
Noida News : उत्तर प्रदेश की हाईटेक सिटी नोएडा में नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों द्वारा किए गए मुआवजा वितरण घोटाला में सुप्रीम कोर्ट ने प्राधिकरण के अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला देते हुए मामले की गहनता से जांच के आदेश दिए हैं।
नोएडा प्राधिकरण में मुआवजा वितरण को लेकर हुए घोटाले की जांच रिपोर्ट एसआईटी ने सुप्रीम कोर्ट में जमा की थी। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अंसतोष जाहिर किया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में गहनता से जांच कराए जाने के आदेश दिए हैं और इसके लिए एक माह का समय दिया है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि यह मामला गंभीर है। नोएडा प्राधिकरण में 10 से 15 साल में हुए बड़े जमीन अधिग्रहण के मुआवजा वितरण की जांच की जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि 10 से 15 वर्षों में मुआवजा वितरण में अगर कुछ गलत हुआ है या फिर प्राधिकरण की विभागीय जांच में कोई अधिकारी प्रथम दृष्टया संलिप्त पाया गया है तो उसकी भी रिपोर्ट दाखिल की जाए। इस मामले में अगली सुनवाई 17 जनवरी 2023 को होगी।
आपको बता दें कि नोएडा प्राधिकरण में किसानों को अतिरिक्त मुआवजा देकर मुनाफाखोरी करने वाले अधिकारियों पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद प्रदेश सरकार ने एसआईटी गठित की थी। इस टीम ने प्राधिकरण में दो दिन जांच की और रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में जमा की। पहले सुनवाई करते हुए कोर्ट ने मुआवजा बांटने के मामले में विधि विभाग के सिर्फ दो अधिकारियों को दोषी मानने से मना करते हुए कहा था कि इस मामले अन्य अधिकारियों की संलिप्तता है, जिसकी जांच होनी चाहिए।
आपको बता दें कि नोएडा प्राधिकरण में किसानों को अतिरिक्त मुआवजा वितरण करने में बड़ी अनियमितता की थी। विभिन्न प्रकरणों में साठगांठ करके समझौते के आधार पर अधिकारियों ने करोड़ों रुपये की अतिरिक्त राशि का भुगतान मुआवजे के लिए रूप में कर दिया। जब चार गांवों की जांच की गई तो अकेले गेझा तिलपताबाद के 15 प्रकरणों में करीब 100 करोड़ 16 लाख 81 हजार रुपये का अतिरिक्त मुआवजा देकर प्राधिकरण को बड़े राजस्व का नुकसान पहुंचाया गया। इन सभी मामलों को सूचीबद्ध किया जा चुका है।
नोएडा प्राधिकरण की पूर्व सीईओ रितु माहेश्वरी के आदेश पर एक समिति गठित की गई थी और यही समिति घोटाले की जांच कर रही थी। इसी तरह के प्रकरण में कोर्ट ने प्राधिकरण के सीईओ को निर्देश दिए कि वह दोषी अधिकारियों की जांच कर उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराए। आरोप है कि इस घोटाले की नींव 2015 में पड़ी थी। 2015 और 2016 की अलग-अलग तारीखों में किसानों को अतिरिक्त मुआवजा दिया गया, जिसके वह हकदार नहीं थे।