
अमित सिंह, खेलचिंतक
Games and Players: खेल और खिलाड़ी हाशियें पर क्यों? ये सवाल हम नहीं बल्कि खेल में भविष्य संवारने की चाह रखने वाले हजारों ऐसे युवाओं की है जिनके पास उचित एप्रोच या पैरवी करने वाला मार्गदर्शक उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे खेल प्रतिभा अगर छोटी मोटी अकादमी का सहारा लेकर हालात से लड़़ने की कोशिश करता है तो खेल की अंदरूनी राजनीति उनके पर कतरने के लिए तैयार बैठे हैं।
आज के समय में सभी वर्गों केलोग बच्चों के सर्वांगीण विकास को प्रयासरत है। वहीं दूसरी ओर कुछ संघ/ संगठनों के पदाधिकारी इस विकास की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करने पर आमदा है।
130 करोड़ से अधिक की आबादी वाले इस देश में जहां युवाशक्ति डॉक्टर, इंजिनियर, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं आदि का लोहा पूरा विश्व मानता है। वहां के खिलाडियों को उस श्रेणी में क्यों नहीं गिना जाता। खेलों के महाकुंभ ओलिंपिक की पदक तालिका में वर्तमान परिवेश में टॉप तीन तो भूल ही जाइये टॉप टेन भी अविश्वसनीय लगता है। खेल संस्थानों के पदाधिकारियों की दूरदर्शी सोच के अभाव और तानाशाही रवैये से निकट भविष्य में भी यह लक्ष्य असंभव सा लगता है।
गत दिनों समाचार पत्रों के माध्यम से ज्ञात हुआ की एक स्वायत्तशासी खेल संस्था के पदाधिकारी ने चल रही खेल प्रतियोगिता में जाकर उस प्रतियोगिता में खेल रहे पंजीकृत खिलाड़ियों को धमकाया कि उनकी संस्था द्वारा सभी पंजीकृत खिलाडियों को बैन कर दिया जाएगा। इस प्रकरण में कुछ बातें समझ से परे है कि एक संस्था जो एक खिलाडी को पंजीकृत करने से लेकर कैंप और प्रतियोगिताओं में खेलने तक हर एवज में एक धनराशि प्राप्त करती है। बिना धनराशि के किसी को प्रतियोगिताओं में खिलाना तो दूर प्रतियोगिता के बारे में बात भी नहीं करते। वह किस अधिकार से खिलाडियों को अन्य प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग करने से रोक सकती है। एक खिलाडी जो खेलने और पंजीकरण का शुल्क भरता है, उन संस्थाओं द्वारा उनके साथ बंधुआ जैसा व्यवहार किया जाता है। अब तुम पंजीकृत हो। यहां नहीं खेल सकते, वहां नहीं खेल सकते, यदि कानूनन देखा जाए तो यह संविधान में प्राप्त एक नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन है।
मुझे पूर्ण विश्वास है की स्वायत्तशासी खेल संस्था के पदाधिकारी द्वारा किए गए तमाशे ने वहां मौजूद अभिभावकों और खिलाड़ियों को यह सोचने पर अवश्य विवश किया होगा कि इस मानसिक प्रताड़ना को कौन झेलना चाहेगा, इससे बेहतर है किसी और स्थान की खेल संस्था के साथ जुड़ना बेहतर होगा। इन स्वायत्तशासी खेल संस्थाओं के संबंध के कुछ जानकारी साझा करता हूं।
यह सभी खेल संस्थाएं स्व-गठित संस्थाएं हैं, जिनमें गठन के दौरान पदाधिकारियों के चयन में कोई लोकतान्त्रिक प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती, बल्कि बंद कमरे या आज के दौर के अनुसार ऑनलाइन मीटिंग के दौरान कुछ पूर्व परिचित लोग आपस में मिलकर पदाधिकारी तय करते हैं, उसके उपरांत किसी सांठ-गांठ या अन्य किसी प्रकार से अपनी संस्था को संबंधित खेल की राज्य अथवा राष्ट्रीय स्तर की संस्था से मान्यता प्राप्त करा लेते हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि मान्यता प्रदान करने वाली संस्था इसी प्रकार गठित हुई थी।
संस्था के पदाधिकारी द्वारा खिलाडियों को गैर मान्यता प्राप्त प्रतियोगिताओं में खेलने से रोकना ऐसा है जैसा की उस विद्यालय के अध्यापक जहां हम अपने बच्चों का दाखिला एकमुश्त धनराशि देकर कराते है और प्रतिमाह मासिक शुल्क भी भरते हैं। वो किसी निजी ट्युशन या कोचिंग में आकर कहें कि तुम इस ट्युशन या कोचिंग के में टेस्ट नहीं दे सकते। कानून किसी भी व्यक्ति चाहे वो कितना ही बड़ा पदाधिकारी क्यों न हो, उसे यह अधिकार नहीं देता कि वो किसी सार्वजनिक स्थल पर जाकर हंगामा करे, यदि किसी को कोई आपति है तो उसको अपनी आपति दर्ज कराने का पूर्ण अधिकार है, परन्तु विधिवत रूप से न की गुंडई दिखाते हुए हंगामा कर खेल संस्थाओं के अपने बाय-लॉज़ है। जिनका निर्धारण संस्था के पदाधिकारियों के द्वारा किया जाता है। संस्था के द्वारा तय किए गए शुल्क आदि का अनुमोदन न खेल विभाग द्वारा किया जाता है और न ही किसी अन्य सरकारी उपक्रम द्वारा।
यदि किसी भी आयोजनकर्ता द्वारा आयोजन के दौरान कोई गैरकानूनी गतिविधि की गई है तो उसके विरुद्ध विधिवत कार्यवाही की जानी चाहिए और साथ ही स्वायत्तशासी खेल संस्थाओं के पदाधिकारियों के विरुद्ध भी जो अपने निजी हितों को साधने और दूसरों को आर्थिक या सामाजिक क्षति पहुंचाने के लिए खेल संस्था और पद दोनों की गरिमा खंडित करते हैं।
मैं अपनी कलम को इस बिंदु के साथ विराम देने के साथ इस बात को आपके बीच छोड़ रहा हूं कि इन स्वायत्तशासी खेल संस्थाओं के पदाधिकारियों को जहां यह चिंता होनी चाहिए कि ओलिंपिक जैसे पटल पर अधिक से अधिक खिलाड़ी पोडियम तक कैसे पहुंचे, वहां उनको खिलाडियों और खेल आयोजकों को प्रताड़ित करने और दूसरे को नीचा दिखाने की चिंता ज्यादा है। क्या ऐसे पदाधिकारियों को पद पर बने रहकर खेल और खिलाडियों का नुक्सान करने का और मौका मिलना चाहिये?