नोएडा में मुकेश शर्मा के तीन दिवसीय रामकथा आयोजन के बीच राजनीतिक चर्चाएं तेज। क्या धनबल, धार्मिक आयोजन और बड़े मंच के सहारे नोएडा विधानसभा में राजनीतिक पहचान बनाना आसान होगा? पढ़िए चेतना मंच का विशेष विश्लेषण।

Noida News : नोएडा शहर में इन दिनों एक धनपति चर्चा का विषय बना हुआ है। नोएडा का यह धनपति नोएडा के विधायक पंकज सिंह (MLA Pankaj Singh) के सामने समाजवादी पार्टी के टिकट की दावेदारी कर रहा है। नोएडा शहर के इस चर्चित धनपति का दावा है कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने उसके ‘‘धन के बल’’ को देखकर उसे नोएडा विधानसभा सीट से सपा का टिकट दे दिया है। अचानक नोएडा के इस धनपति ने एक बड़ी घोषणा कर दी है।
नोएडा के जिस चर्चित धनपति की यहां चर्चा हो रही है उस धनपति का नाम मुकेश शर्मा है। मुकेश शर्मा नोएडा शहर के चौराहों पर होर्डिंग लगाकर यह दावा करता है कि वह समाजसेवी, शिक्षाविद् तथा उद्योगपति है। मुकेश शर्मा को नोएडा शहर का एक भी आम नागरिक व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता है। नोएडा में चर्चित धनपति मुकेश शर्मा ने नोएडा शहर में अचानक नए होर्डिंग तथा पोस्टर लगा दिए हैं। मुकेश शर्मा के द्वारा लगाए गए होर्डिंग तथा पोस्टरों में प्रसिद्ध कवि तथा कथा वाचक डॉ. कुमार विश्वास (Dr. Kumar Vishwas) के द्वारा नोएडा में कथा के आयोजन की घोषणा की गई है। मुकेश शर्मा के इन ताजा होर्डिंग तथा पोस्टरों को देखकर नोएडा वाले टिप्पणी कर रहे हैं कि यह धनपति तो अखिलेश यादव को धोखा देकर कुमार विश्वास की शरण में चला गया है। इस विषय में चेतना मंच के राजनीतिक विश्लेषक ने एक बड़ा विश्लेषक किया है।
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नोएडा में विधायक बनने के सपने की नई पटकथा! अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) से उम्मीद लगाए बैठे धनपति अब कुमार विश्वास (Dr. Kumar Vishwas) की रामकथा के मंच पर, क्या धनबल से बनेगा जनाधार? राजनीति में महत्वाकांक्षा रखना कोई अपराध नहीं है। लोकतंत्र प्रत्येक नागरिक को चुनाव लड़ने, जनप्रतिनिधि बनने और जनता के बीच अपनी पहचान स्थापित करने का अधिकार देता है। लेकिन राजनीति में एक बुनियादी अंतर है, जिसे समझना हर महत्वाकांक्षी व्यक्ति के लिए जरूरी है। वह अंतर है धनवान होने और जननेता होने के बीच का। किसी के पास अकूत धन हो सकता है, बड़े-बड़े आयोजनों की क्षमता हो सकती है, प्रभावशाली लोगों तक पहुंच हो सकती है, लेकिन इन सबका होना इस बात का प्रमाण नहीं है कि जनता उसे अपना प्रतिनिधि भी स्वीकार कर लेगी। नोएडा की राजनीति में इन दिनों एक ऐसे ही राजनीतिक समीकरण को लेकर चर्चाएं दिलचस्प होती जा रही हैं। शहर के एक धनाढ्य कारोबारी मुकेश शर्मा का नाम अब एक बड़े धार्मिक आयोजन के साथ सामने आया है। तीन दिवसीय रामकथा के आयोजन में प्रख्यात कवि एवं श्रीराम कथा के लोकप्रिय व्याख्याता डॉ. कुमार विश्वास को आमंत्रित किया गया है। इस आयोजन का नाम रखा गया है— अपने अपने राम। 13, 14 और 15 नवंबर 2026 को नोएडा के सेक्टर-38 स्थित वर्ल्ड्स ऑफ वंडर में होने वाले इस आयोजन में पहले दिन श्रीराम जन्मोत्सव, दूसरे दिन सीता-राम विवाह और तीसरे दिन श्रीराम राज्यतिलक का प्रसंग निर्धारित किया गया है। आयोजन के आमंत्रण पत्र में मुकेश शर्मा को आयोजक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। साथ ही सौरव गोविल को हनुमंत सेवा संयोजक बताया गया है। धार्मिक आयोजन की दृष्टि से यह एक बड़ा कार्यक्रम हो सकता है। लेकिन नोएडा की राजनीतिक परिस्थितियों में इस आयोजन को लेकर एक अलग तरह की चर्चा भी स्वाभाविक है। सवाल यह है कि क्या यह केवल श्रद्धा और रामकथा के प्रति समर्पण का आयोजन है या इसके साथ किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पटकथा भी लिखी जा रही है?
