दी।मेरी खूब सारी शुभकामनाएं उन बच्चों को जो इन नैतिक ज्ञान से पूर्ण कविताओं की पुस्तक "बाल-शब्दावली" को पढ़ेंगे और उनको भी जिन्होंने इन रचनाओं को गढ़ा है। Noida News
दिल्ली हिन्दी अकादमी के पूर्व उप सचिव ऋषि कुमार शर्मा लेखक हैं। बाल-शब्दावली के विषय में ऋषि कुमार ने लिखा है कि कविता केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि संस्कारों की वाहक और उज्जवल भविष्य की आधारशिला हो सकती है। साहित्य समाज का दर्पण होता है, और बाल साहित्य उसका वह हिस्सा है जो नन्हे मनों को संस्कार, संवेदना, ज्ञान, और मूल्यों की ओर अग्रसर करता है। इस दिशा में साहित्य कुमार चंचल 'साधक' का यह नवीन बाल संग्रह "बाल-शब्दावली" 'चंचल अंकल हाजऱि है' की प्रस्तुति के रूप में एक प्रेरणादायक प्रयास है, जो देश प्रेम, प्रकृति प्रेम, नैतिक शिक्षा और खेल जैसे विविध विषयों पर आधारित बाल गीतों को समेटे हुए है।
इस संग्रह में संकलित रचनाएँ केवल मनोरंजन नहीं करती, बांकासकों के सर्वांगीण विकास में सहायक सिद्ध होती है। बाल मनों को राष्ट्रभक्ति की भावना से जोरात आवश्यक है, और यह संग्रह इस दिशा में सफल प्रयास करता है। पं0 साहित्य कुमार चंचल ने बाल गीतों के माध्यम से देश की संस्कृति, स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान, और भारत की गरिमा को सरल भाषा में प्रस्तुत किया है। इस तरह की पंक्तियाँ बच्चों के मन में देश के प्रति सम्मान आर जिम्मेदारी की भावना जगाती है। "जय जवान जय किसान दोनों हैं महान, भारत माता की दोनों है आन-बान-शान।" "जो सीने पर गोली खाता, वो जवान है कहलाता ।" आज जब पर्यावरण संकट एक वैश्विक चिंता का विषय है, तब बच्चों में प्रकृति के प्रेम और संरक्षण की भावना का विकास अत्यंत आवश्यक है। संग्रह में शामिल कुछ गीत वर्षा, वृक्ष, नदी और पक्षियों के बारे में है, जो न केवल बालकों में प्रकृति के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं, बल्कि उन्हें पर्यावरण के प्रति संवेदनशील भी बनाते हैं। "अहो! बाग कितना सुन्दर है, कू-कू-कू कोयल का स्वर है।"
"हरा भरा है इसका आंगन, जिसे देख खुश होता है मन।" "देखो नाच रहा है मोर, बुल बुल चिडिय़ा करती शोर।" आज की शिक्षा में नैतिक मूल्यों की अत्यधिक आवश्यकता है। इस संग्रह में ऐसे अनेक गीत हैं, जो ईमानदारी, सहयोग, विनसता, गुरु वंदन, माता-पिता सम्मान और परिश्रम जैसे मूल्यों को सरल, लयबद्ध और बाल सुलभ शैली में प्रस्तुत करते हैं। "मात-पिता-गुरु और बड़ों का, सदा करो सम्मान। आयु, यश और ज्ञान बढ़ेगा, और बढ़ेगा मान।" "सब अच्छा व्यवहार करो, सच्चाई का मार्ग चुनो।" Noida News
