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देश के बड़े औद्योगिक केंद्रों में गिने जाने वाले नोएडा में सोमवार को मजदूरों का आक्रोश अचानक सड़कों पर फूट पड़ा। देखते ही देखते विरोध-प्रदर्शन ने उग्र रूप ले लिया और नोएडा के कई औद्योगिक इलाकों में तनाव बढ़ गया।

Noida News : देश के बड़े औद्योगिक केंद्रों में गिने जाने वाले नोएडा में सोमवार को मजदूरों का आक्रोश अचानक सड़कों पर फूट पड़ा। देखते ही देखते विरोध-प्रदर्शन ने उग्र रूप ले लिया और नोएडा के कई औद्योगिक इलाकों में तनाव बढ़ गया। हालात ऐसे बने कि दिल्ली से सटे मार्गों पर लंबा जाम लग गया, वाहन रेंगने लगे और आम लोगों को घंटों परेशानी झेलनी पड़ी। नोएडा के कुछ इलाकों में तोड़फोड़, पथराव और आगजनी की घटनाओं ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी। Noida News
पहली नजर में यह मामला वेतन, बोनस और ओवरटाइम का लग सकता है, लेकिन नोएडा के मजदूरों की बातें सुनने पर साफ होता है कि यह गुस्सा सिर्फ एक-दो मांगों तक सीमित नहीं है। दरअसल, लंबे समय से जमा असंतोष, ठेकेदारी प्रथा, सामाजिक सुरक्षा की कमी, कम वेतन, बढ़ता किराया और असमान सुविधाओं ने मिलकर नोएडा के श्रमिकों के भीतर निराशा और नाराजगी पैदा की है। यही दबाव आखिरकार विरोध के रूप में सामने आया। नोएडा के कई मजदूरों का कहना है कि कंपनियां उन्हें सीधे काम पर रखने के बजाय ठेकेदारों के माध्यम से भर्ती करती हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि मजदूरों के अधिकार कमजोर पड़ जाते हैं। ठेकेदार अपने हिसाब से लोगों को रखते हैं, वेतन तय करते हैं और कई बार काम का बोझ भी जरूरत से ज्यादा डालते हैं। एक महिला श्रमिक ने बताया कि वह रोज लंबे घंटे काम करती है, लेकिन उसके बदले मिलने वाली तनख्वाह नोएडा जैसे महंगे शहर में गुजारे लायक भी नहीं है। Noida News
नोएडा की औद्योगिक इकाइयों में काम करने वाले कई श्रमिकों ने आरोप लगाया कि ठेकेदार के जरिए काम करने वालों को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिलतीं। न पीएफ की सुरक्षा, न ईएसआईसी की मदद और न ही बीमारी या आपात स्थिति में नौकरी की गारंटी। मजदूरों का कहना है कि कंपनी के स्थायी कर्मचारियों को छुट्टियां, बीमा और अन्य सुविधाएं मिल जाती हैं, लेकिन अनियमित या ठेका कर्मियों के साथ अलग व्यवहार होता है। यही भेदभाव नोएडा के मजदूरों में लगातार असंतोष बढ़ा रहा है। कई महिलाओं ने बताया कि धागा काटने, सिलाई, सफाई और सपोर्ट स्टाफ जैसे कामों में लगे कर्मचारियों की हालत सबसे ज्यादा खराब है। बहुत कम वेतन में उनसे लंबी ड्यूटी ली जाती है। कुछ जगहों पर सुरक्षा गार्डों और दूसरे कर्मचारियों को साथी की गैरहाजिरी में डबल ड्यूटी भी करनी पड़ती है। ऐसे में नोएडा के मजदूरों की नाराजगी केवल पैसे की नहीं, काम की शर्तों की भी है। Noida News
