विद्यार्थियों को फिटनेस कार्यक्रम जरूरी हो

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किसी भी देश की तरक्की व खुशहाली उस देश के नागरिकों की फिटनेस पर बहुत ज्यादा निर्भर करती है। फिटनेस मानव जीवन में एक लगातार प्रक्रिया है जो जन्म से मृत्यु तक चलती है। विद्यार्थी जीवन में फिटनेस की नींव जितनी होगी, मनुष्य जीवन में उतना ही फिट रहेगा। विद्यालय स्तर पर  बच्चों व किशोर विद्यार्थियों के लिए फिटनेस कार्यक्रम की बहुत ज्यादा जरूरत होती है। आज जब घर पर बच्चा नियमित न तो कोई घरेलू काम कर रहा है और न ही शिक्षा संस्थान के पास फिटनेस का भी कोई कार्यक्रम है, ऐसे में हमें मानव की वृद्धि व विकास की प्रक्रिया को ठीक से समझना होगा और फिर एक संतुलित फिटनेस कार्यक्रम लागू करना होगा। इस सबके लिए विद्यालय प्रशासन व अभिभावकों का जागरूक होना जरूरी है। फिटनेस के लिए खेल व शारीरिक क्रियाओं का ज्रिक होते ही आम जनमानस की यह धारणा होती है कि खिलाडिय़ों की बात हो रही है, मगर फिटनेस केवल खिलाड़ी को ही नहीं चाहिए होती है, देश की तरक्की के लिए हर नागरिक को फिट रहना जरूरी है। हर नागरिक को यदि उम्रभर स्वस्थ व खुशहाल रहना है तो  फिटनेस कार्यक्रम बहुत ही जरूरी है। खेल प्रशिक्षक व शारीरिक शिक्षक  को यह ज्ञान जहां बहुत ही जरूरी है, वहीं पर हर अभिभावक को भी मानव वृद्धि व विकास के सिद्धांतों को समझना अनिवार्य हो जाता है। आज विश्व ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा पद्धति व मनोरंजन के क्षेत्र में बहुत ज्यादा प्रगति कर ली है और इन्हें बेहतर बनाने के लिए निरंतर प्रयास हो रहे हैं। कौन देश उन्नत, सेहतमंद व खुशहाल है, इस बात का पता ओलंपिक की पदक तालिका से  चलता है जहां विकसित देश ही ऊपर होते हैं। विकसित देशों ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी व चिकित्सा के साथ-साथ खेल क्षेत्र में काफी प्रगति की है।  मानव की वृद्धि व विकास जानने के लिए उसके जन्म से लेकर अंत तक विभिन्न अवस्थाओं का अध्ययन बहुत जरूरी है। जन्म के पहले तीन महीनों तक शिशु बिल्कुल लाचार होता है। वह स्वयं हिल-डुल भी नहीं सकता है। फिर वह पलटना सीखता है। आठवें व नौवें महीनों तक वह सहायता से खड़ा होना और चलना सीखता है। शिशु अपने दूसरे व तीसरे वर्ष में चलना, दौडऩा, कूदना, चढऩा, खैंचना, धक्का देना व फैंकना काफी धीमी गति से प्रारंभिक स्तर पर सीख लेता है। यही समय है जब बच्चा बोलने व भाषा को समझने लगता है। बचपन के पहले चार से सात सालों में बच्चों में शारीरिक क्रियाओं को करने की प्रबल इच्छा होती है। साथी बच्चों के साथ सहभागिता सीखता है। पहले सीखी गई क्रियाओं में और सुधार आता है।
