ईरान में सिस्टम के खिलाफ गुस्सा: क्या खामेनेई की पकड़ ढीली पड़ रही है?

हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि डॉलर के मुकाबले रियाल के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने की चर्चा है। बताया जा रहा है कि 1 डॉलर करीब 1.42 मिलियन रियाल के आसपास कारोबार कर रहा है।

ईरान की सड़कों पर बढ़ता जनआक्रोश
ईरान की सड़कों पर बढ़ता जनआक्रोश
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar01 Jan 2026 10:35 AM
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Iran Protest: ईरान इस वक्त करीब एक हफ्ते से आर्थिक बदहाली और राजनीतिक बेचैनी के दोहरे दबाव में सुलग रहा है। चिंगारी दिसंबर के आखिर में तेहरान के ग्रैंड बाजार से उठी जहां दुकानदारों की हड़ताल ने देखते ही देखते विरोध की लपटों को देश के कई शहरों तक फैला दिया। तेज़ी से गिरता रियाल, 42–50% की महंगाई, आयातित सामान की उछलती कीमतें और आम लोगों की घटती क्रय-शक्ति इस आक्रोश की मूल वजह बताई जा रही हैं। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि डॉलर के मुकाबले रियाल के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने की चर्चा हैबताया जा रहा है कि 1 डॉलर करीब 1.42 मिलियन रियाल के आसपास कारोबार कर रहा है।

छात्रों की एंट्री से आंदोलन को मिला नया तेवर

लेकिन अब यह आंदोलन सिर्फ महंगाई का विरोध नहीं रहा। सड़कों पर उठ रहे नारों में अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर सत्ता को चुनौती देने का स्वर भी साफ सुनाई दे रहा है सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई के खिलाफ नारे और कहीं-कहीं शाह समर्थक आवाजें भी सामने आई हैं। छात्रों की सक्रिय भागीदारी, फार्स प्रांत में सरकारी भवन पर हमले की खबरें और पुलिस द्वारा टीयर गैस के इस्तेमाल ने माहौल को और ज्यादा तनावपूर्ण बना दिया है। इसी बीच राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने प्रदर्शनकारियों की चिंताओं को स्वीकारते हुए सेंट्रल बैंक गवर्नर को हटाने और प्रतिनिधियों से बातचीत का संकेत दिया, जबकि प्रॉसीक्यूटर जनरल ने “असुरक्षा फैलाने” वालों पर कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दे दी। उधर, निर्वासित रेज़ा पहलवी का समर्थन और अमेरिका-इजरायल के शीर्ष नेताओं की टिप्पणियां इस संकट को अंतरराष्ट्रीय फोकस में ले आई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि 2022 के ‘Women, Life, Freedom’ आंदोलन के बाद यह ईरान में सबसे बड़ा उभार है और अब बड़ा सवाल यही है कि यह उबाल किस दिशा में मोड़ लेता है।

प्रदर्शन धीरे-धीरे ठंडे पड़ सकते हैं

फिलहाल सत्ता का रवैया पूरी तरह “ऑल-आउट क्रैकडाउन” वाला नहीं दिख रहा। राष्ट्रपति की बातचीत की पेशकश, सेंट्रल बैंक में बदलाव जैसे संकेत बताता है कि सरकार तनाव कम करने की कोशिश कर रही है। यदि रियाल में थोड़ी स्थिरता आती है और सब्सिडी/कर राहत या कीमतों पर कुछ नियंत्रण जैसे तात्कालिक कदम घोषित किए जाते हैं, तो विरोध कुछ सप्ताह में कमजोर पड़ सकता है। हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती भरोसे की कमी है। यदि प्रदर्शन “आर्थिक” से आगे बढ़कर सीधे सत्ता परिवर्तन या सुप्रीम लीडर के खिलाफ निर्णायक चुनौती में बदलते हैं, तो सुरक्षा तंत्र कठोर रुख अपना सकता है। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां, इंटरनेट पर नियंत्रण/ब्लैकआउट, और व्यापक सुरक्षा तैनाती जैसे कदम संभव हैं। ऐसे हालात में सरकार विदेशी हस्तक्षेप का नैरेटिव भी मजबूत कर सकती है जिससे तुरंत नियंत्रण तो हो सकता है, लेकिन लंबे समय में जनता का गुस्सा और गहरा हो सकता है।

