
Noida News (चेतना मंच)। नोएडा में ‘मॉर्डन विलेज’ महज एक जुमला बनकर रह गया है। जिन गांवों की जमीनों पर हाईटेक शहर नोएडा को बसाया गया है, उन गांवों को नर्क बनाकर छोड़ दिया गया है।
नोएडा विकास प्राधिकरण व जन प्रतिनिधियों द्वारा द्वारा समय-समय पर गांवों का विकास सेक्टरों की तर्ज पर किए जाने के तमाम वायदे किए जाते हैं। कुछ दिनों तक सुर्खियां बटोरने के बाद यह वायदे केवल झूठे वायदे ही साबित होते हैं। आलम यह है कि मूलभूत सुविधाओं के अभाव में अधिकतर गांव स्लम बस्तियों में तब्दील हो चुके हैं। यहां रहने वाले लोगों को नारकीय जीवन जीने पर मजबूर होना पड़ रहा है। नोएडा प्राधिकरण के कार्यालय से चंद कदमों की दूरी पर स्थित हरौला गांव अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। यहां तरह-तरह की समस्याएं व्याप्त है, जिसे लेकर ग्रामीणों में खासा रोष व्याप्त है।
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ज्ञानेंद्र शर्मा[/caption]
हरौला गांव निवासी एवं भारद्वाज मेडिकोज के संचालक ज्ञानेंद्र शर्मा ने बताया कि वर्ष 1976 में जब यहां न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (नोएडा) की स्थापना हुई थी तो उस समय ग्रामीणों को तत्कालीन जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों ने बड़े बड़े ख्वाब दिखाए थे। ग्रामीणों को आश्वासन दिया गया था कि जमीन अधिग्रहण के बदले उन्हें उचित मुआवजा देने के साथ-साथ तमाम शहरी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। समय के साथ-साथ यह आश्वासन भी दम तोड़ते चले गए। धीरे-धीरे नोएडा ने राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई, लेकिन यहां के गांव अपनी पहचान खोते चले गए।
आलम यह है कि नोएडा के गांव ना तो गांव रहे और ना ही यह शहर की परिधि में आ पाए हैं। वर्तमान में अधिकतर गांवों की हालत केवल स्लम बस्तियों के जैसी है। श्री शर्मा कहते हैं कि गांवों में विकास कार्य हुए हैं लेकिन उतने नहीं हुए जिनसे गावों को एक अलग पहचान मिल सकती थी। उन्होंने हरौला गांव का उदाहरण देते हुए कहा कि प्राधिकरण कार्यालय से सटा होने के बावजूद यहां अभी भी अनेकों तरह की समस्याओं से ग्रामीणों को जूझना पड़ रहा है।
गांव के बाहर से गुजरने वाले उद्योग मार्ग की ऊंचाई गांव की गलियों से ऊंची है। इस कारण बरसात में गांव की गलियां तालाब में तब्दील हो जाती हैं। गांव में पानी निकासी की कोई उचित व्यवस्था नहीं है, जिस कारण लोग तरह-तरह की बीमारियों की चपेट में आते रहते हैं। कई बार इस संबंध में ग्रामीणों द्वारा प्राधिकरण अधिकारियों को शिकायत देकर इसके निराकरण की मांग की गई लेकिन हालात आज भी जस के तस हैं।
संजीव शर्मा[/caption]
ग्रामवासी व ट्रांसपोर्ट व्यवसायी पंडित संजीव शर्मा ने बताया कि ग्रामीण आज भी शुद्ध पेयजल से महरूम है। जल विभाग द्वारा गांव में की जा रही पेयजल की आपूर्ति से ग्रामीण और यहां रहने वाले किराएदार परेशान हैं। सुबह शाम आने वाले सप्लाई के पानी का प्रेशर इतना कम होता है कि वह पहली मंजिल तक नहीं पहुंच पाता है। महज आधा पौना घंटा सप्लाई देने के बाद जल विभाग द्वारा सप्लाई बंद कर दी जाती है।
गर्मी के मौसम में कुछ देर के लिए होने वाली जलापूर्ति लोगों के लिए पर्याप्त साबित नहीं हो पा रही है। श्री शर्मा ने बताया कि नोएडा प्राधिकरण द्वारा वर्षों पूर्व गांव में डाली गई पानी की लाइन जगह-जगह क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। क्षतिग्रस्त पाइपलाइनों में नालियों का पानी मिक्स होकर आता है। स्थिति यह है कि कई बार पानी इतना बदबूदार होता है कि उसे पीना तो दूर उससे नहाया तक नहीं जा सकता। शिकायत के बाद जल विभाग के अधिकारी खानापूर्ति कर ग्रामीणों को टरका देते हैं।
अमित शर्मा[/caption]
हरौला निवासी अमित शर्मा ने बताया कि नोएडा प्राधिकरण के अधिकारी शहर को स्वच्छता सर्वेक्षण में पहले पायदान पर लाने के लिए बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं। इसके लिए लाखों करोड़ों रुपए खर्च भी किए जा रहे हैं। लेकिन प्राधिकरण अधिकारियों का ध्यान केवल सेक्टरों की तरफ ही है। नोएडा प्राधिकरण से सटे हरौला गांव में नोएडा प्राधिकरण के स्वच्छता के दावों की पोल खुलती नजर आती है। गांव की गलियों में जगह-जगह कूड़े के ढेर देखे जा सकते हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि शहर को स्वच्छता में नंबर वन के पायदान पर लाने के लिए नोएडा प्राधिकरण को गांवों की हालत पर भी ध्यान देना होगा, तभी शहर प्रथम पायदान पर पहुंच सकेगा। उन्होंने कहा कि साफ सफाई के अलावा ग्रामीण बिजली की लुकाछिपी से भी खासे परेशान हैं। आए दिन ग्रामीणों को विद्युत कटौती का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि अधिकारियों की उदासीनता का खामियाजा ग्रामीणों को भुगतना पड़ रहा है। ग्रामीणों ने जिस उम्मीद से शहर के विकास के लिए अपनी जमीन सरकार को दी उसके इतर उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ। Noida News