इस प्रकार के गीत बच्चों को बिना उपदेश के नैतिक आचरण की दिशा में प्रेरित करते हैं। संग्रह में कुछ गीत खेलकूद से संबंधित हैं, जो बच्चों को शारीरिक गतिविधियों की ओर उन्मुख करते हैं। इन गीतों के माध्यम से खेल को सिर्फ प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि टीमवर्क, अनुशासन, और आनंद के रूप में प्रस्तुत किया गया है। चंचल जी की भाषा अत्यंत सहज है, प्रवाहपूर्ण और बालकों की समझ के अनुरूप है। उन्होंने कठिन शब्दों से परहेज़ करते हुए सरल शब्दों, तुकांत पंक्तियों और बाल मनोविज्ञान के अनुरूप बिंबों का प्रयोग किया है। उनकी शैली ऐसी है कि गीत स्वाभाविक रूप से स्मरणीय बन जाते है और बच्चों को उन्हें गुनगुनाने में आनंद आता है। Noida News
पं0 साहित्य 'साधक' द्वारा रचित यह बाल गीत संग्रह "बाल-शब्दावली" नि:संदेह बाल साहित्य के क्षेत्र में एक सराहनीय योगदान है। इसकी रचनाएँ बालकों में राष्ट्रीयता, नैतिकता, प्रकृति प्रेम, और शारीरिक सक्रियता जैसी मूलभूत मानवीय विशेषताओं का संचार करती है। सहज भाषा, बाल सुलभशैली और विविध विषय वस्तु के कारण यह साह शैक्षिक संस्थाओं, पुस्तकालयों और घरों में अवश्य रखा जाना चाहिए। यह संग्रह न केवल बच्चों को गाने और आनंदित होने का अवसर देता है, बल्कि उनके व्यक्तित्व निर्माण की दिशा में भी एक सशक्त कदम है। इस अवसर पर मैं पं0 साहित्य कुमार को बधाई देता हूँ।
जाने-माने लेखक तथा रंगकर्मी तहसीन मुनव्वर ने भी बाल-शब्दावली पर बेहतरीन टिप्पणी की है। तहसीन मुन्नवर ने लिखा है कि बच्चों के मन को मनोरंजन के साथ नैतिक मूल्यों से जोडऩे में बाल साहित्य का बड़ा योगदान रहा है। जब से बच्चों के नन्हें हाथों में कलयुगी राह यंत्र मोबाइल आ गया है, बच्चों की बाल साहित्य से दूरी हो गई है। अब बच्चों के लिए पहले जैसी बाल पत्रिकाएं भी उपलब्ध नही है, जो बच्चों में कल्पनाशीलता और रचनात्मकता को बढ़ावा देती थीं। बाल साहित्य बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ नैतिकता के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। "जौनी जौनी यस पापा" और "जिंगल बेल जिंगल बेल" के दौर में अगर कोई अपनी भाषा में बाल साहित्य को समर्पित काव्य रचना कर रहा है तो उसका भरपूर अभिनंदन होना चाहिए। Noida News
बाल साहित्य रखने के लिए कवि में बच्चों की सी चंचलता चाहिए होती है, और चंचल दोनों की युति है, तो बोने पर सुहागा' ही कहा जा सकता है। सच कहूँ तो मुझे पंडित जी के इस रूप की बिल्कुल भी जानकारी नही थी। मुझे उनके अन्दर एक बच्चा खिलखिलाता तो हमेशा दिखाई दिया, लेकिन वह बच्चों के लिए भी रचनाएँ लिखते हैं यह राज अचानक मुझ पर दिवाली के सुतली बम की तरह फटा था। फिर मैंने उनकी कविताएं पढ़ी तो अपना बचपन याद आ गया। बचपन में जो स्कूल में कविताएँ पढ़ी थीं, इनमें से कई कविताएं उनकी याद दिलाने लगी।
