नोएडा के दो IT प्रोफेशनल्स ऋषभ कुमार और शशिकांत सिंह ने 35 हजार रुपये से लहम मटन फूड कार्ट शुरू किया। पहले महीने में 6 लाख रुपये का कारोबार और 5 करोड़ की वैल्यूएशन का प्रस्ताव। पढ़े पूरी खबर।

Noida News:नोएडा शहर से एक बड़ी ही रोचक खबर सामने आई है। खबर यह है कि नोएडा शहर में IT की पढ़ाई करने वाले दो युवक अचानक मटन का ठेला लगाकर क्यों बेचने लगे। आखिर इन दोनों युवकों के साथ ऐसा क्या हुआ जो IT की पढ़ाई करने के बाद दोनों युवक नोएडा शहर में मटन का ठेला लगाकर कमाई कर रहे हैं। IT की पढ़ाई करने वाले दोनों युवक आखिर मटन बेंच कर कितनी कमाई कर रहे हैं और इन दोनों युवकों को मटन का ठेला क्यों लगाना पड़ा। ऐसे ही कुछ सवाल हैं जो नोएडा शहर के सभी नागरिक जानने के लिए बेहद उत्सुक हैं। Noida News
नोएडा की सड़कों पर इन दिनों एक ऐसा फूड कार्ट चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसकी कहानी किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं है। एक तरफ मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करने वाले दो युवा प्रोडक्ट मैनेजर, दूसरी तरफ सप्ताहांत में सड़क किनारे खड़ा उनका छोटा सा मटन का ठेला। सप्ताह के पांच दिन कंप्यूटर, मीटिंग, टारगेट और कॉरपोरेट जिम्मेदारियां तथा शनिवार और रविवार को ग्राहकों की भीड़ के बीच खाना पकाने और परोसने की मेहनत। इस अनोखे प्रयोग ने कुछ ही सप्ताह में ऐसा रंग दिखाया कि नोएडा ही नहीं, बल्कि दिल्ली-एनसीआर के फूड लवर्स के बीच भी इसकी चर्चा होने लगी। इन दोनों युवाओं ने साबित किया है कि उद्यमिता के लिए हमेशा बड़ी पूंजी, आलीशान दुकान या करोड़ों रुपये के निवेश की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक अच्छा आइडिया, अपने काम पर भरोसा, सीमित मेन्यू, गुणवत्ता और लगातार मेहनत भी किसी छोटे कारोबार को बड़ी पहचान दिला सकती है। इस कहानी के दो मुख्य किरदार हैं ऋषभ कुमार और शशिकांत सिंह। दोनों ने मिलकर 'लहम' (LAHAM) नाम से एक फूड ब्रांड शुरू किया। दिलचस्प बात यह है कि जिस कारोबार को उन्होंने लगभग 35 हजार रुपये की शुरुआती पूंजी से खड़ा करना शुरू किया, उसी कारोबार के लिए उन्हें महज कुछ समय में 5 करोड़ रुपये की वैल्यूएशन का प्रस्ताव मिलने की बात सामने आई। लेकिन दोनों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के बजाय अपने दम पर कारोबार को आगे बढ़ाने का फैसला किया। Noida News
ऋषभ कुमार और शशिकांत सिंह पहले बेंगलुरु में एक साथ काम करते थे। दोनों कॉरपोरेट क्षेत्र में प्रोडक्ट मैनेजर हैं और इस वर्ष नोएडा आए। नौकरी के साथ कुछ अपना करने की इच्छा दोनों के मन में थी। खाने के प्रति ऋषभ का विशेष लगाव था और वह लंबे समय से अपने पसंदीदा मटन व्यंजन को एक अलग पहचान देने के बारे में सोच रहे थे। ऋषभ को खाना बनाने का लगभग नौ वर्षों का अनुभव है। उन्होंने अपने परिवार से खाना बनाने की कई बारीकियां सीखीं और बाद में यूट्यूब वीडियो तथा अपने प्रयोगों के जरिए भी अपनी पाक कला को निखारा। बेंगलुरु में रहते हुए उनके मन में एक ऐसा फूड बिजनेस शुरू करने