दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव और 1975 बैच के सेवानिवृत्त IAS अधिकारी राकेश मेहता की नोएडा के सेक्टर-82 स्थित केंद्रीय विहार-2 में मौत की खबर से प्रशासनिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई। जीवन के आखिरी दौर में वही व्यक्ति नोएडा के सेक्टर-82 स्थित एक किराये के फ्लैट में अकेला मिला।

Noida News : एक समय ऐसा भी था जब दिल्ली की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था में एक वरिष्ठ अधिकारी के फैसले का व्यापक असर दिखाई देता था। फाइलों पर लिए गए फैसले, सरकारी मशीनरी की गति और राजधानी के बड़े प्रोजेक्टों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। लेकिन जीवन के आखिरी दौर में वही व्यक्ति नोएडा के सेक्टर-82 स्थित एक किराये के फ्लैट में अकेला मिला। यह कहानी है 1975 बैच के पूर्व IAS अधिकारी और दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव राकेश मेहता की। 6 सितंबर 2026 को सेक्टर-82 स्थित केंद्रीय विहार-2 में उनकी मौत ने नोएडा ही नहीं, दिल्ली के प्रशासनिक और सामाजिक हलकों को भी झकझोर दिया। पुलिस के अनुसार मौके से एक कथित सुसाइड नोट मिला, जिसमें उन्होंने लंबे समय से चली आ रही स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का उल्लेख किया था और किसी को अपनी मौत के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया था। पुलिस की जांच जारी रही। लेकिन इस घटना का एक दूसरा पहलू भी है एक सफल जीवन के आखिरी वर्षों में अकेलापन कितना बड़ा सवाल बन सकता है? Noida News
राकेश मेहता ने भारतीय प्रशासनिक सेवा में तीन दशक से अधिक समय तक काम किया। वह दिल्ली सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे और दिल्ली नगर निगम के आयुक्त के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 2007 में उन्होंने दिल्ली के मुख्य सचिव का पद संभाला और नवंबर 2010 में सेवानिवृत्त हुए। उनके कार्यकाल में 2010 के राष्ट्रमंडल खेल भी आयोजित हुए। दिल्ली के परिवहन, बिजली और नागरिक बुनियादी ढांचे से जुड़े कई महत्वपूर्ण कामों से उनका नाम जोड़ा गया। एक दौर में वह राजधानी की प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पर थे। Noida News
सेवानिवृत्ति के बाद जीवन एक अलग धरातल पर आ जाता है। जहां फाइलें नहीं होतीं, मीटिंग नहीं होतीं, सरकारी फोन नहीं बजते और हर निर्णय का इंतजार करने वाली व्यवस्था आसपास नहीं होती। यहीं से इस पूरी घटना का सबसे बड़ा सामाजिक सवाल सामने आता है। Noida News
1975 बैच के पूर्व IAS अधिकारी और दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव राकेश मेहता करीब पांच वर्षों से सेक्टर-82 के केंद्रीय विहार-2 में रह रहे थे। उनकी पत्नी भी दिल्ली कैडर की सेवानिवृत्त IAS अधिकारी हैं और बेटे के साथ देहरादून में रहती थीं, जबकि उनकी बेटी लंदन में रहती थी। परिवार उनसे मिलने आता-जाता था। घटना से एक रात पहले उनकी पत्नी से फोन पर बातचीत भी हुई थी। अगले दिन फोन का जवाब नहीं मिलने पर परिवार की ओर से सोसाइटी के सुरक्षा कर्मचारियों को जानकारी दी गई। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि उनकी मृत्यु का कारण केवल अकेलापन था। उपलब्ध पुलिस जानकारी में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का उल्लेख है। लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या आधुनिक जीवन में परिवार का सफल और व्यवस्थित होना अपने आप बुजुर्गों के भावनात्मक साथ की गारंटी भी देता है? शायद नहीं। पद चला जाता है, लेकिन इंसान को अपनी पहचान बचाए रखनी होती है हमारे समाज में सफलता की एक अजीब परिभाषा बन गई है। बड़ा पद मिल गया—सफल। बच्चे विदेश में बस गए—सफल। बैंक बैलेंस बढ़ गया—सफल। बड़ा घर बन गया—सफल। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल अक्सर छूट जाता है - जब काम खत्म हो जाएगा, तब दिन किसके साथ गुजरेगा? राकेश मेहता का जीवन इस सवाल को और गंभीर बना देता है। कुर्सी पर रहते हुए व्यक्ति के आसपास लोगों की कमी नहीं होती। लेकिन कुर्सी हटने के बाद अगर दोस्ती, पड़ोस, सामाजिक जुड़ाव और रोजमर्रा के आत्मीय रिश्ते कमजोर पड़ जाएं तो जीवन अचानक बहुत शांत हो सकता है। और कभी-कभी यही शांति बेहद भारी महसूस हो सकती है। Noida News