मजदूरों का कहना है कि सरकारें न्यूनतम मजदूरी को लेकर आदेश तो जारी करती हैं, लेकिन नोएडा की फैक्ट्रियों में उसका पालन हर जगह नहीं होता। श्रमिकों का आरोप है कि नियम किताबों और सरकारी कागजों में तो हैं, लेकिन जमीन पर उनकी ताकत कम दिखती है। जो मजदूर सबसे निचले स्तर पर काम कर रहे हैं, वे ही अक्सर इन लाभों से बाहर रह जाते हैं। शिकायत करने में भी डर लगता है, क्योंकि नौकरी छूटने का खतरा हमेशा सिर पर मंडराता रहता है। नोएडा में रहना अब मजदूर वर्ग के लिए और मुश्किल होता जा रहा है। कई श्रमिकों ने कहा कि उन्हें छोटे कमरों में साझा तौर पर रहना पड़ता है, फिर भी मकान का किराया हर साल बढ़ जाता है। ऊपर से बिजली का अलग बिल। ऐसे में 11 से 13 हजार रुपये की मासिक आय में घर चलाना आसान नहीं है। मजदूरों के अनुसार कंपनियां वेतन में सालाना मामूली बढ़ोतरी करती हैं, लेकिन नोएडा में जिंदगी की लागत उससे कहीं तेजी से बढ़ रही है। कुछ श्रमिकों ने साफ कहा कि अगर उनसे 8 से 12 घंटे तक लगातार काम लिया जा रहा है, तो वेतन भी सम्मानजनक होना चाहिए। उनका मानना है कि नोएडा जैसे औद्योगिक शहर में कम से कम इतना भुगतान तो होना ही चाहिए जिससे किराया, भोजन, इलाज और परिवार की जरूरतें पूरी हो सकें। Noida News
नोएडा के कई मजदूरों ने बताया कि बोनस के नाम पर उन्हें वास्तविक आर्थिक राहत नहीं मिलती। नकद लाभ देने के बजाय कई बार औपचारिक उपहार देकर मामला खत्म कर दिया जाता है। यही नहीं, ओवरटाइम को लेकर भी शिकायतें गंभीर हैं। मजदूरों का कहना है कि वे अतिरिक्त घंटे इसलिए काम करते हैं क्योंकि सिर्फ बेसिक वेतन से नोएडा में गुजारा संभव नहीं, लेकिन ओवरटाइम का पैसा भी नियमों के मुताबिक नहीं दिया जाता। कुछ श्रमिकों ने यह भी आरोप लगाया कि उनसे डबल शिफ्ट के दस्तखत लिए जाते हैं, मगर भुगतान सिर्फ एक शिफ्ट का होता है। यदि यह आरोप सही हैं, तो मामला केवल श्रमिक असंतोष का नहीं, बल्कि श्रम कानूनों के पालन पर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है। Noida News
नोएडा में काम करने वाले कम आय वाले परिवारों की हालत इतनी नाजुक है कि घर का कोई एक सदस्य बीमार पड़ जाए तो पूरा बजट बिगड़ जाता है। एक महिला श्रमिक ने बताया कि वह नोएडा में किराये पर रहती है, फैक्ट्री में सिलाई का काम करती है और ओवरटाइम जोड़ने के बाद भी सीमित आमदनी ही हो पाती है। ऐसे में इलाज, बच्चों का खर्च और घर का राशन साथ संभालना बेहद मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि मजदूर पीएफ और ईएसआईसी जैसी सुविधाओं को सुविधा नहीं, जरूरत मानते हैं। Noida News
नोएडा के मजदूरों के बीच यह भावना भी दिखी कि पड़ोसी राज्यों में श्रमिकों को बेहतर वेतन और ज्यादा स्पष्ट नियम मिल रहे हैं। कई लोगों ने कहा कि यदि अन्य राज्यों में न्यूनतम वेतन और श्रमिक सुरक्षा पर गंभीरता दिखाई जा सकती है, तो नोएडा जैसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र में ऐसा क्यों नहीं हो सकता। इस तुलना ने भी स्थानीय मजदूरों की अपेक्षाएं बढ़ाई हैं और असंतोष को धार दी है। Noida News
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