नोएडा के राजनीतिक गलियारों में मुकेश शर्मा की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को लेकर पहले भी चर्चाएं होती रही हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा रही है कि वह समाजवादी पार्टी के माध्यम से नोएडा विधानसभा क्षेत्र की राजनीति में अपनी जगह बनाने और आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट हासिल करने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। लेकिन यदि किसी व्यक्ति की राजनीतिक महत्वाकांक्षा वास्तव में नोएडा विधानसभा से चुनाव लड़ने की है, तो उसे सबसे पहले यह समझना होगा कि नोएडा की राजनीति केवल संसाधनों और आयोजनों के सहारे नहीं जीती जा सकती। राजनीतिक गलियारों में किसी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच बनाने की कोशिश करना एक बात है और पार्टी के कार्यकर्ताओं तथा जनता के बीच स्वीकार्यता हासिल करना दूसरी बात। अब मुकेश शर्मा के नाम के साथ डॉ. कुमार विश्वास की रामकथा का आयोजन जुड़ गया है। स्वाभाविक है कि इतने लोकप्रिय वक्ता को अपने मंच पर बुलाने से कार्यक्रम को व्यापक प्रचार मिलेगा। रामकथा में बड़ी संख्या में लोग भी पहुंच सकते हैं। लेकिन यहां एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है—क्या किसी लोकप्रिय वक्ता को अपने मंच पर बुला लेने से आयोजक भी लोकप्रिय जननेता बन जाता है? इस सवाल का जवाब राजनीति की बुनियादी समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति जानता है।
नोएडा विधानसभा उत्तर प्रदेश की सबसे चर्चित और राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण विधानसभा सीट है। यहां से वर्तमान में भाजपा के पंकज सिंह विधायक हैं। वह देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पुत्र हैं और लगातार दो विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। ऐसे राजनीतिक क्षेत्र में चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले किसी भी नए चेहरे के सामने केवल चुनावी टिकट हासिल करने की चुनौती नहीं होती, बल्कि उसे वर्षों से स्थापित राजनीतिक समीकरणों, संगठनात्मक ताकत और मतदाताओं के भरोसे के बीच अपनी जगह बनानी पड़ती है। पंकज सिंह की मौजूदगी इस सीट की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को और कठिन बनाती है। इसका अर्थ यह नहीं कि लोकतंत्र में कोई सीट किसी के लिए स्थायी रूप से सुरक्षित है। चुनाव में अंतिम फैसला जनता करती है। लेकिन किसी मजबूत राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के सामने उतरने के लिए केवल आर्थिक ताकत नहीं, बल्कि निरंतर जनसंपर्क, संगठन, मुद्दों की समझ और विश्वसनीय नेतृत्व की आवश्यकता होती है। नोएडा के मतदाता अब पहले की तुलना में अधिक राजनीतिक जागरूक हैं। यहां नौकरीपेशा वर्ग है, उद्योगपति हैं, व्यापारी हैं, किसान हैं, ग्रामीण आबादी है, सोसाइटियों में रहने वाला मध्यम वर्ग है और बड़ी संख्या में युवा मतदाता हैं। इन सभी की समस्याएं अलग-अलग हैं। आपको बता दें कि नोएडा के किसी भी भावी विधायक को इन सवालों का जवाब जरूर देना होगा।
[ नोएडा की आवासीय सोसाइटियों में बिल्डर और निवासियों के विवाद का समाधान कैसे होगा?