आज का परिवार पहले जैसा नहीं रहा। बच्चे पढ़ाई और नौकरी के लिए दूसरे शहरों, दूसरे राज्यों और दूसरे देशों में चले जाते हैं। यह बुरा नहीं है। बच्चों को आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन माता-पिता के लिए भी एक समानांतर जीवन जरूरी है। ऐसा जीवन जिसमें केवल बच्चों के फोन का इंतजार न हो। सुबह की सैर के साथी हों। शाम की चाय के लिए कोई मित्र हो। पड़ोसी से बातचीत हो। किताबें हों। सामाजिक गतिविधियां हों। किसी संस्था से जुड़ाव हो। और सबसे जरूरी - किसी के पास बैठकर बिना किसी काम के बात करने का अवसर हो। बच्चों की सफलता गर्व की बात है, लेकिन बुढ़ापे की पूरी भावनात्मक सुरक्षा केवल बच्चों की उपलब्धियों पर निर्भर नहीं हो सकती। अकेलापन दिखाई नहीं देता, लेकिन उसका असर गहरा हो सकता है। स्वास्थ्य संबंधी बीमारी दिखाई देती है। ब्लड प्रेशर की दवा दिखाई देती है। डायबिटीज की रिपोर्ट दिखाई देती है। लेकिन अकेलापन अक्सर दिखाई नहीं देता। किसी कमरे में अकेले रहने वाला व्यक्ति बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखाई दे सकता है। वह अखबार पढ़ सकता है, टीवी देख सकता है, फोन पर बात कर सकता है और अपने काम कर सकता है। फिर भी भीतर कितनी खाली जगह है—यह हमेशा दिखाई नहीं देती। इसीलिए बुजुर्गों की देखभाल केवल दवा और भोजन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनके साथ संवाद भी उतना ही जरूरी है। Noida News
राकेश मेहता की मौत के वास्तविक कारणों को लेकर अंतिम निष्कर्ष पुलिस जांच और उपलब्ध आधिकारिक तथ्यों के आधार पर ही निकाला जाना चाहिए। मौके से मिले कथित नोट में स्वास्थ्य संबंधी परेशानी का उल्लेख होना महत्वपूर्ण तथ्य है। पुलिस ने भी इसी दिशा में जानकारी दी है। इसलिए उनकी मौत को किसी एक सामाजिक कारण से जोड़ देना उचित नहीं होगा। लेकिन एक बात पर समाज को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि क्या हम अपने बुजुर्गों के लिए पर्याप्त सामाजिक और भावनात्मक व्यवस्था बना रहे हैं? यह सवाल केवल किसी एक परिवार का नहीं है। यह नोएडा के उन हजारों परिवारों का सवाल है, जिनके बच्चे दूसरे शहरों या विदेशों में हैं। यह उन रिटायर्ड अधिकारियों का सवाल है, जिन्होंने पूरी जिंदगी व्यवस्था को चलाया और अब खुद व्यवस्था से बाहर हैं। यह उन माता-पिता का सवाल है, जो बच्चों के भविष्य के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा देते हैं और फिर एक दिन देखते हैं कि घर बड़ा है, लेकिन उसमें बातचीत करने वाला कोई नहीं। Noida News
राकेश मेहता की घटना को केवल एक दुखद खबर मानकर भूल जाना शायद इस घटना के सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संदेश को खो देना होगा। जिंदगी में कोई भी व्यक्ति सब कुछ हासिल नहीं कर सकता। हर किसी के जीवन में कुछ कमी रहती है। कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता। लेकिन अधूरे जहां को भी रिश्तों की गर्माहट से खूबसूरत बनाया जा सकता है। इसके लिए बहुत बड़ी चीज की जरूरत नहीं है। कभी मां-बाप के पास बैठकर चाय पी लेना। कभी किसी पुराने दोस्त को फोन कर देना। कभी पड़ोसी के घर जाकर पूछ लेना—“सब ठीक है?” कभी अपने बुजुर्ग से केवल पांच मिनट बात कर लेना। शायद सामने वाला व्यक्ति किसी समाधान की मांग नहीं कर रहा हो। उसे केवल किसी की मौजूदगी चाहिए हो। दौड़ते रहिए, लेकिन कभी रुककर पीछे भी देखिए। हम पूरी जिंदगी भविष्य बनाने में लगा देते हैं। बच्चों का भविष्य। घर का भविष्य। करियर का भविष्य। बैंक बैलेंस का भविष्य। लेकिन इसी दौड़ में वर्तमान कहीं पीछे छूट जाता है। Noida News
राकेश मेहता की मौत का सबसे बड़ा सामाजिक संदेश शायद यही है
जीवन में सफलता जरूरी है, लेकिन सफलता के बाद जीने के लिए संबंधों को बचाकर रखना उससे कम जरूरी नहीं। कुर्सी चली जाती है। पद चला जाता है। सरकारी गाड़ी चली जाती है। नाम के आगे लगे पदनाम चले जाते हैं। लेकिन आदमी तब भी आदमी रहता है। और उस आदमी को जरूरत होती है— किसी अपने की आवाज की, किसी दोस्त की मौजूदगी की और कभी-कभी बिना किसी मतलब के साथ बैठने वाले इंसान की। इसलिए आज ही अपने किसी बुजुर्ग को फोन कीजिए और अगर संभव हो तो केवल फोन मत कीजिए उनके पास बैठिए। क्योंकि हो सकता है, जिसे हम केवल पांच मिनट का समय समझ रहे हों, किसी दूसरे के लिए वही पांच मिनट पूरे दिन की सबसे बड़ी खुशी हों। Noida News
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