का विचार आया, जहां लोगों को कुछ अलग और यादगार स्वाद मिले। जब वह नोएडा आए तो उन्होंने अपने दोस्तों को एक खास मटन डिश बनाकर खिलाई। दोस्तों को इसका स्वाद इतना पसंद आया कि ऋषभ और शशिकांत को लगा कि इस प्रयोग को व्यावसायिक रूप दिया जा सकता है। दोनों ने नौकरी छोड़ने की जल्दबाजी नहीं की। उन्होंने तय किया कि पहले छोटे स्तर पर कारोबार शुरू करेंगे, ग्राहकों की पसंद समझेंगे और उसके बाद विस्तार की रणनीति बनाएंगे। Noida News
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इस कारोबार की शुरुआत का सबसे दिलचस्प पहलू इसकी कम लागत है। दोनों युवाओं ने लगभग 35 हजार रुपये की शुरुआती पूंजी लगाई। इस राशि से ठेले, रोशनी, शुरुआती कुकिंग सामग्री और जरूरी उपकरणों की व्यवस्था की गई। उन्होंने शुरुआत में न तो बड़ा रेस्टोरेंट खोला और न ही लंबी-चौड़ी डिशों का मेन्यू तैयार किया। इसके बजाय उन्होंने केवल एक खास व्यंजन पर ध्यान केंद्रित किया। इस ब्रांड का नाम रखा गया 'लहम'। रिपोर्ट के अनुसार, लहम अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ मांस होता है। ऋषभ को इस नाम की ध्वनि और इसकी पहचान पसंद आई। इसी नाम से उनका फूड कार्ट लोगों के सामने आया। दोनों का मानना था कि यदि ग्राहक को एक ही व्यंजन बेहतरीन स्वाद और अच्छी गुणवत्ता के साथ उपलब्ध कराया जाए तो वह दोबारा भी लौटकर आएगा। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने कारोबार की नींव रखी। Noida News
'लहम' की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां दर्जनों व्यंजनों की सूची नहीं मिलती। इस फूड कार्ट का मुख्य आकर्षण है नमकीन गोश्त (Namkeen Gosht)।
इस व्यंजन को मालाबार कॉइन पराठों के साथ परोसा जाता है। मटन को खास तरीके से तैयार किया जाता है, जिसमें मसालों की अधिकता के बजाय मांस के अपने स्वाद को प्राथमिकता दी जाती है। इसकी एक और विशेषता है कि ग्राहकों को उनकी जरूरत और भूख के हिसाब से अलग-अलग मात्रा में खाना मिलता है।
प्लेट
हाफ प्लेट- ₹159
फुल प्लेट- ₹279
लार्ज प्लेट- ₹399
ग्राहकों के लिए ग्रेवी का विकल्प भी रखा गया है, जिसमें कीमे वाले मटन का इस्तेमाल किया जाता है। ऋषभ की कोशिश है कि ग्राहक को सड़क किनारे मिलने वाले खाने में भी ऐसा स्वाद मिले, जिसे वह किसी अच्छे रेस्टोरेंट के भोजन से जोड़कर देख सके। यही वजह है कि इस छोटे से कार्ट के आसपास खाने के शौकीनों की भीड़ जुटने लगी। Noida News
इस कहानी का सबसे प्रेरणादायक हिस्सा कारोबार की शुरुआती मुश्किलें हैं। दोनों युवाओं ने पहली बार अपना फूड कार्ट लगाया तो शुरुआती दस मिनट तक कोई ग्राहक नहीं आया। उन्हें खुद लोगों के पास जाकर बताना पड़ा कि वे क्या बेच रहे हैं और उनके यहां मिलने वाला व्यंजन दूसरे फूड स्टॉल से अलग क्यों है। पहले दिन केवल 25 प्लेट बिकीं। दूसरे दिन यह संख्या बढ़कर 35 हो गई। लेकिन दोनों ने शुरुआती बिक्री को देखकर हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने ग्राहकों की प्रतिक्रिया को समझा, स्वाद में निरंतरता बनाए रखी और अपने उत्पाद की गुणवत्ता पर