आंशिक सुधारों का रास्ता

पेजेश्कियन की सुधारवादी छवि का इस्तेमाल कर सत्ता कुछ व्यावहारिक आर्थिक फैसले ले सकती हैतेल निर्यात को बढ़ाने की कोशिश, चीन-रूस के साथ व्यापार पर जोर, सब्सिडी/बजट में कुछ राहत, या 2026 के बजट में कर-भार कम करने जैसे संकेत। यदि मध्यम वर्ग और व्यापारियों को लगे कि राहत वास्तविक है, तो विरोध की तीव्रता घट सकती है और सरकार इसे “जनता की सुनवाई” के रूप में प्रस्तुत कर स्थिरता का दावा कर सकती है। मगर प्रतिबंधों और क्षेत्रीय तनाव के रहते बड़े और गहरे सुधार आसान नहीं होंगे।

आंदोलन का व्यापक फैलाव

अगर छात्र, मजदूर, व्यापारी और शहरी मध्यवर्ग एक साथ लंबे समय तक सड़क पर टिकते हैं, तो आंदोलन 1979 जैसी “मोमेंटम पॉलिटिक्स” का रूप ले सकता है। ऐसे में नेतृत्व संकट, सुरक्षा बलों में मतभेद, और प्रशासनिक मशीनरी में दरारें ये सब जोखिम बढ़ा सकते हैं। रेज़ा पहलवी जैसे निर्वासित चेहरों का समर्थन और विदेशी नेताओं की बयानबाजी आंदोलन को नैतिक/राजनीतिक ऊर्जा दे सकती है, पर यह सरकार को “बाहरी एजेंडा” का नैरेटिव चलाने का मौका भी देगी। यदि सुरक्षा तंत्र में विभाजन होता है, तो सत्ता के लिए चुनौती कई गुना बढ़ सकती है।

बाहरी हस्तक्षेप या क्षेत्रीय टकराव

यदि हालात बिगड़ते हैं, तो अमेरिका-इजरायल जैसे बाहरी खिलाड़ी ईरान के परमाणु/मिसाइल कार्यक्रम या सुरक्षा चिंताओं को आधार बनाकर दबाव बढ़ा सकते हैं । ऐसी स्थिति में सरकार “राष्ट्रीय एकता” और “विदेशी साजिश” का तर्क देकर प्रदर्शनों को दबाने की कोशिश करेगी, लेकिन बाहरी दबाव बढ़ने पर अर्थव्यवस्था और कमजोर हो सकती है जिससे अस्थिरता का चक्र लंबा चलने का खतरा रहेगा। Iran Protest

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रूस भारत को एक और अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम देगा, वायु सुरक्षा होगी अभेद्य

एस-350 वित्याज रूस द्वारा विकसित एक आधुनिक सर्फेस टू एयर मिसाइल (एसएएम) प्रणाली है। इसे खास तौर पर ऐसे खतरों से निपटने के लिए तैयार किया गया है जो कम और मध्यम ऊँचाई पर तेजी से हमला करते हैं।

s 350
एस-350 सिस्टम
locationभारत
userयोगेन्द्र नाथ झा
calendar31 Dec 2025 02:57 PM
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India-Russia Security : रूस ने भारत को एक बार फिर अपना आधुनिक मध्यम दूरी का एयर डिफेंस सिस्टम एस-350 वित्याज देने का प्रस्ताव रखा है। इस पेशकश की खास बात यह है कि इसमें तकनीक हस्तांतरण का विकल्प भी शामिल है, जिससे भारत में स्वदेशी उत्पादन की राह खुल सकती है।

एस-350 वित्याज क्या है?

एस-350 वित्याज रूस द्वारा विकसित एक आधुनिक सर्फेस टू एयर मिसाइल (एसएएम) प्रणाली है। इसे खास तौर पर ऐसे खतरों से निपटने के लिए तैयार किया गया है जो कम और मध्यम ऊँचाई पर तेजी से हमला करते हैं। यह सिस्टम रूस की बहु-स्तरीय वायु रक्षा रणनीति का हिस्सा है, जहाँ लंबी दूरी के लिए एस-400, मध्यम दूरी के लिए एस-350 और नजदीकी रक्षा के लिए छोटे सिस्टम एक साथ काम करते हैं।