प्राधिकरण और आम नागरिक के बीच संवाद की व्यवस्था कैसे सुधरेगी?
किसानों के आबादी भूखंड, मुआवजे और लंबित समस्याओं पर उसका क्या रुख होगा?
औद्योगिक क्षेत्रों में रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति कैसे सुधरेगी?
ट्रैफिक जाम, जलभराव, प्रदूषण और सार्वजनिक परिवहन की समस्याओं पर उसका क्या रोडमैप होगा?
नोएडा के गांवों और शहरी क्षेत्रों के बीच विकास की खाई कैसे कम होगी?
इन सवालों के जवाब किसी रामकथा के मंच से नहीं मिलेंगे। इनके लिए जनता के बीच जाकर काम करना पड़ेगा। ]
डॉ. कुमार विश्वास की लोकप्रियता किसी परिचय की मोहताज नहीं है। वह कविता, साहित्य और श्रीराम के जीवन दर्शन की अपनी विशिष्ट व्याख्या के कारण देशभर में पहचान रखते हैं। उनके कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में श्रोता पहुंचते हैं। अपने अपने राम के माध्यम से वह श्रीराम के चरित्र, आदर्शों, मर्यादा, संघर्ष और जीवन दर्शन को लोगों के सामने रखते हैं। श्रीराम का जीवन केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि त्याग, कर्तव्य, उत्तरदायित्व, न्याय, वचनबद्धता और लोककल्याण का भी संदेश देता है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझने की जरूरत है। कुमार विश्वास को आमंत्रित करना आयोजक का अधिकार है। उनका कार्यक्रम करना उनके वक्ता के रूप में आमंत्रण स्वीकार करने से संबंधित है। इसे किसी राजनीतिक दल, किसी उम्मीदवार या किसी चुनावी महत्वाकांक्षा के समर्थन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। रामकथा के मंच पर बैठकर राजनीतिक लोकप्रियता हासिल करने की कल्पना करने वाले किसी भी व्यक्ति को श्रीराम के जीवन से एक महत्वपूर्ण शिक्षा लेनी चाहिए—मर्यादा और उत्तरदायित्व के बिना प्रतिष्ठा स्थायी नहीं होती। धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं का आना उनकी आस्था है। वह भीड़ किसी आयोजक की राजनीतिक समर्थक सूची नहीं होती। कथा सुनने वाला प्रत्येक व्यक्ति किसी विशेष राजनीतिक दल या व्यक्ति का समर्थक हो, ऐसा मान लेना सबसे बड़ी राजनीतिक गलतफहमी होगी।
नोएडा जैसे शहर में बड़े आयोजन करना आर्थिक संसाधनों के बिना संभव नहीं है। मंच, प्रचार, व्यवस्था, अतिथि और आयोजन की तमाम तैयारियों पर धन खर्च होता है। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि मतदान के दिन धन और संसाधनों की तुलना में मतदाता की एक वोट की ताकत निर्णायक होती है। धनवान होना अपने आप में कोई बुराई नहीं है। मेहनत और कारोबार से संपन्नता हासिल करना सम्मान की बात है। लेकिन जब संपन्नता को राजनीतिक योग्यता का पर्याय मान लिया जाता है, तब समस्या पैदा होती है। कोई व्यक्ति लाखों रुपये खर्च करके शहर में कार्यक्रम करा सकता है। हजारों लोगों को भोजन करा सकता है। बड़े-बड़े नेताओं और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के साथ तस्वीरें खिंचवा सकता है। प्रचार के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकता है। लेकिन क्या वह उन