भारत में डायबिटीज के मरीजों की संख्या बढ़ना बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन रहा है। ICMR-INDIAB अध्ययन और इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन के आंकड़े बीमारी के बढ़ते बोझ की ओर संकेत करते हैं। जानिए भारत में डायबिटीज बढ़ने के प्रमुख कारण।
Diabetes : भारत में डायबिटीज के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। पहले जो बीमारी ज्यादातर बड़े लोगों या शहरों तक सीमित लगती थी, अब गांवों और युवाओं तक पहुंच गई है। आंकड़े साफ बताते हैं कि यह सिर्फ धीमी बढ़ोतरी नहीं, बल्कि हर कुछ साल में लाखों-करोड़ों नए मरीज जुड़ रहे हैं। 2000 में भारत में करीब 3.3 करोड़ वयस्क डायबिटीज से प्रभावित थे। 2011 में यह संख्या लगभग 6.1 करोड़ हो गई। 2021 के आसपास ICMR-INDIAB अध्ययन के अनुसार देश में लगभग 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज और 13.6 करोड़ लोग प्रीडायबिटीज (जो डायबिटीज बनने के रास्ते पर हैं) से जूझ रहे थे। राष्ट्रीय औसत प्रचलन लगभग 11.4 प्रतिशत था। International Diabetes Federation (IDF) के 2025 के आंकड़ों के अनुसार 2024 में 20-79 साल के करीब 9 करोड़ वयस्क डायबिटीज के मरीज थे। अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या 15.7 करोड़ तक पहुंच सकती है। यानी हर साल लाखों नए मरीज जुड़ रहे हैं। NFHS-6 (2023-24) के ताजा आंकड़े और डराते हैं। महिलाओं में हाई ब्लड शुगर या दवा लेने वाले 13.5 प्रतिशत से बढ़कर 17.8 प्रतिशत हो गए, जबकि पुरुषों में 15.6 प्रतिशत से 20.9 प्रतिशत। यानी हर पांच पुरुषों में से एक और हर छह महिलाओं में से एक इस समस्या से जूझ रहा है। यह वृद्धि पिछले पांच सालों में ही काफी तेज हुई है।
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सब जगह एक जैसी स्थिति नहीं है। ICMR-INDIAB के अनुसार गोवा में सबसे ज्यादा प्रचलन (26.4 प्रतिशत) है, उसके बाद पुदुचेरी (26.3 प्रतिशत) और केरल (लगभग 23-25 प्रतिशत) का नंबर आता है। तमिलनाडु, दिल्ली, पंजाब और चंडीगढ़ भी ऊंचे स्तर पर हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे कम (लगभग 4.8 प्रतिशत) है, लेकिन वहां प्रीडायबिटीज ज्यादा (लगभग 18 प्रतिशत) है। मतलब, अभी कम मरीज दिख रहे हैं, लेकिन आने वाले सालों में तेजी से बढ़ सकते हैं। दक्षिणी राज्यों में शहरीकरण, कम शारीरिक काम और ज्यादा कार्बोहाइड्रेट वाला खाना मुख्य वजह है। गांवों में भी अब मरीज बढ़ रहे हैं। Diabetes :
मुख्य वजहें साफ हैं। लोग पहले जितना चलते-फिरते और मेहनत करते थे, अब नहीं करते। शहरों में बैठे-बैठे काम बढ़ गया। खाने में सफेद चावल, मैदा, मीठा और पैकेट वाला खाना ज्यादा हो गया। भारतीय शरीर में थोड़ी सी चर्बी भी ज्यादा नुकसान करती है (विसरल फैट), इसलिए कम वजन वाले लोग भी डायबिटीज की चपेट में आ जाते हैं। बच्चे और युवा भी अब टाइप 2 डायबिटीज से प्रभावित हो रहे हैं, जो पहले दुर्लभ था। आनुवंशिक कारण भी भूमिका निभाते हैं, लेकिन जीवनशैली मुख्य ट्रिगर है।
यह बीमारी सिर्फ स्वास्थ्य ही नहीं, जेब भी खाली करती है। एक अध्ययन के अनुसार 2020 से 2050 तक भारत पर डायबिटीज का कुल आर्थिक बोझ (इलाज, काम छोड़ना, परिवार की देखभाल शामिल) लगभग 11.4 ट्रिलियन डॉलर जितना हो सकता है। मरीज और परिवार पर सालाना हजारों रुपये का खर्च पड़ता है। जटिलताएं होने पर यह खर्च और बढ़ जाता है और कई परिवारों को गरीबी में धकेल सकता है।
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सरकार NP-NCD कार्यक्रम के तहत 30 साल से ऊपर के लोगों की स्क्रीनिंग कर रही है। Ayushman Arogya Mandirs में जांच होती है, कई जिलों में NCD क्लीनिक हैं और जरूरी दवाएं मुफ्त दी जाती हैं। Ayushman Bharat से इलाज का खर्च भी कवर होता है। स्क्रीनिंग अभियान चलाए जा रहे हैं और करोड़ों लोगों की जांच हो चुकी है। लेकिन अनजाने मरीजों की संख्या अभी भी ज्यादा है और इलाज जारी रखने में दिक्कत होती है। Diabetes :
हर साल बढ़ते मरीजों को रोकने के लिए सिर्फ अस्पताल काफी नहीं। गांव-गांव और मोहल्ले में स्क्रीनिंग बढ़ाई जाए, स्कूलों में बच्चों को स्वस्थ खाने और खेलने की आदत डाली जाए, और प्रीडायबिटीज वाले लोगों को खास ध्यान दिया जाए। दक्षिणी राज्यों में जहां मरीज ज्यादा हैं, वहां और तेज कदम उठाने की जरूरत है। अगर अभी नहीं संभले तो आने वाले सालों में मरीज और खर्च दोनों बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगे।आंकड़े बताते हैं कि डायबिटीज अब आम बीमारी बन चुकी है। समय रहते सावधानी बरतना ही सबसे अच्छा इलाज है। व्यक्तिगत सलाह के लिए डॉक्टर से बात करें।
(इस आलेख के लेखक विनोद शर्मा वरिष्ठ पत्रकार तथा नोएडा के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
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