
Noida News : अगले कुछ दिनों में सर्दियां शुरू होने वाली है। सर्दियां शुरु होते ही नोएडा, ग्रेटर नोएडा और दिल्ली एनसीआर में रहने वाले लोगों की परेशानियां भी बढ़ जाती है। परेशानी यह होती है कि सर्दी होते ही नोएडा और दिल्ली एनसीआर की आबोहवा खराब हो जाती है। चारों और धंधु की चादर ही चादर दिखती है, जिससे वाहन चालकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता ही है साथ ही सांस लेने में भी कभी कभी दिक्कत पैदा होती है।
सर्दी में नोएडा और दिल्ली एनसीआर के वायु प्रदूषण से निपटने के लिए दिल्ली की सरकार ने अब एक नया प्लान बनाया है। इस प्लान के तहत दिल्ली में नकली बारिश करायी जाएगी, ताकि प्रदूषण को कम किया जा सके।
दिल्ली सरकार में पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने मंगलवार को बताया कि सर्दियों के दौरान राजधानी में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए आर्टिफिशियल बारिश कराने के लिए क्लाउड सीडिंग तकनीक का इस्तेमाल करने के बारे में सोच रही है। इसके लिए सरकार राजधानी के अलग-अलग हॉटस्पॉट के लिए अलग-अलग वर्किंग प्लान तैयार कर रही है।
आपको बता दें कि मंगलवार को विंटर एक्शन प्लान पर चर्चा के लिए बैठक बुलाई थी। इसमें आईआईटी कानपुर के एक्सपर्ट्स भी शामिल हुए थे। उन्होंने प्रदूषण कम करने के लिए दिल्ली में आर्टिफिशियल बारिश करवाने का सुझाव दिया है।
आईआईटी कानपुर के एक्सपर्ट साल 2017 से क्लाउड सीडिंग के जरिए आर्टिफिशियल बारिश करवाने की तकनीक पर काम कर रहे थे। इसी साल जून में आईआईटी कानपुर को इसमें कामयाबी मिली थी। टेस्टिंग के दौरान सेना एयरक्राफ्ट (छोटे विमान) को पांच हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ाया गया।
इसके बाद क्लाउड सीडिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए बादलों में एक केमिकल पाउडर छिड़का, जिससे पानी की बूंदें बनने लगीं और कुछ देर बाद आसपास के इलाकों में बारिश शुरू हो गई।
क्लाउड सीडिंग पर 1940 के दशक से काम चल रहा है। अमेरिका पर आरोप लगते रहे हैं कि वियतनाम युद्ध में उसने क्लाउड सीडिंग को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया था। इससे वियतनामी सेना की सप्लाई चेन बिगड़ गई थी, क्योंकि ज्यादा बारिश से जमीन दलदली हो गई थी। हालांकि, इस बात के कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं।
वर्ष 2017 में संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी वर्ल्ड मीटियरोलॉजिकल ऑर्गनाइजेशन ने अनुमान लगाया था कि दुनिया के 50 से ज्यादा क्लाउड सीडिंग को आजमा चुके हैं। इनमें चीन, अमेरिका, रूस, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देश शामिल हैं।
क्लाउड सीडिंग एक तरह से मौसम में बदलाव करने की कोशिश है। इसमें आर्टिफिशियल यानि नकली बारिश करवाई जाती है। क्लाउड सीडिंग की प्रक्रिया के दौरान छोटे-छोटे विमानों को बादलों के बीच से गुजारा जाता है। ये विमान सिल्वर आयोडाइड, ड्राई आइस और क्लोराइड छोड़ते जाते हैं। इससे बादलों में पानी की बूंदें जम जाती हैं। यही पानी की बूंदें फिर बारिश बनकर जमीन पर गिरती हैं।
चीन की राजधानी बीजिंग की गिनती दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में होती है। ऐसे में यहां प्रदूषण को कम करने और मौसम को साफ बनाए रखने के लिए अक्सर आर्टिफिशियल बारिश करवाई जाती है।
साल 2008 में बीजिंग ओलंपिक के दौरान बारिश खेल न बिगाड़ दे, इसलिए चीन ने वेदर मोडिफिकेशन सिस्टम का इस्तेमाल कर पहले ही बारिश करवा दी।
चीन क्लाउड सीडिंग तकनीक का इस्तेमाल और बढ़ाने वाला है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि चीन की योजना साल 2025 तक देश के 55 लाख वर्ग किमी इलाके को आर्टिफिशियल बारिश के तहत कवर करने की है।
सिर्फ चीन ही नहीं, बल्कि और भी कई देश ऐसा कर रहे हैं। टोक्यो ओलंपिक और फिर पैरालंपिक के दौरान जापान ने भी आर्टिफिशियल रेन जनरेटर का भरपूर इस्तेमाल किया था।
संयुक्त अरब अमीरात में मौसम अक्सर गर्म ही रहता है। साल 2022 में यहां पर क्लाउड सीडिंग के जरिए इतनी जोरदार बारिश हुई कि बाढ़ की स्थिति बन गई।
थाईलैंड भी इस पर काम कर रहा है। उसका प्लान 2037 तक अपने सूखाग्रस्त इलाकों को हराभरा बना देगा. इसके लिए वो नकली बारिश का सहारा ले रहा है।
देश एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं कि वे इस तकनीक के जरिए दूसरों की सीमा पर तबाही मचा सकते हैं। जैसे ज्यादा बारिश करा देना, यहां तक कि सुनामी ला सकना।
अमेरिका का एक प्रोजेक्ट हार्प इसके लिए अक्सर घेरे में रहा। कई देशों में आए भूकंप, सुनामी और भूस्खलन के लिए इस रिसर्च संस्था को दोषी ठहराया गया।
देश वेदर मॉडिफिकेशन तकनीक को एक-दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल कर सकते हैं, इसपर यूनाइटेड नेशन्स काफी पहले अलर्ट हो चुका था। Noida News