
Noida News : दुनियाभर के साथ ही साथ भारत में भी ''कान्वेंट'' स्कूल बड़ी संख्या में खुले हैं। कया होते हैं ''कान्वेंट स्कूल'' ? कान्वेंट शब्द की उत्पत्ति कहां से और कैसे हुई ? क्या यह एक भारतीय शिक्षा व्यवस्था है ? ऐसे ही ढेर सारे सवाल अक्सर पूछे जाते हैं। इन सारे सवालों का जवाब नोएडा में रहने वाले एक प्रसिद्ध शिक्षाविद ने दिया है।
नोएडा में रहने वाले प्रसिद्ध शिक्षाविद डा. आनंद कुमार का दावा है कि कान्वेंट वाली शिक्षा व्यवस्था भारत की नहीं है। इस शिक्षा व्यवस्था को भारत में थोपना अंग्रेजों की एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा थी। आज विस्तार से जानते हैं ''कान्वेंट'' वाली व्यवस्था के विषय में...
सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि ये शब्द आखिर आया कहाँ से है। ब्रिटेन में एक कानून था, "लिव इन रिलेशनशिप" बिना किसी वैवाहिक संबंध के एक लड़का और एक लड़की का साथ में रहना, तो इस प्रक्रिया के अनुसार संतान भी पैदा हो जाती थी तो उन संतानों को किसी चर्च में छोड़ दिया जाता था।
अब ब्रिटेन की सरकार के सामने यह गम्भीर समस्या हुई कि इन बच्चों का क्या किया जाए, तब वहाँ की सरकार ने काँन्वेंट खोले अर्थात जो बच्चे अनाथ होने के साथ-साथ नाजायज हैं, उनके लिए ये काँन्वेंट बने।
उन अनाथ और नाजायज बच्चों को रिश्तों का एहसास कराने के लिए उन्होंने अनाथालयों में एक फादर, एक मदर, एक सिस्टर की नियुक्ति कर दी, क्योंकि ना तो उन बच्चों का कोई जायज बाप है ना ही माँ है। तो काँन्वेन्ट बना नाजायज बच्चों के लिए जायज।
इंग्लैंड में पहला काँन्वेंट स्कूल सन 1609 के आसपास एक चर्च में खोला गया था जिसके ऐतिहासिक तथ्य भी मौजूद हैं और भारत में पहला काँन्वेंट स्कूल कलकत्ता में सन 1842 में खोला गया था। परंतु तब हम गुलाम थे और आज तो लाखों की संख्या में काँन्वेंट स्कूल चल रहे हैं।
जब कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे ‘फ्री स्कूल’ कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गई, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गई, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गई और ये तीनों गुलामी के ज़माने की यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं।
मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी, यह बहुत मशहूर चिट्ठी है। उसमें वो लिखते हैं कि “इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे। इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपनी परम्पराओं के बारे में भी कुछ पता नहीं होगा।
इनको अपने मुहावरे ही नहीं मालूम होंगे, जब ऐसे बच्चे इस देश में होंगे तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ, इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।” उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रुवाब पड़ेगा।
अरे ! हम तो खुद में हीन हो गए हैं। जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म हो, दूसरों पर क्या असर पड़ेगा ? लोगों का तर्क है कि “अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है”। दुनिया में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में ही बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है?
शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईसा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईसा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी। समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गई।
जिनके जायज माँ, बाप, भाई, बहन सब हैं, वो काँन्वेन्ट में जाते है। तो क्या हुआ एक बाप घर पर है और दूसरा काँन्वेन्ट में जिसे फादर कहते हैं। आज जिसे देखो काँन्वेंट खोल रहा है जैसे- "बजरंग बली काँन्वेन्ट स्कूल", माँ भगवती काँन्वेन्ट स्कूल"। अब इन मूर्खो को कौन समझाए कि भईया माँ भगवती या बजरंग बली का काँन्वेन्ट से क्या लेना देना ?
Noida Newsदुर्भाग्य की बात यह है कि जिन चीजों का हमने त्याग किया, अंग्रेजों ने वो सभी चीज़ों को पोषित और संचित किया, फिर भी हम सबने उनकी त्यागी हुई गुलाम सोच को आत्मसात कर गर्वित होने का दुस्साहस किया। अब आपको समझ में आ गया हो गया होगा कि कान्वेंट का क्या अर्थ है। Noida News