नोएडा के सेक्टर-118 स्थित ‘‘फुरसत के पल’’ कैफे में देर रात तक गतिविधियां चलने और कथित नशे के सेवन को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। चेतना मंच की टीम की पड़ताल के बाद कैफे की अनुमति, देर रात संचालन और पुलिस निगरानी को लेकर जांच की मांग उठी है।

Noida News : नोएडा शहर के नागरिकों के लिए यह बहुत बड़ा खुलासा है। नोएडा शहर के नागरिकों के लिए बड़ा खुलासा यह है कि शायद ही किसी को पता हो कि नोएडा शहर में एक कोना ऐसा भी है जहां खुल्लम-खुल्ला अपराध पनपते हैं। चौंकिए नहीं! नोएडा शहर में मौजूद अपराध के इस कोने की हकीकत हम आपके सामने रख रहे हैं। सब पता है कि नोएडा शहर की स्थापना 17 अप्रैल 1976 हुई थी। इसका सीधा सा अर्थ है कि नोएडा शहर के पास 50 वर्ष पुरानी सभ्यता है। इस सभ्यता को नोएडा का एक बदनाम कोना तहस-नहस करने पर लगा हुआ है। नोएडा शहर का यह बदनाम कोना नोएडा के सेक्टर-118 में स्थापित है। नोएडा शहर के इस बदनाम कोने का नाम ‘‘फुरसत के पल’’ है। नोएडा के सेक्टर-118 में स्थित ‘‘फुरसत के पल’’ का 3 सिंतबर 2026 तथा 4 सितंबर 2026 की दरमियानी रात चेतना मंच की टीम ने नोएडा के बदनाम कोने के नाम से मौजूद ‘‘फुरसत के पल’’ का भ्रमण किया तो नोएडा की पुरानी सभ्यता तथा संस्कृति की धज्जियां उड़ती हुई साफ नजर आई।

चेतना मंच की टीम ने देखा रात के करीब 11 बजे के बाद जब शहर का बड़ा हिस्सा अपने घरों में लौटने लगता है, तब नोएडा शहर के सेक्टर-118 में एक ऐसी जगह है जहां रात और गहरी होने के साथ भीड़ बढ़ती दिखाई देती है। नाम है ‘‘फुरसत के पल’’’, नाम सुनने में सामान्य है। चाय, खाना और दोस्तों के साथ बैठने की जगह। लेकिन यहां की रात की तस्वीरें कुछ और कहानी कहती हैं। कैफे के भीतर घुसते ही नशे का धुआं दिखाई देता है। देर रात तक युवाओं की मौजूदगी और कैफे के देर रात, यहां तक कि रात भर और सुबह के भोर में 4-5 बजे तक ये कैफे खुला रहता है। जिस पर बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या नोएडा में रात के अंधेरे में नशे के लिए भी जगह बन रही है? और अगर बन रही है तो सबसे बड़ा सवाल कैफे से ज्यादा उस पुलिस व्यवस्था से है, जिसकी जिम्मेदारी ऐसे स्थानों पर नजर रखने की है। क्योंकि यह कोई सुनसान जंगल नहीं है, यह नोएडा है। एक ऐसा शहर जहां पुलिस कमिश्नरेट की व्यवस्था लागू है, जहां कानून-व्यवस्था को लेकर लगातार अभियान चलाए जाते हैं और जहां पुलिस सार्वजनिक स्थानों पर नशे के खिलाफ कार्रवाई का दावा करती है। हाल ही में गौतमबुद्धनगर पुलिस ने सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीने वालों के खिलाफ अभियान चलाकर सख्त से सख्त एक्शन करती है। नोएडा पुलिस की ओर से ऐसे अभियानों का उद्देश्य सार्वजनिक शांति और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना बताया गया है। तो फिर सेक्टर-118 का सवाल पुलिस के सामने क्यों खड़ा है? अगर किसी कैफे में देर रात तक गतिविधियां चल रही हैं और वहां नशीले पदार्थों के सेवन के सबूत दिखाई दे रहे हैं, तो स्थानीय पुलिस की नजर वहां क्यों नहीं पहुंची? अगर पुलिस को जानकारी नहीं थी तो क्यों नहीं थी? और अगर जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
नोएडा शहर के बदनाम कोने के रूप में स्थापित ‘फुरसत के पल’’’, वाले इस क्षेत्र पर उठने वाला एक बड़ा सवाल इस पूरे मामले को गंभीर बनाता है। क्योंकि नशे के खिलाफ लड़ाई सिर्फ बड़े तस्करों को पकडऩे तक सीमित नहीं हो सकती। रात 11 बजे के बाद ‘फुरसत के पल’’, नाम से चलने वाला यह बदनाम कैफे खुला कैसे रहता है? क्या इसकी परमिशन ली गयी है? यदि हां तो किसने परमिशन दी है और किस आधार पर परमिशन दी है? यदि परमिशन नहीं दी गई है तो फिर नोएडा पुलिस की नाक के नीचे बिना अनुमति के यह कारोबार कैसे फल-फूल रहा है और सैकड़ों की संख्या में इस कैफे में लडक़े-लड़कियों का रात भर जमावड़ा क्यों लगा रहता है? इन सवालों के जवाब तलाशे बिना नशे या अवैध गतिविधि वाले कारोबार के खिलाफ कोई भी अभियान अधूरा ही रहेगा। और यहां बात सिर्फ एक कैफे की नहीं है। बात उन परिवारों की है जिनके बच्चे शाम को घर से निकलते हैं तथा उनके माता-पिता को लगता है कि बच्चा दोस्तों के साथ बैठने, चाय पीने या खाना खाने गया है। लेकिन अगर किसी मनोरंजन स्थल के भीतर नशे का माहौल मौजूद हो, तो परिवारों की चिंता स्वाभाविक है। एक माता-पिता के लिए इससे ज्यादा डरावनी बात क्या होगी कि जिस जगह को उनका बच्चा सिर्फ दोस्तों के साथ बैठने की जगह समझकर जा रहा है, वहां उसे नशे का आदी बनाया जा रहा है। यही वजह है कि नोएडा पुलिस की जिम्मेदारी यहां बेहद बढ़ जाती है। नोएडा जैसे शहर में कैफे आदि चलाना अपराध नहीं है यह भी सच है कि सामान्य नियम और प्रशासनिक अनुमति के साथ देर रात तक खाना खिलाना भी अपने आप में कोई अपराध नहीं है। युवाओं का कैफे जाना भी कोई अपराध नहीं है। असली बात यह है कि किसी प्रतिष्ठान में प्रतिबंधित नशे का सेवन या कारोबार हो रहा है, तो उसकी जांच होनी ही चाहिए। यहां नोएडा पुलिस की भूमिका एकदम खुलकर सामने आती है। नोएडा पुलिस को देखना पड़ेगा कि यह बदनाम कैफे ‘फुरसत के पल’, नोएडा शहर के बदनाम कोने में किस प्रकार से संचालित हो रहा है?