'माँ मुझको बंदूक मंगा दो', 'सपना', 'प्रार्थना', 'एकता', 'मदारी', 'चंदा मामा', 'बापू गाँधी', 'प्रकृति' आदि कई ऐसी बाल कविताएं इस संग्रह को सजाने का काम कर रही हैं। जिनको प्रारंभिक विद्यालय के विद्यार्थियों तक पहुँचाने से उनका भाषा कौशल तया उनके सम्पूर्ण विकास में सहायता मिल सकती है। मैं आशा करता हूँ कि पंडित साहित्य चंचल 'साधक' की चंचलता से ओत-प्रोत ये साहित्य की बाल लीलाएं सफलता के सोपान प्राप्त करेंगी। अंत में पंडित साहित्य चंचल 'साधक' जी के अंदर के बालक को प्रणाम करता हूँ, जो उन्हें ऐसे-ऐसे कार्यों के लिए प्रेरित करता है, जिनकी ओर अब किसी की नजऱ नहीं जाती। 'बाल-शब्दावली' के रूप में इस महत्वपूर्ण काव्य संकलन के लिए मेरी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं। जी करता है, बच्चा बन कर कहूँ. "चंचल अंकल आप ग्रेट हैं"। Noida News
प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. मदन लाल वर्मा ‘क्रांत’ नोएडा तथा ग्रेटर नोएडा में रहकर पूरे देश में पहचाने जाते हैं। बाल-शब्दावली पर टिप्पणी करते हुए डॉ. मदन लाल वर्मा ‘क्रांत’ ने लिखा है कि साहित्य का कुमार जब चंचल हो तो शुरूआत बचपन से ही करनी चाहिए और वही किया है, पंडित साहित्य कुमार चंचल 'साधक' ने। तीस (30) जाल गीतों की "बाल-शब्दावली" वह पुस्तिका साहित्य को लेकर, जिसमें 'प्रार्थना' से लेकर 'प्रकृति' रेलगाड़ी' पर 'बापू' के साथ 'आँख मिचौली' 'चंदा मामा' भात के साथ 'चुन्नू मुन्नू' की 'नाव भी चलाने की कोशिश की है। कहीं गदर थानेदार' बनकर मुखिया की चौपाल पर चला जाता है और अपने काम खिंचवाता है तो कहीं 'चालाक भालू' के साथ 'पढऩे वाले बच्चे' 'आदर सत्कार' के साथ 'दिवाली' का गीत गाते हुए दिखाई देते हैं। भारत के अद्वितीय प्रधानमंत्री का सपना 'जय जवान जय किसान' भी उनकी आँखों में आँसू छलकाता है। हमारी 'एकता' कही 'सपना' बनकर ना रह जाए, इसमें ये सभी तीस (30) गीत कामयाब अवश्य होंगे। Noida News
प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. मधु चतुर्वेदी ने भी बाल-शब्दावली पर बेहतरीन टिप्पणी की है। डॉ. मधु चतुर्वेदी ने लिखा है कि मेरे हाथ में पण्डित साहित्य कुमार चंचल 'साधक' की बाल कविताओं के संग्रह " बाल-शब्दावली" की पांडुलिपि है, जिसे देखते हुए मैं हैरान हूँकि कैले कवि ने इन तीस लघु रचनाओं में सम्पूर्ण बाल मनोविज्ञान को पिरो दिया है। बाल मनोविज्ञान को समझना बड़ी टेढ़ी खीर है। किन्तु इस टेढी खीर को चंचल जी ने बड़ी सहजता से एक ऋजु मिष्ठान में ढाल दिया है इनका यह लाघव श्लाघनीय है। इन रचनाओं की सख्या अवश्य सीमित है, किन्तु उनमें अनन्त संभावनाएं खोजी जा सकती हैं। इनमें लगभग वह सभी विषय समेट लिए गए है जो एक बालमन को लुभाने, आलोड़ित व उत्प्रेरित करने में समर्थ हैं।
खेल, शिक्षा, देशप्रेम, कर्तव्यनिष्ठा आदि सभी विषय सोद्देश्य इसमें संचित है। आज का बालक ही कल देश का कर्णधार होगा और कर्णधार होने के लिए पहले उसे एक जिम्मेवार नागरिक होना होगा। ये कविताएं नि:संदेह बालकों को एक जिम्मेवार नागरिक बनने की राह दिखाएंगी। मेरा मानना है कि बच्चों के लिए लिखना कोई बच्चों का खेल नही है पर कवि ने खेल-खेल में ही यह सार्थक प्रयास कर डाला है। साधुवाद! मेरा हार्दिक आशीष है कि यह संग्रह बालकों के मध्य अत्यन्त लोकप्रिय हो और कवि को वांछित सम्मान व प्रतिष्ठा दिलाए। अशीष आत्मिक मंगलकामनाओं के साथ। Noida News