सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की ताजा रिपोर्ट ने नोएडा की हवा को लेकर चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 की सर्दियों में नोएडा देश का दूसरा सबसे प्रदूषित शहर रहा, जबकि ग्रेटर नोएडा चौथे स्थान पर दर्ज हुआ। इस सूची में गाजियाबाद पहले नंबर पर रहा।

Noida News : राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा को अब तक तेज रफ्तार विकास, ऊंची इमारतों, एक्सप्रेसवे और कॉरपोरेट कल्चर वाले शहर के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन अब इसी नोएडा की पहचान पर प्रदूषण का गहरा साया पड़ता नजर आ रहा है। सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) की ताजा रिपोर्ट ने नोएडा की हवा को लेकर चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 की सर्दियों में नोएडा देश का दूसरा सबसे प्रदूषित शहर रहा, जबकि ग्रेटर नोएडा चौथे स्थान पर दर्ज हुआ। इस सूची में गाजियाबाद पहले नंबर पर रहा। यह रिपोर्ट केवल आंकड़े नहीं बताती, बल्कि यह भी संकेत देती है कि NCR के इस तेजी से फैलते शहरी क्षेत्र में प्रदूषण नियंत्रण के दावे फिलहाल जमीन पर कमजोर पड़ते दिख रहे हैं। विशेषज्ञों का साफ कहना है कि अगर नोएडा और आसपास के इलाकों में अभी ठोस, सख्त और लगातार कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में यहां की हवा और ज्यादा खतरनाक हो सकती है।
CREA की रिपोर्ट के अनुसार, सर्दियों के दौरान नोएडा में पीएम 2.5 का औसत स्तर 166 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया। वहीं ग्रेटर नोएडा में यह स्तर 151 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। पड़ोसी गाजियाबाद में पीएम 2.5 का औसत 172 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रिकॉर्ड किया गया, जो उसे देश में सबसे ऊपर ले गया। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पूरे शीतकालीन सीजन में नोएडा केवल पांच दिन ही संतोषजनक वायु गुणवत्ता दर्ज कर सका। दूसरी ओर ग्रेटर नोएडा में सिर्फ सात दिन ऐसे रहे, जब हवा अपेक्षाकृत बेहतर श्रेणी में रही। यानी ज्यादातर दिनों में नोएडा के लोगों को खराब या बेहद खराब हवा में सांस लेनी पड़ी।
विशेषज्ञों का मानना है कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा में तेजी से बढ़ते निर्माण कार्य, सड़कों पर वाहनों का दबाव, औद्योगिक गतिविधियां और आसपास के इलाकों में पराली जलाने की घटनाएं प्रदूषण को लगातार बढ़ा रही हैं। नोएडा में बड़े पैमाने पर चल रहे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, नई आवासीय परियोजनाएं और निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल भी हवा की गुणवत्ता को बिगाड़ने में बड़ी भूमिका निभा रही है। इसके अलावा सड़क किनारे जमा धूल, निर्माण सामग्री का खुले में पड़ा रहना और डस्ट कंट्रोल नियमों का कमजोर पालन भी स्थिति को और खराब कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि नोएडा जैसे तेजी से विकसित होते शहर में निर्माण गतिविधियों पर सख्त निगरानी के बिना प्रदूषण पर काबू पाना मुश्किल है।
रिपोर्ट के बाद यह चर्चा भी तेज हो गई है कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा में प्रदूषण नियंत्रण के मोर्चे पर प्रशासनिक सख्ती अपेक्षित स्तर पर नहीं दिखी। विशेषज्ञों का कहना है कि निर्माण स्थलों पर नियमों का पालन सुनिश्चित करने, सड़कों की नियमित मैकेनिकल सफाई कराने और धूल नियंत्रण के प्रभावी उपाय लागू करने में ढिलाई साफ नजर आती है। नोएडा में सार्वजनिक परिवहन की सीमित व्यवस्था भी एक बड़ी चुनौती मानी जा रही है। शहर के विस्तार के मुकाबले मजबूत सिटी बस नेटवर्क और लास्ट माइल कनेक्टिविटी का अभाव लोगों को निजी वाहनों पर निर्भर बना रहा है। यही वजह है कि ट्रैफिक का दबाव बढ़ने के साथ प्रदूषण का ग्राफ भी ऊपर जा रहा है।
विशेषज्ञों ने चेताया है कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा की खराब होती हवा केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि यह सीधे जनस्वास्थ्य से जुड़ा संकट है। लंबे समय तक उच्च स्तर के पीएम 2.5 के संपर्क में रहने से बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर गंभीर असर पड़ सकता है। सांस संबंधी दिक्कतें, एलर्जी, फेफड़ों की बीमारी और हृदय संबंधी समस्याएं ऐसे प्रदूषण से और बढ़ सकती हैं। यही कारण है कि CREA की यह रिपोर्ट नोएडा के लिए एक चेतावनी की तरह देखी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अभी प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहरा सकता है। Noida News