एस-350 की प्रमुख खूबियाँ

* एक साथ कई हवाई लक्ष्यों को पहचानने और नष्ट करने की क्षमता

* फाइटर जेट, ड्रोन और क्रूज मिसाइल जैसे खतरों के खिलाफ प्रभावी

* आधुनिक रडार और तेज प्रतिक्रिया प्रणाली

* एस-400 की तुलना में कम लागत और आसान तैनाती

भारत के लिए इसका महत्व

भारत को दो सक्रिय सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, पाकिस्तान और चीन। 

पाकिस्तान के संदर्भ में कम ऊँचाई पर उड़ने वाले फाइटर जेट और क्रूज मिसाइलों द्वारा अचानक हमले कोएस-350 ऐसे खतरों को समय रहते रोकने में सक्षम है। दूसरी ओर चीन के संदर्भ में बड़ी संख्या में ड्रोन और आधुनिक लड़ाकू विमान सीमावर्ती इलाकों में तेज और लचीली वायु रक्षा की जरूरत के मुताबिक यहाँ एस-350 एक संतुलित और प्रभावी समाधान बन सकता है।

भारत की मौजूदा एयर डिफेंस प्रणाली में भूमिका

भारत पहले से ही आकाश मिसाइल सिस्टम, बाराक-8, एस-400 जैसी प्रणालियाँ इस्तेमाल कर रहा है। एस-350 इन सभी के बीच की खाली जगह को भरते हुए पूरी एयर डिफेंस चेन को और मजबूत कर सकता है। हालिया उच्च-स्तरीय वातार्ओं में अतिरिक्त एस-400 यूनिट और भविष्य के एस-500 सिस्टम पर भी चर्चा हुई है। हालाँकि, रूस फिलहाल एस-350 को सबसे तुरंत उपलब्ध और व्यावहारिक विकल्प मान रहा है। यह सिस्टम भारत की वायु सुरक्षा क्षमता को नया स्तर दे सकता है। दो-मोर्चों पर रक्षा को मजबूत करेगा

और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के कारण आत्मनिर्भर भारत की दिशा में सहायक होगा।

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एक दुश्मन, दो राहें: यमन युद्ध में सऊदी-UAE की दोस्ती कैसे टूटी?

वहीं UAE ने हथियार भेजने के आरोप से इनकार करते हुए इसे “सिर्फ वाहनों की आवाजाही” बताया और तनाव बढ़ने के बीच अपनी फोर्सेज वापस बुलाने की बात भी कही। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है जब दोनों देश सुन्नी हैं, दोनों ने मिलकर हूतियों के खिलाफ जंग लड़ी, तो फिर किसी तीसरे देश की जमीन पर आमने-सामने कैसे हो गए?

मध्य-पूर्व की दोस्ती में दरार की नई तस्वीर
मध्य-पूर्व की दोस्ती में दरार की नई तस्वीर
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar31 Dec 2025 10:37 AM
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Yemen War Saudi UAE Conflict : यमन की धरती पर एक बार फिर भू-राजनीति की परतें खुल गई हैं। मुकल्ला (Mukalla) बंदरगाह शहर पर सऊदी अरब के हवाई हमले ने मध्य-पूर्व की उस जटिल तस्वीर को सामने ला दिया है, जिसमें दोस्त और दुश्मन की रेखाएं वक्त के साथ बदलती रहती हैं। सऊदी अरब का दावा है कि मुकल्ला में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) समर्थित अलगाववादी गुटों के लिए हथियारों की खेप पहुंची थी, जिसे रोकने के लिए कार्रवाई की गई। वहीं UAE ने हथियार भेजने के आरोप से इनकार करते हुए इसे “सिर्फ वाहनों की आवाजाही” बताया और तनाव बढ़ने के बीच अपनी फोर्सेज वापस बुलाने की बात भी कही। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है जब दोनों देश सुन्नी हैं, दोनों ने मिलकर हूतियों के खिलाफ जंग लड़ी, तो फिर किसी तीसरे देश की जमीन पर आमने-सामने कैसे हो गए?

