
Noida News : नोएडा की स्पोर्ट्स सिटी के करीब 15 हजार फ्लैट बॉयर्स का भविष्य अभी भी अधर में लटका हुआ है।नोएडा स्पोर्ट्स बॉयर्स को फ्लैट का मालिकाना हक नहीं मिल पा रहा है। इन फ्लैट बॉयर्स की समस्या का समाधान करने के लिए अभी तक भी हाईलेवल कमेटी का गठन नहीं हो सका है और लोक लेखा समिति के आदेशों को लगातार ठेंगा दिखाया जा रहा है। जिस कारण दोषियों की पहचान नहीं हो पा रही है या ये भी कहा जा सकता है कि दोषियों की पहचान को जानबूझ का छिपाया जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, स्पोर्ट्स सिटी परियोजना के कुछ हिस्से का गलत नक्शा पास किया गया है। इस वजह से परियोजना की मूल भावना आहत हुई। जब अलग-अलग बिल्डरों को टुकड़ों में जमीन दी गई तो उन्होंने इमारत बनाने के लिए नक्शा पास कराया। यहां भी उन्होंने खेल सुविधाओं का ध्यान नहीं रखा। ऐसे में परियोजना का काम नियम के तहत नहीं हो पाया।
प्राधिकरण की ओर से इस मामले में जब तक ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (ओसी) नहीं दिया जाता है तब तक फ्लैटों की रजिस्ट्री नहीं हो पाएगी। ओसी तब तक नहीं मिलेगी, जब तक स्पोर्ट्स सिटी का मसला हल नहीं हो जाता है। नियमों को ताक पर रखकर किए गए अवैध निर्माण की वजह से रजिस्ट्री संभव नहीं है। वहीं बिल्डरों को काफी पैसे भी चुकाने हैं। ऐसे में शासन की ओर से कोई फैसला होता है, तभी रजिस्ट्री संभव है।
आपको बता दें कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने सितंबर 2021 में नोएडा प्राधिकरण की परफॉमेंस रिपोर्ट पर आपत्ति जताई थी। महालेखा परीक्षक ने स्पोर्ट्स सिटी के प्रथम चरण का मुद्दा उठाया था। परफॉर्मेंस आडिट रिपोर्ट पर लगाई गई आपत्तियों सुनवाई तो हुई लेकिन आगे कोई कार्यवाहीं नहीं हो सकी। आरोप है कि इस परियोजना का काम पूरा नहीं हुआ और यहां 70 प्रतिशत भाग पर खेल सुविधाओं का विकास नहीं हुआ। 30 प्रतिशत भाग पर बिल्डरों ने इमारत खड़ी कर दी। आरोप यह भी है कि खेल सुविधाओं के लिए आरक्षित जमीन को भी कब्जा लिया गया और मानकों की धज्जियां उड़ाई गई।
इसी कड़ी में पीएसी ने एक-एक परियोजना का सर्वे कर रिपोर्ट देने को कहा था, जिसमें यह बताना था कि अभी कितनी जमीन पर निर्माण हुआ है और कितनी जमीन बची हुई है। इनमें से कुछ परियोजनाएं नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में भी गई हुई हैं। पूरी परियोजना में जमीन के आवंटन शुल्क पर भी सवाल खड़े हुए हैं कि इस परियोजना को स्पेशल बताकर कम रेट पर बिल्डरों को जमीन दी गई।
बड़ा आरोप यह है कि जिन मुख्य बिल्डरों को जमीन दी गई, उन्होंने इस प्लॉट के टुकड़े करते हुए कई बिल्डरों को बेच दिया। यहां से यह परियोजना नाकामी का शिकार हो गई। किसी भी बिल्डर ने खेल सुविधाओं का विकास नहीं किया।