यहां यह बताना भी जरूरी है कि नोएडा पुलिस इस प्रकार के बदनाम कोनों में जा-जाकर अनेक बार एक्शन कर चुकी है। नोएडा के सेक्टर-118 में स्थित बदनाम कोना ‘फुरसत के पल’ में आखिर ऐसे क्या सुर्खाब के पर लगे हैं जो इस बदनाम कोने के विरूद्ध नोएडा पुलिस को कार्रवाई का डंडा चलाने से रोक रहे हैं। इस बदनाम कोने की तुरन्त जांच होनी ही चाहिए। चेतना मंच की टीम का बिल्कुल साफ मत है कि इस बदनाम कोने की जांच में सब कुछ नियमों के मुताबिक मिलता है तो पूरी तस्वीर साफ हो जाएगी। लेकिन अगर कुछ गैरकानूनी सामने आता है तो कार्रवाई होना भी जरूरी है। चेतना मंच की टीम का यह भी मानना है कि किसी भी प्रदेश, किसी भी जिले अथवा किसी भी शहर में कानून-व्यवस्था सिर्फ अपराध होने के बाद कार्रवाई करने का नाम नहीं है। अपराध को होने से रोकना भी पुलिसिंग का हिस्सा है। नशे जैसे भयानक अपराध के मामले में तो यह जिम्मेदारी और भी बड़ी हो जाती है। आज एक युवा सिर्फ धुएं के बीच बैठता है। कल वही नशे की गिरफ्त में आ सकता है। फिर वही नशा अपराध तक पहुंच सकता है। और अंत में उसका असर सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, पूरे परिवार और समाज पर पड़ता है। इसलिए सेक्टर-118 के इस मामले को भी सिर्फ एक कैफे की खबर समझकर छोड़ देना बिल्कुल भी ठीक नहीं माना जा सकता। चेतना मंच की टीम का यह भी साफ मानना है कि नोएडा शहर में फील्ड में तैनात नोएडा पुलिस के अधिकारी तथा कर्मचारियों की पुलिसिंग की भी यह बड़ी परीक्षा है। नोएडा पुलिस के द्वारा यह देखे जाने की भी जरूरत है कि नोएडा शहर में रात 11 बजे के बाद क्या हो रहा है? और उसकी निगरानी कौन कर रहा है। कौन-कौन से प्रतिष्ठान देर रात तक खुले हैं? क्या उनके पास वैध अनुमति है? क्या वहां शराब या नशीले पदार्थों का सेवन हो रहा है? क्या प्रतिबंधित पदार्थों की बिक्री या आपूर्ति की कोई शिकायत है? और सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि अगर नोएडा शहर की पुलिस नशे के खिलाफ अभियान चला रही है, तो सेक्टर-118 में स्थित नोएडा शहर के इस ‘‘बदनाम कोने’’ की इस जगह तक उस अभियान की पहुंच कब होगी? Noida News
चेतना मंच की टीम यहां यह स्पष्ट करना चाहती है कि यह पूरा मामला किसी व्यक्ति अथवा किसी कारोबार को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था की जवाबदेही तय करने के लिए जरूरी है। क्योंकि अगर कोई निर्दोष है तो जांच उसे भी साफ करेगी। और अगर कोई कानून तोड़ रहा है तो जांच ही उसके खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खोलेगी। इसलिए जरूरत आरोप की नहीं, जांच की है। जरूरत अफवाह की नहीं, सच्चाई सामने लाने की है। और जरूरत ऐसी पुलिसिंग की है, जिसमें नोएडा शहर का कोई माता-पिता अपने बच्चे के रात में बाहर होने पर यह भरोसा कर सके कि शहर की पुलिस सिर्फ सडक़ पर नहीं, बल्कि उन जगहों पर भी नजर रख रही है जहां से नशा और अपराध पनप सकता है।‘फुरसत के पल’ के बाहर शायद रोशनी हो। अंदर शायद चाय और खाना भी हो। लेकिन अगर उसी जगह पर नशे का धुआं उठ रहा है, तो सवाल सिर्फ धुएं का नहीं है। सवाल यह है कि वह धुआं नोएडा पुलिस की नजर तक क्यों नहीं पहुंचा? और अगर पहुंचा है, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? अब निगाह नोएडा पुलिस पर है कि इस मामले की जांच होगी या सारे सवाल रात के अंधेरे में ही दबकर रह जाएंगे? Noida News
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