पहले यमन को समझिए

यमन अरब दुनिया के सबसे गरीब मुल्कों में भले गिना जाता हो, लेकिन उसकी लोकेशन उसे ‘गेम-चेंजर’ बना देती है। लाल सागर और अरब सागर को जोड़ने वाले समुद्री गलियारों के करीब होने की वजह से यहां से गुजरने वाला रास्ता वैश्विक कारोबार की धड़कन माना जाता है। यही कारण है कि यमन सिर्फ एक देश नहीं रहा यह क्षेत्रीय ताकतों की रणनीति, सुरक्षा और वर्चस्व की जंग का फ्रंटलाइन बन चुका है। आज की हकीकत यह है कि यमन जमीन पर दो अलग-अलग सत्ता-परिधियों में बंटा दिखता है। उत्तर यमन (राजधानी सना समेत) पर हूतियों का प्रभाव है, जबकि दक्षिणी इलाकों में कई स्थानीय गुट सक्रिय हैं जिनमें अलगाववादी ताकतें भी शामिल हैं। हूती न सिर्फ यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के लिए चुनौती हैं, बल्कि सऊदी अरब के लिए भी सीधी सुरक्षा चिंता बन गए हैं। वजह साफ है हूतियों को ईरान का समर्थन मिलना सऊदी को यह संदेश देता है कि यमन में हूतियों की मजबूती के साथ ईरान की परछाईं सऊदी सरहदों के और करीब आती जा रही है। इसी डर और रणनीतिक दबाव के बीच 2015 में सऊदी अरब ने यमन में सैन्य अभियान छेड़ा घोषणा यह थी कि “वैध सरकार” को वापस स्थापित किया जाएगा, लेकिन जंग ने धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र की राजनीति को और उलझा दिया।

एक मोर्चा, एक दुश्मन… फिर दरार कैसे पड़ी?

यमन की जंग जब शुरू हुई, तब UAE सऊदी अरब के कंधे से कंधा मिलाकर मैदान में उतरा था। दोनों की रणनीति साफ थी—हूतियों की बढ़ती ताकत पर लगाम लगाना और मान्यता प्राप्त सरकार के ढांचे को दोबारा खड़ा करना। शुरुआती वर्षों में यह गठबंधन एक ही धुन पर चलता दिखा; एक साझा दुश्मन, एक साझा मोर्चा और एक जैसी भाषा। लेकिन युद्ध जैसे-जैसे लंबा और जटिल होता गया, वैसे-वैसे इस “दोस्ती” के भीतर हितों की खामोश खींचतान भी बढ़ने लगी। जमीन पर हालात बदले, प्राथमिकताएं बदलीं और लक्ष्य भी। नतीजा यह हुआ कि जो दो देश कल तक एक ही लड़ाई लड़ रहे थे, वे धीरे-धीरे एक ही युद्ध में दो अलग एजेंडे लेकर आगे बढ़ने लगे और यही दूरी आगे चलकर टकराव की वजह बन गई।

क्यों UAE की नजरें दक्षिण यमन पर टिक गईं?

वक्त गुजरने के साथ UAE ने यमन को सिर्फ युद्ध के मैदान के तौर पर नहीं, बल्कि रणनीतिक निवेश की तरह देखना शुरू किया। अब उसकी सोच यह बन गई कि पूरे यमन पर नियंत्रण न तो व्यावहारिक है और न ही फायदेमंद, लेकिन दक्षिण यमन ऐसा इलाका है जहां पकड़ मजबूत कर लंबे समय का लाभ साधा जा सकता है। वजह भी साफ थी यहीं बड़े बंदरगाह, ऊर्जा और तेल से जुड़ी संभावनाएं और अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्तों पर प्रभाव मौजूद है। इसी रणनीतिक गणित के तहत UAE का झुकाव धीरे-धीरे STC (सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल) की ओर बढ़ा। STC को दक्षिण यमन की एक ताकतवर अलगाववादी शक्ति माना जाता है, जो यमन के विभाजन और दक्षिण के लिए अलग राजनीतिक ढांचे की मांग करता रहा है। अंतरराष्ट्रीय हलकों में यह चर्चा तेज हुई कि UAE ने STC को सिर्फ राजनीतिक समर्थन ही नहीं, बल्कि संसाधन, प्रशिक्षण और जमीनी मदद भी मुहैया कराई। यहीं से यमन की लड़ाई ने नया मोड़ लिया जहां युद्ध सिर्फ हूतियों के खिलाफ नहीं रहा, बल्कि भविष्य के यमन की तस्वीर को लेकर टकराव का रूप लेने लगा।

