नोएडा के DLF मॉल की जमीन पर है बड़ा विवाद, आया सुप्रीम फैसला
Noida Samachar
भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 09:34 PM
Noida Samachar: नोएडा के सेक्टर-18 में DLF मॉल नोएडा का सबसे बड़ा मॉल है। नोएडा की जिस जमीन पर DLF मॉल बना खड़ा है। उस जमीन पर बहुत बड़ा विवाद है। नोएडा के DLF मॉल की जमीन के विवाद पर हाल ही में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कारण नोएडा के DLF मॉल की जमीन एक बार फिर से चर्चा का विषय बन गई है।
क्या है नोएडा के DLF मॉल की जमीन का विवाद?
नोएडा में छलेरा नाम का एक प्रसिद्ध गांव है। नोएडा का DLF मॉल जिस जमीन पर बना हुआ है। वह जमीन छलेरा गांव की हुआ करती थी। बताया जाता है कि वर्ष-1997 में DLF मॉल वाली जमीन को रेड्डी विराना, विष्णु वर्धन तथा टी सुधाकर नामक व्यापारियों ने एक साथ खरीद लिया था। वर्ष-2005 में नोएडा प्राधिकरण ने इस जमीन का विधिवत अधिग्रहण कर लिया था। अधिग्रहण के बाद नोएडा प्राधिकरण ने इस जमीन को DLF मॉल बनाने के लिए DLF कंपनी को 173 करोड़ रुपए की कीमत पर आंवटित कर दिया था। उधर इस जमीन को खरीदने वाले व्यापारियों रेड्डी वीराना आदि ने जमीन का मुआवजा बढ़ाने की लड़ाई कोर्ट में लड़ी। वर्ष-2021 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मुआवजे की दर 55,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर तय की, जिसे 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ाकर 1,10,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर कर दिया, जिससे मुआवजा ब्याज सहित 350 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। नोएडा प्राधिकरण ने 295 करोड़ रुपये के मुआवजे पर सहमति जताई और भुगतान किया।
सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया अपना ही आदेश
हाल ही में 23 जुलाई को नोएडा के DLF मॉल वाली जमीन पर सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला सुनाया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2022 के आदेश को रद्द कर दिया गया। यह फैसला विष्णु वर्धन की याचिका पर आधारित था, जिन्होंने दावा किया कि रेड्डी वीराना ने धोखाधड़ी से जमीन का अकेला मालिक होने का दावा किया और मुआवजा हासिल कर लिया, जबकि वर्धन और सुधाकर को बाहर कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी से प्राप्त कोई भी आदेश शून्य है और इसे चुनौती दी जा सकती है, भले ही यह सुप्रीम कोर्ट का आदेश हो। जस्टिस सूर्य कान्त, दीपांकर दत्ता, और उज्जल भुयान की बेंच ने यह स्पष्ट किया कि "न्याय और धोखाधड़ी साथ-साथ नहीं रह सकते।" कोर्ट ने 2022 के आदेश को "निरस्त" करार दिया और मामले को दोबारा विचार के लिए भेज दिया, जिसमें विष्णु वर्धन और सुधाकर को अतिरिक्त प्रतिवादी बनाया गया। विष्णु वर्धन का कहना है कि दादरी तहसील के नायब तहसीलदार की लापरवाही के कारण उनका नाम खतौनी में दर्ज नहीं हुआ, जिससे वे मुआवजे से वंचित रह गए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है और 100 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की है। उनका दावा है कि जमीन का हिस्सा उनके पास भी था, और उन्हें उचित मुआवजा मिलना चाहिए।
नोएडा प्राधिकरण का कहना है कि सभी वैध दावों का निपटारा कर दिया गया है और विष्णु वर्धन का दावा अदालत में विचाराधीन है। दूसरी ओर, DLF ने पहले 235 करोड़ रुपये की मुआवजे की मांग के नोटिस को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, जो अभी विचाराधीन है। प्राधिकरण और डीएलएफ दोनों ने अदालत में अपना पक्ष रखा है, लेकिन कोर्ट ने सभी पक्षों से जवाब मांगा है।
नया नहीं है DLF मॉल की जमीन का विवाद
नोएडा के DLF मॉल की जमीन का यह विवाद नया नहीं है। इससे पहले भी इसी जमीन को लेकर 295 करोड़ रुपये के मुआवजे का मामला अदालत तक पहुंचा था। 2021 में हाई कोर्ट ने मुआवजे की दर तय की थी, और 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे बढ़ाया था। हालांकि, विष्णु वर्धन का दावा कि उनका नाम रिकॉर्ड में नहीं था, ने मामले को और जटिल बना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने "धोखाधड़ी सब कुछ उलट देती है" के सिद्धांत को लागू किया, जो कहता है कि यदि कोई आदेश धोखाधड़ी से प्राप्त हुआ है, तो वह शून्य है और इसे चुनौती दी जा सकती है, भले ही वह सुप्रीम कोर्ट का आदेश हो। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि हाई कोर्ट का निर्णय, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी, धोखाधड़ी से प्राप्त हुआ है, तो प्रभावित पक्ष हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील कर सकता है, न कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की समीक्षा।