पूर्व क्रिकेटर और जियोस्टार के एक्सपर्ट आकाश चोपड़ा ने सार्वजनिक किया। गंभीर का साफ संदेश है – अगर आराम चाहिए, तो सबसे पहले IPL छोड़ने की हिम्मत दिखाइए, लेकिन टीम इंडिया की जर्सी पहनकर थकान और वर्कलोड की दुहाई मत दीजिए।

कोलकाता टेस्ट के दौरान आई शुभमन गिल की गर्दन की चोट ने टीम इंडिया के ड्रेसिंग रूम से लेकर टीवी स्टूडियो तक एक पुराना सवाल फिर ताज़ा कर दिया है – भारतीय क्रिकेटरों पर आखिर कितना बोझ डाला जा रहा है? और इस बोझ को कम करने के नाम पर बार–बार उठने वाला ‘वर्कलोड मैनेजमेंट’ का मुद्दा वाकई कितना वाजिब है? इसी बहस के बीच टीम इंडिया के हेड कोच गौतम गंभीर का एक बयान सुर्खियों में है, जिसे पूर्व क्रिकेटर और जियोस्टार के एक्सपर्ट आकाश चोपड़ा ने सार्वजनिक किया। गंभीर का साफ संदेश है – अगर आराम चाहिए, तो सबसे पहले IPL छोड़ने की हिम्मत दिखाइए, लेकिन टीम इंडिया की जर्सी पहनकर थकान और वर्कलोड की दुहाई मत दीजिए।
कोलकाता में खेले गए टेस्ट मैच के दौरान शुभमन गिल को अचानक गर्दन में जकड़न (नेक स्पैज्म) की समस्या हुई। पहले यह मामूली तकलीफ समझी गई, लेकिन धीरे–धीरे इतनी बढ़ गई कि उन्हें सीरीज के दूसरे और निर्णायक टेस्ट से बाहर होना पड़ा। यह मुकाबला भारत के लिए ‘करो या मरो’ जैसा माना जा रहा है, ऐसे में कप्तान और टॉप ऑर्डर बल्लेबाज दोनों भूमिकाओं में गिल की गैरमौजूदगी बड़ा झटका है। गिल पिछले करीब दो महीने से बिना रुके क्रिकेट खेल रहे हैं। एशिया कप से लेकर घरेलू साउथ अफ्रीका सीरीज तक, लगभग हर फॉर्मेट में उनकी मौजूदगी लगातार बनी रही। इस बीच जहां कुछ सीनियर खिलाड़ियों को आराम और रोटेशन का फायदा मिला, वहीं 25 साल के गिल ODI कप्तान और T20 उपकप्तान होने के नाते लगभग हर मैच में मैदान पर उतरे।
जैसे ही गिल की चोट की खबर सामने आई, सोशल मीडिया से लेकर एक्सपर्ट पैनल तक ‘वर्कलोड मैनेजमेंट’ शब्द फिर गूंजने लगा। लेकिन गौतम गंभीर इस पूरी बहस को एक अलग नजरिए से देख रहे हैं। आकाश चोपड़ा के मुताबिक, गंभीर ने निजी बातचीत में साफ कहा –अगर वर्कलोड मैनेजमेंट चाहिए तो IPL खेलना बंद करो। अगर कप्तानी का प्रेशर ज्यादा लग रहा है तो मत करो कप्तानी। लेकिन जब बात भारत के लिए खेलने की हो, तब फिटनेस और मानसिक थकान को बहाना नहीं बनाया जा सकता।
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय क्रिकेट में वर्कलोड मैनेजमेंट धीरे–धीरे एक आम प्रैक्टिस जैसा हो गया है। कई सीनियर खिलाड़ियों को टेस्ट, ODI और T20 के बीच ब्रेक दिए गए। चयनकर्ता और टीम प्रबंधन भी इसे ‘आधुनिक क्रिकेट की जरूरत’ के तौर पर पेश करते रहे हैं। लेकिन गंभीर का मानना है कि अगर किसी खिलाड़ी को वाकई आराम चाहिए, तो उसे पहले IPL जैसी लीग में अपनी भागीदारी कम करने या छोड़ने का साहस दिखाना चाहिए।राष्ट्रीय टीम के लिए खेले जाने वाले मैचों को किसी भी हालत में बैकसीट पर नहीं रखा जा सकता।
आकाश चोपड़ा भी इस नजरिए से सहमत दिखाई दिए। उनका तर्क है कि बल्लेबाज के लिए फॉर्म सोने से भी कीमती होती है।जब आप रन बना रहे होते हैं और लय में होते हैं, तब आपको ज्यादा से ज्यादा मैच खेलना चाहिए। फॉर्म कब हाथ से निकल जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं होती, इसलिए फिट रहते हुए बार–बार आराम की मांग करना हमेशा सही तर्क नहीं लगती।
शुभमन गिल की मौजूदा हालत को लेकर मेडिकल टीम का मत है कि उन्हें कम से कम 10 दिन के आराम की दरकार होगी। BCCI ने फिलहाल आधिकारिक तौर पर कोई अंतिम मेडिकल बुलेटिन जारी नहीं किया है, लेकिन टीम मैनेजमेंट की उम्मीद है कि वे 30 नवंबर से शुरू होने वाली साउथ अफ्रीका के खिलाफ ODI सीरीज तक फिट हो जाएंगे।
इसके तुरंत बाद T20I सीरीज भी खेली जानी है, जहां गिल की भूमिका और भी ज्यादा अहम होगी – एक टॉप–ऑर्डर बल्लेबाज के तौर पर और सीमित ओवरों की कप्तानी की जिम्मेदारियों के साथ इसी वजह से यह चोट केवल एक मैच का मसला नहीं, बल्कि अगले कुछ हफ्तों के शेड्यूल पर सीधा असर डालने वाली घटना बन गई है।
गिल की चोट ने एक बार फिर भारतीय क्रिकेट के सामने मूल प्रश्न रख दिया है – भारत अपने टॉप खिलाड़ियों के साथ कौन–सा मॉडल अपनाना चाहता है?
पहला मॉडल: IPL की आर्थिक ताकत और ब्रांड वैल्यू को सर्वोपरि रखते हुए, खिलाड़ियों से साल भर लगभग लगातार क्रिकेट खेलने की उम्मीद, और बीच–बीच में ‘वर्कलोड मैनेजमेंट’ के नाम पर राष्ट्रीय टीम से आराम।
दूसरा मॉडल (गंभीर का नजरिया): टीम इंडिया को हर चीज़ से ऊपर रखकर, पहले लीग क्रिकेट की प्राथमिकता घटाना, फिर वर्कलोड का सख्त और पारदर्शी मूल्यांकन करना और यह तय करना कि कौन खिलाड़ी वास्तव में आराम का हकदार है और कौन सिर्फ दबाव से बचना चाहता है।