सऊदी की आपत्ति

यहीं से सऊदी अरब की असल बेचैनी शुरू होती है। रियाद की प्राथमिकता किसी एक मोर्चे पर जीत भर नहीं, बल्कि पूरे यमन को एक इकाई के रूप में टिकाए रखना है। सऊदी नहीं चाहता कि यमन का नक्शा टुकड़ों में बंटे, क्योंकि ऐसा होते ही उसकी सीमा सुरक्षा पर सीधा दबाव बढ़ेगा और दक्षिण में अगर कोई नया “दक्षिणी राज्य” उभरता है तो वह भविष्य में किस खेमे में जाएगा यह पूरी तरह अनिश्चित रहेगा। सऊदी की नजर में यह स्थिति एक नए फ्रंट की शुरुआत भी बन सकती है, जहां अस्थिरता स्थायी चुनौती बन जाए। इसी वजह से सऊदी “एकीकृत यमन” के एजेंडे पर डटा रहा, जबकि UAE की रणनीति “दक्षिण-केंद्रित” नजर आती रही और यहीं से गठबंधन में दरार गहरी हुई दुश्मन दोनों का एक था, लेकिन युद्ध के बीच मंजिलें अलग हो गईं।

पर्दे के पीछे की खींचतान हुई सार्वजनिक

मुकल्ला में हुई बमबारी के बाद परदे के पीछे चल रही यह रस्साकशी अचानक खुली बहस में बदल गई। सऊदी अरब की आशंका है कि UAE जिन स्थानीय गुटों को ताकत दे रहा है, वही जमीन पर रियाद की रणनीति को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं और यमन में “एकीकृत सत्ता” की उसकी योजना को कमजोर कर रहे हैं। दूसरी तरफ UAE ने हथियारों की खेप भेजने के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए अपना अलग नैरेटिव पेश किया। इसी तनातनी के बीच जब UAE ने फोर्सेज वापस बुलाने का संकेत दिया, तो यह महज एक सैन्य फैसला नहीं लगा बल्कि गठबंधन के भीतर बढ़ती दरार का सबसे बड़ा संकेत माना गया। संदेश साफ था: यमन की जंग में अब दोनों की साझेदारी उतनी मजबूत नहीं रही, जितनी शुरुआती दौर में दिखती थी।

इस पूरी कहानी की बैकग्राउंड स्क्रिप्ट

यमन की लड़ाई को अगर सिर्फ “यमन का गृहयुद्ध” मानकर देखा जाए, तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी। असल में यह जंग मध्य-पूर्व की सबसे बड़ी राइवलरी सऊदी अरब बनाम ईरानकी परछाईं में लड़ी जा रही है। सऊदी अरब खुद को सुन्नी दुनिया की अगुवाई करने वाली ताकत के रूप में देखता है, जबकि ईरान शिया प्रभाव का केंद्रीय स्तंभ माना जाता है। मगर टकराव की जड़ें केवल मजहब तक सीमित नहीं हैं यह क्षेत्रीय वर्चस्व, रणनीतिक नियंत्रण और प्रभाव-क्षेत्र की लड़ाई है। रियाद की चिंता यह है कि ईरान उसके आसपास अपने समर्थक नेटवर्क को मजबूत कर सुरक्षा घेरा बना रहा है, जबकि तेहरान की रणनीति यह रही है कि मध्य-पूर्व में अपने असर को बढ़ाकर राजनीतिक और सामरिक दबाव कायम रखा जाए। यही वजह है कि यमन का मोर्चा दोनों के लिए सिर्फ एक जंग नहीं, बल्कि पूरे इलाके की ताकत-संतुलन की लड़ाई बन गया है।

ईरान का ‘प्रॉक्सी मॉडल

ईरान अक्सर सीधे मैदान में उतरने के बजाय स्थानीय समूहों के सहारे प्रभाव बढ़ाता है। इसी रणनीति को “प्रॉक्सी वॉर” कहा जाता है मतलब, अपने हित दूसरे के कंधे पर रखकर साधना। उदाहरण के तौर पर लेबनान में हिजबुल्लाह, इराक में शिया मिलिशिया और यमन में हूती। सऊदी की बड़ी चिंता यही है कि यमन में हूतियों का मजबूत होना उसे रणनीतिक तौर पर दबाव में रख सकता है। इसलिए यमन, सऊदी के लिए सिर्फ पड़ोसी देश नहीं सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन का बड़ा मोर्चा है। Yemen War Saudi UAE Conflict

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