लोगों के सुख-दुख में भी उपस्थित रहा है, जिनसे वह चुनाव के समय वोट मांगने जाएगा? यही असली कसौटी है। जनता यह भी देखती है कि जो व्यक्ति आज विधायक बनने का सपना देख रहा है, वह पिछले पांच वर्षों में शहर की समस्याओं के समाधान के लिए कितना सक्रिय रहा है। उसने किसी गरीब परिवार की समस्या उठाई या नहीं? किसी पीड़ित नागरिक की आवाज प्रशासन तक पहुंचाई या नहीं? किसानों के संघर्ष में उसकी क्या भूमिका रही? क्या वह आम आदमी की पहुंच में रहा है या केवल विशेष अवसरों पर दिखाई देता है? राजनीति में पहचान विज्ञापन से बन सकती है, लेकिन विश्वसनीयता व्यवहार से बनती है।
नोएडा ने देश को बड़े-बड़े कारोबारी, उद्यमी, उद्योगपति और आर्थिक रूप से संपन्न लोग दिए हैं। इनमें से अनेक लोगों ने शहर के विकास, रोजगार और सामाजिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण योगदान भी दिया है। इसलिए किसी व्यक्ति का धनवान होना उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर सवाल उठाने का आधार नहीं हो सकता। लेकिन यदि कोई व्यक्ति यह मानने लगे कि धन के दम पर वह किसी राजनीतिक दल का टिकट हासिल कर सकता है और फिर उसी धन के बल पर चुनाव जीत सकता है, तो उसे लोकतंत्र की वास्तविकता समझने की आवश्यकता है। राजनीतिक दल भी केवल आर्थिक हैसियत देखकर उम्मीदवार नहीं चुन सकते। उन्हें जीत की संभावना, संगठनात्मक स्वीकार्यता, स्थानीय समीकरण, सामाजिक प्रतिनिधित्व और कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया को भी देखना पड़ता है। विशेष रूप से नोएडा जैसी विधानसभा में, जहां भाजपा का मजबूत संगठनात्मक ढांचा और मौजूदा विधायक की स्थापित राजनीतिक मौजूदगी है, वहां किसी नए दावेदार के लिए अपना राजनीतिक आधार तैयार करना लंबी प्रक्रिया है। समाजवादी पार्टी हो या कोई अन्य राजनीतिक दल, किसी भी पार्टी के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण रहेगा कि प्रस्तावित उम्मीदवार को क्षेत्र की जनता कितना जानती है, पार्टी के पुराने कार्यकर्ता उसे कितना स्वीकार करते हैं और क्या उसके पास चुनाव जीतने की वास्तविक राजनीतिक क्षमता है? केवल बड़े आयोजनों की तस्वीरें इस सवाल का जवाब नहीं दे सकतीं।
मुकेश शर्मा द्वारा आयोजित की जा रही तीन दिवसीय रामकथा को लेकर सबसे दिलचस्प राजनीतिक प्रश्न यही है। यदि यह आयोजन पूरी तरह धार्मिक भावना से किया जा रहा है तो इसका स्वागत होना चाहिए। नोएडा में अच्छे धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम होने चाहिए। ऐसे आयोजन समाज को जोड़ने और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से नई पीढ़ी को परिचित कराने का माध्यम बन सकते हैं। लेकिन यदि किसी धार्मिक आयोजन को राजनीतिक पहचान बनाने की रणनीति के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है, तो आयोजक को यह समझना चाहिए कि नोएडा की जनता धार्मिक आस्था और राजनीतिक महत्वाकांक्षा के बीच का अंतर समझती है। राम के नाम पर आयोजन करने से पहले राम के आदर्शों को अपने सार्वजनिक जीवन में उतारना भी आवश्यक है। श्रीराम ने सत्ता को कभी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का साधन नहीं माना। उनके जीवन में राजधर्म का अर्थ जनता के प्रति उत्तरदायित्व था। उनके लिए पद से अधिक महत्वपूर्ण मर्यादा थी और अधिकार से अधिक महत्वपूर्ण कर्तव्य। यदि कोई व्यक्ति विधायक बनने की इच्छा रखता है तो उसे भी इसी कसौटी पर स्वयं को परखना चाहिए।