इसके अतिरिक्त कैचिंग, हापिंग व सकिपिंग आदि कोआर्डिनेशन वाली क्रियाओं को भी करने लग जाता है। बहुत सी शारीरिक क्रियाओं को करने की शुरुआत इस आयु से हो जाती है। जिम्नास्टिक व तैराकी जैसा खेल प्रशिक्षण इस उम्र से शुरू हो जाता है। इस अवस्था में बच्चे की सही शारीरिक संरचना व शारीरिक क्षमताओं को विकसित करते हुए सर्वांगीण विकास का ध्यान रखना जरूरी है। बचपन के मध्य भाग, जो सात से दस साल तक चलता है, इस समय बच्चे का शारीरिक व मानसिक विकास समान रूप से हो रहा होता है। समाज में क्या घटित हो रहा है, उसे बच्चा बहुत तेजी से सीखता है। इसलिए बच्चे को अच्छा स्कूल चाहिए होता है जो उसके शारीरिक व मानसिक विकास को सही गति दे सके। बच्चे की इस अवस्था में सट्रैंथ व स्पीड का विकास तेजी से होता है। बुनियादी इडोरैंस का विकास भी इस उम्र में तेजी से होता है। जब दस से बारह वर्ष तक की अवस्था तक बच्चा पहुंचता है तो उसका बचपन खत्म हो जाता है। इस अवस्था में बहुत हल्के स्तर पर मगर सुचारू रूप से लगातार खेलों का प्रशिक्षण शुरू कर देना चाहिए क्योंकि बच्चा पहले से अधिक ताकतवर हर शारीरिक क्षमता में हो गया होता है। इस उम्र में बच्चा शारीरिक क्रियाओं को बहुत तेजी से सीखता है। स्पीड व समन्वयक क्रियाओं का विकास बच्चे में बहुत तेजी से होता है। इस अवस्था में बच्चे का मानसिक विकास काफी हद तक हर चीज को समझने वाला हो जाता है। परिचर्चा व व्याख्यान से पहले तकनीक को समझ कर फिर आसानी से कार्यनिष्पादन करने वाला हो जाता है। इस उम्र से पहले जो लडक़े-लड़कियों के विकास में कोई फर्क नहीं था, अब लड़कियों का शारीरिक विकास लडक़ों के मुकाबले तेजी से होता है। बचपन खत्म होते ही किशोरावस्था शुरू हो जाती है। विकसित देशों में लड़कियों में 11 से 12 वर्ष व लडक़ों में 12 से 13 वर्ष की आयु में सैक्स मैच्योरटी शुरू हो जाती है। भारत में यह एक-दो वर्ष बाद आती है। शुरू से लेकर अंत तक किशोरावस्था अगले 6 से 7 वर्ष तक चलती है। किशोरावस्था में शारीरिक क्षमताओं व सलीके में पुनर्गठन होता है। शारीरिक क्षमताओं का तेजी से विकास होता है।
हां, शारीरिक योग्यताएं जो बचपन में तेजी से विकसित हो रही थीं, अब रफ्तार धीमी कर देती हैं और जो धीमी थी, वह किशोरावस्था में तेजी से विकसित होती हैं। शारीरिक विकास भी तेजी से होता है। लंबाई व वजन में काफी बढ़ जाते हैं। इससे सट्रैंथ में विशेषकर अधिकतम व विस्फोटक सट्रैंथ में काफी सुधार होता है। एनारोविक इडोरैंस में तेजी से विकास होता है। स्पीड योग्यता हालांकि धीमी हो गई होती है मगर एक्सपलोजिव सट्रैंथ व कदमों में हुई बढ़ौत्तरी के कारण स्परिंट में काफी सुधार देखने को मिलता है। इस अवस्था में शारीरिक लोच में कमी आती है, मगर प्रशिक्षण द्वारा उसे स्थिर  रखा जाता है। किशोरावस्था के अंत तक लड़कियां लडक़ों के मुकाबले अपने श्रेष्ठ प्रदर्शन  की ओर तेजी से बढ़ रही होती हैं, मगर लडक़ों में हो रहे हार्मोनल बदलाव के कारण लडक़े-लडक़ी के प्रदर्शन में काफी अंतर आ रहा होता है। लड़कियों की युवावस्था 17-18 वर्ष की आयु में शुरू हो जाती है, लडक़ों में यह एक-दो वर्ष बाद आती है। इस अवस्था तक आते-आते खिलाड़ी अपने-अपने खेल के लिए पूरी तरह तैयार हो गए होते हैं। यही वह समय है जहां से अधिकतर खेलों के लिए एशियाई व ओलंपिक खेलों की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। मानसिक व शारीरिक रूप से इस अवस्था में खिलाड़ी वयस्क हो जाता है। ये बातें ध्यान में रखकर फिटनेस कार्यक्रम बनाना चाहिए।