ध्यान दिया। शुरुआत में वे केवल 2.5 किलोग्राम मटन से काम चला रहे थे। लेकिन ग्राहकों की मांग इतनी तेजी से बढ़ी कि एक महीने के भीतर मटन की खपत बढ़कर लगभग 25 किलोग्राम तक पहुंच गई। यानी जिस कारोबार की शुरुआत ढाई किलो मटन से हुई थी, वहां अब एक सप्ताहांत में लगभग 25 किलो मटन की तैयारी होने लगी। यह बदलाव किसी बड़े विज्ञापन अभियान से नहीं, बल्कि ग्राहकों की पसंद, सोशल मीडिया पर चर्चा और लोगों के एक-दूसरे को इस फूड कार्ट के बारे में बताने से आया।Noida News
5 सितंबर 2026 को शुरू हुए इस कारोबार ने अपने पहले महीने में लगभग 6 लाख रुपये का राजस्व (Revenue) अर्जित किया। यहां एक बात समझना जरूरी है। 6 लाख रुपये की राशि कुल बिक्री से संबंधित है, इसे दोनों युवाओं की व्यक्तिगत कमाई या शुद्ध मुनाफा नहीं समझना चाहिए। मटन की खरीद, पराठों और अन्य सामग्री, कर्मचारियों की व्यवस्था, किचन, उपकरण, पैकेजिंग और दूसरी परिचालन लागतों के बाद वास्तविक लाभ निर्धारित होता है। ऋषभ के अनुसार, कारोबार शुद्ध मुनाफे में चल रहा है, लेकिन फिलहाल वे उससे निकलने वाली लगभग पूरी राशि को दोबारा कारोबार में लगा रहे हैं। यही वजह है कि दोनों ने अपनी नौकरी जारी रखी है। वे कारोबार की शुरुआती सफलता को देखकर जल्दबाजी में कॉरपोरेट नौकरी छोड़ने के पक्ष में नहीं हैं। Noida News
इस कहानी का सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब 'लहम' की लोकप्रियता बढ़ने के साथ इसमें निवेश करने की इच्छा रखने वाले लोग भी सामने आने लगे। ऋषभ ने बताया कि एक व्यक्ति ने उनके कारोबार को 5 करोड़ रुपये की वैल्यूएशन पर आंका और कंपनी में 1 करोड़ रुपये के शेयर लेने की इच्छा जताई। सामान्य तौर पर किसी छोटे कारोबार के लिए इतनी जल्दी इस तरह का निवेश प्रस्ताव मिलना बड़ी बात मानी जा सकती है। लेकिन दोनों संस्थापकों ने फिलहाल बाहरी निवेश लेने से इनकार कर दिया। उनका तर्क साफ है। वे पहले अपने ब्रांड को मजबूत बनाना चाहते हैं। उन्हें अपने उत्पाद की गुणवत्ता, ग्राहकों को मिलने वाले अनुभव, कारोबार की प्रक्रियाओं और सप्लाई व्यवस्था को स्थायी बनाना है। वे चाहते हैं कि 'लहम' की पहचान केवल सोशल मीडिया पर वायरल होने तक सीमित न रहे, बल्कि ऐसा ब्रांड बने जिसकी गुणवत्ता हर दिन और हर स्थान पर एक जैसी हो। इसलिए उन्होंने निवेशक से पूंजी लेने के बजाय अपने कारोबार को स्वयं की कमाई और सीमित संसाधनों के सहारे आगे बढ़ाने का रास्ता चुना है। यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि 5 करोड़ रुपये का आंकड़ा कंपनी की बताई गई वैल्यूएशन है, न कि उन्हें 5 करोड़ रुपये नकद देने का प्रस्ताव। Noida News
'लहम' की सफलता के पीछे केवल अच्छा खाना ही नहीं, बल्कि काम करने का व्यवस्थित तरीका भी है। दोनों युवा कॉरपोरेट क्षेत्र में प्रोडक्ट मैनेजर हैं। इस पेशे में काम करने के दौरान उन्होंने प्रोडक्ट की योजना, बाजार की जरूरत, संचालन, लागत और ग्राहक अनुभव को समझा है। यही अनुभव वे अपने छोटे से खाद्य कारोबार में इस्तेमाल कर रहे हैं।
ऋषभ मुख्य रूप से इन जिम्मेदारियों को संभालते हैं:
वहीं शशिकांत की जिम्मेदारी है:
दोनों सप्ताह के दिनों में नौकरी करते हैं। ऑफिस से लौटने के बाद भी कारोबार को लेकर चर्चा और योजना बनाते हैं। शुक्रवार का दिन विशेष रूप से सप्ताहांत की तैयारी, कच्चे माल की खरीद और विक्रेताओं से बातचीत में जाता है। शनिवार और रविवार को उनका पूरा ध्यान फूड कार्ट पर रहता है। रिपोर्ट में ऋषभ ने बताया कि कई बार शनिवार और रविवार को उन्हें पर्याप्त नींद तक नहीं मिलती। रात लगभग 11 से 11:30 बजे कारोबार बंद करने के बाद उपकरणों को वापस क्लाउड किचन में रखना और अगले दिन की तैयारी करना पड़ता है। यह काम रात के लगभग दो बजे तक चलता है और सुबह सात-आठ बजे फिर से तैयारी शुरू हो जाती है। यानी सप्ताह के पांच दिन नौकरी और दो दिन कारोबार का यह मॉडल सुनने में जितना आकर्षक लगता है, इसके पीछे उतनी ही कड़ी मेहनत भी है। Noida News
इस कारोबार को केवल दो लोगों की साझेदारी तक सीमित नहीं रखा गया है। ऋषभ की बहन प्रियंका खाना बनाने और किचन की तैयारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनके बचपन के मित्र अर्पित सिंह संचालन का काम संभालते हैं। कॉलेज के मित्र रचित बिलिंग में मदद करते हैं। इसके अलावा ऋषभ और शशिकांत के कई दोस्त तथा सहकर्मी भी तैयारी, पैकेजिंग और अन्य कामों में सहयोग करते हैं। ऋषभ ने बताया कि उनकी बहन खाना बनाने में काफी अच्छी हैं और उन्होंने भी उनसे बहुत कुछ सीखा है। अब वे अपनी बहन और अर्पित को कारोबार से जोड़कर उन्हें मेहनत का उचित भुगतान भी कर रहे हैं। इससे यह भी पता चलता है कि एक छोटे से फूड कार्ट की सफलता के पीछे कई लोगों की मेहनत और सामूहिक सहयोग होता है। Noida News
किसी भी सड़क किनारे खाद्य कारोबार के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक उचित स्थान और आवश्यक अनुमति की व्यवस्था होती है। 'लहम' के साथ भी ऐसा हुआ। एक सप्ताहांत दोनों ने लगभग 20 किलोग्राम मटन की तैयारी की थी। लेकिन शाम करीब छह बजे उन्हें जानकारी मिली कि आवश्यक अनुमति नहीं होने के कारण वे उस स्थान पर अपना कार्ट नहीं लगा सकते। उनके सामने बड़ी समस्या थी। इतनी बड़ी मात्रा में तैयार किया गया सामान खराब होने का खतरा था। ऐसे समय में उन्होंने ग्राहकों के लिए टेकअवे व्यवस्था शुरू की। पहले व्हाट्सऐप पर ऑर्डर लेने की कोशिश की गई, लेकिन एक ही नंबर पर लगातार ऑर्डर आने के कारण व्यवस्था संभालना मुश्किल हो गया। इसके बाद उन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर सूचना दी कि ग्राहक पैकिंग लेकर सीधे पहुंच सकते हैं। इस प्रयोग को भी अच्छी प्रतिक्रिया मिली और तैयार खाना बिक गया। बाद में उन्होंने अपना कार्ट एक निजी संपत्ति पर स्थानांतरित किया, जहां उनके अनुसार अनुमति संबंधी समस्या नहीं रही। यह घटनाक्रम बताता है कि छोटे कारोबार में केवल उत्पाद अच्छा होना पर्याप्त नहीं है। स्थान, अनुमति, भंडारण, ग्राहक प्रबंधन और संचालन की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। Noida News