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नोएडा में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। अलग-अलग राजनीतिक दलों में दावेदार अपनी-अपनी संभावनाएं तलाशेंगे। नए चेहरे सामने आएंगे। कुछ लोग सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी पहचान बनाने का प्रयास करेंगे तो कुछ लोग संगठन के रास्ते अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करेंगे। यह लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन मुकेश शर्मा हों या कोई दूसरा संभावित दावेदार, उन्हें यह समझना होगा कि नोएडा विधानसभा का चुनाव केवल टिकट प्राप्त करने का खेल नहीं है। टिकट मिल जाना भी जीत की गारंटी नहीं होता। जनता किसी व्यक्ति की आर्थिक हैसियत से प्रभावित होकर कुछ समय के लिए उसके कार्यक्रम में पहुंच सकती है, लेकिन मतदान का फैसला वह अपने अनुभव, अपेक्षाओं और भरोसे के आधार पर करती है। किसी भी भावी जनप्रतिनिधि के लिए सबसे बड़ी पूंजी उसका जनाधार है। यह पूंजी न तो बाजार में खरीदी जा सकती है और न ही किसी बड़े मंच पर आयोजित कार्यक्रम से रातोंरात हासिल की जा सकती है। नोएडा के धनवानों को राजनीति में आने से कोई नहीं रोकता, लेकिन उन्हें यह जरूर समझना चाहिए कि राजनीति धन का प्रदर्शन करने का मंच नहीं, जनता के प्रति जवाबदेही निभाने का माध्यम है।
डॉ. कुमार विश्वास की रामकथा में हजारों लोग पहुंचेंगे या नहीं, यह आयोजन की सफलता से तय होगा। लेकिन मुकेश शर्मा की राजनीतिक सफलता का फैसला किसी कथा के पंडाल में नहीं, बल्कि नोएडा की गलियों, गांवों, सोसाइटियों, बाजारों और अंततः मतदान केंद्रों पर होगा। अखिलेश यादव से राजनीतिक उम्मीदें हों या कुमार विश्वास की रामकथा का भव्य आयोजन, दोनों के बीच एक बात समान नहीं की जा सकती। राजनीतिक टिकट पार्टी देती है, लेकिन राजनीतिक वैधता और जनप्रतिनिधित्व का अधिकार जनता देती है। याद रखिए, नोएडा में विधायक बनने के लिए पहले नोएडा के लोगों के दिल में जगह बनानी पड़ती है। केवल धन से मंच सज सकता है, जनादेश नहीं। चेतना मंच का मानना है कि नोएडा की राजनीति में नए लोगों का स्वागत होना चाहिए, लेकिन हर दावेदार को अपनी राजनीतिक योग्यता, जनसेवा और सार्वजनिक जवाबदेही के आधार पर जनता की कसौटी पर उतरना होगा। लोकतंत्र में किसी धनपति की नहीं, अंततः जनता की आवाज की जीत होनी चाहिए। चेतना मंच में जल्दी ही इस विषय का भी खुलासा पढ़ने को मिेलेगा कि ताजा—ताजा धनपति बना मुकेश शर्मा आखिर इतना धन लाया कहां से ? Noida News
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