आज के दौर में किसी छोटे कारोबार को पहचान दिलाने में सोशल मीडिया की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है, इसकी मिसाल 'लहम' के रूप में देखी जा सकती है। इस ब्रांड का इंस्टाग्राम अकाउंट @laham.by.shabfoods है। यहां से साझा की गई रील और ग्राहकों के अनुभवों ने इस फूड कार्ट को ऑनलाइन चर्चा में ला दिया। खाने के शौकीन लोग यहां पहुंचकर वीडियो बनाते हैं, अपने अनुभव साझा करते हैं और दूसरे लोगों को भी इस खास मटन डिश के बारे में बताते हैं। सोशल मीडिया पर लगातार चर्चा होने के कारण ग्राहकों की भीड़ बढ़ती गई। कई बार स्थिति यह हो गई कि खाना समाप्त होने के बाद भी ग्राहक इंतजार करते रह गए। रिपोर्ट में एक दिलचस्प घटना का उल्लेख है। एक ग्राहक को अपनी बारी के लिए लगभग 45 मिनट इंतजार करना पड़ा। वहां टोकन नंबर 57 तक पहुंच चुका था। यह छोटी सी घटना इस बात का संकेत है कि एक सीमित क्षमता वाले फूड कार्ट के लिए बढ़ती मांग को संभालना कितना कठिन हो सकता है। ऋषभ के व्यक्तिगत इंस्टाग्राम अकाउंट पर भी लगभग 14 हजार फॉलोअर्स होने की जानकारी रिपोर्ट में दी गई है। Noida News
'लहम' की लोकप्रियता केवल नोएडा तक सीमित नहीं रही। इसे दिल्ली के चर्चित फूड फेस्टिवल 'हॉर्न ओके प्लीज' में भी आमंत्रित किया गया। इसके अलावा दुर्गा पूजा के पंडालों में भी उन्हें अपना फूड स्टॉल लगाने का अवसर मिला। 17 अक्टूबर से शुरू हुए आयोजन के दौरान पांच दिनों तक दो अलग-अलग स्थानों पर उन्होंने अपनी सेवाएं दीं। यहां एक दिलचस्प समस्या भी सामने आई। फेस्टिवल के कार्यक्रमों के कुछ दिन उनकी कॉरपोरेट नौकरी के दिनों से टकरा रहे थे। ऐसे में ऋषभ की बहन ने किचन की जिम्मेदारी संभाली, जबकि ऋषभ और शशिकांत अपनी नौकरी भी करते रहे। यह उदाहरण बताता है कि छोटे कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए केवल संस्थापकों की मेहनत नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद टीम का होना भी जरूरी है। Noida News
'लहम' की कहानी को केवल दो युवाओं की सफलता के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह नोएडा और दिल्ली-एनसीआर के बदलते खानपान के बाजार की भी कहानी है। कुछ समय पहले तक सड़क किनारे खाने का मतलब गोलगप्पे, चाट, मोमोज, छोले-भटूरे और पराठे हुआ करता था। लेकिन अब सड़क किनारे लगने वाले फूड कार्ट पर ऐसे व्यंजन भी मिलने लगे हैं, जिन्हें पहले बड़े रेस्टोरेंट या विशेष कैफे से जोड़कर देखा जाता था। 24 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में दिल्ली-एनसीआर के इसी बदलते स्ट्रीट फूड बाजार का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में सुशी, डिमसम, नेपोलिटन पिज्जा और प्रीमियम मटन जैसे व्यंजनों की बढ़ती लोकप्रियता की चर्चा है। इस रिपोर्ट में भी 'लहम' का जिक्र किया गया है। इसके अनुसार, ऋषभ और शशिकांत ने लगभग 30 से 50 हजार रुपये की शुरुआती पूंजी से अपना कारोबार शुरू किया और मटन की खपत 2.5 किलोग्राम से बढ़कर 25 किलोग्राम तक पहुंच गई। इससे स्पष्ट होता है कि ग्राहक अब केवल सस्ता खाना नहीं, बल्कि अलग स्वाद, बेहतर प्रस्तुति और नए अनुभव की तलाश भी कर रहे हैं। Noida News
इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर ध्यान देना जरूरी है। सोशल मीडिया पर सफलता की तस्वीरें दिखाई देती हैं, लेकिन इनके पीछे की मेहनत और निजी जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव अक्सर नजर नहीं आते। ऋषभ ने स्वीकार किया कि कारोबार शुरू करने के बाद उन्हें घूमने-फिरने, दोस्तों से मिलने और परिवार के साथ समय बिताने का अवसर बहुत कम मिल रहा है। वह बेंगलुरु से नोएडा इसलिए भी आए थे ताकि अपने गृह नगर गोरखपुर के निकट रह सकें और परिवार से मिल सकें। लेकिन शनिवार और रविवार को भी कारोबार की व्यस्तता के कारण परिवार के लिए पर्याप्त समय निकालना मुश्किल हो रहा है। अब दोनों चाहते हैं कि प्रशिक्षित कर्मचारियों और भरोसेमंद टीम के माध्यम से कारोबार की दैनिक जिम्मेदारियां व्यवस्थित की जाएं। उनकी योजना है कि ऋषभ की बहन किचन की मुख्य जिम्मेदारी संभालें और अन्य कर्मचारी भी नियुक्त किए जाएं। इससे दोनों संस्थापक भविष्य में रणनीति, ब्रांड विस्तार और कारोबार के प्रबंधन पर अधिक ध्यान दे सकेंगे। यह पहलू उन तमाम युवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण है जो सोशल मीडिया पर किसी कारोबार की सफलता देखकर तुरंत नौकरी छोड़कर अपना व्यवसाय शुरू करने का विचार करते हैं। असलियत यह है कि कारोबार में कमाई के साथ समय, श्रम, जिम्मेदारी और जोखिम भी जुड़े होते हैं। Noida News
नोएडा देश के प्रमुख आईटी, कॉरपोरेट और स्टार्टअप केंद्रों में से एक है। यहां बड़ी संख्या में युवा विभिन्न कंपनियों में काम करते हैं। इनमें से कई के मन में अपना व्यवसाय शुरू करने का सपना होता है, लेकिन नौकरी की सुरक्षा, आर्थिक जिम्मेदारियां और शुरुआती निवेश की चिंता उन्हें कदम उठाने से रोकती है। ऋषभ और शशिकांत ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने अपनी नौकरी को छोड़े बिना छोटे स्तर पर अपने विचार को आजमाया। उन्होंने पहले बाजार की प्रतिक्रिया देखी, ग्राहकों की पसंद समझी और उसके बाद धीरे-धीरे कारोबार को आगे बढ़ाया।
उनकी कहानी से कुछ महत्वपूर्ण व्यावसायिक सबक निकलते हैं:
ऋषभ कुमार और शशिकांत सिंह की यह कहानी इसलिए खास है क्योंकि इसमें सफलता की कोई रातोंरात चमत्कार वाली पटकथा नहीं है। इसके पीछे लगभग दो वर्षों तक विचार करना, कई महीनों तक तैयारी करना, सीमित पूंजी से शुरुआत करना, पहले दिन केवल 25 प्लेट बेचना और फिर लगातार अपने काम को बेहतर बनाना शामिल है। आज उनके पास ग्राहकों की भीड़ है, सोशल मीडिया पर पहचान है, बड़े फूड फेस्टिवल से निमंत्रण है और निवेश की संभावनाएं भी हैं। इसके बावजूद दोनों अपनी नौकरी जारी रखना चाहते हैं और कारोबार को मजबूत आधार देने पर ध्यान दे रहे हैं। नोएडा की इस कहानी में एक बड़ा संदेश छिपा है। नौकरी करना और उद्यमी बनना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यदि किसी के पास अच्छा विचार, योजना, मेहनत और जोखिम को समझने की क्षमता है तो वह नौकरी करते हुए भी अपने सपने की नींव रख सकता है। Noida News
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