राजनीति की वो शख्सियत जो शब्दों से ही जीत लेती थी दिल
भारत
चेतना मंच
28 Nov 2025 05:02 PM
आज भारतीय राजनीति की एक तेजस्वी, संवेदनशील और दूरदर्शी नेता सुषमा स्वराज (Sushma Swaraj) की पुण्यतिथि है। 6 अगस्त 2019 को सुषमा स्वराज का निधन हुआ था। देश सुषमा स्वराज को आज भी उतने ही सम्मान, स्नेह और गर्व से याद करता है। सुषमा स्वराज न केवल एक प्रखर वक्ता थीं बल्कि एक ऐसी जननेता भी थी जिनकी पहुंच सत्ता के गलियारों से निकलकर आम आदमी के दिल तक थी। Sushma Swaraj
जरूरतमंदों के लिए उम्मीद की किरण
विदेश मंत्री रहते हुए उन्होंने जो करिश्मा किया वह भारतीय राजनीति में दुर्लभ है। विदेशों में फंसे भारतीय हों या मेडिकल वीजा की अर्जियां सुषमा स्वराज हर जरूरतमंद के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आईं। ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को उन्होंने एक मदद की सीधी लाइन बना दिया जो एक आम भारतीय को सरकार से सीधे जोड़ता था।
छात्र राजनीति से संसद तक का सफर
14 फरवरी 1952 को हरियाणा के अंबाला में जन्मी सुषमा स्वराज का राजनीतिक जीवन बेहद युवा अवस्था में शुरू हुआ। 1970 के दशक में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से राजनीति में प्रवेश करने के बाद वे 1977 में मात्र 25 साल की उम्र में हरियाणा की कैबिनेट मंत्री बनीं। यह उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाला एक बड़ा मोड़ था।
1980 में भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने पार्टी को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाई। 1998 में वे दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, भले ही उनका कार्यकाल केवल 52 दिन का रहा, लेकिन उन्होंने साफ-सुथरी और सशक्त प्रशासनिक छवि के साथ राजनीति में अपनी जगह और पक्की की।
संसद की शेरनी और शब्दों की महारथी
सुषमा स्वराज को भारतीय संसद की शेरनी भी कहा जाता था। जब वे बोलती थीं तो सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों चुप होकर उन्हें सुनते थे। भाषण कला, तार्किकता और व्यंग्य तीनों का ऐसा संतुलन शायद ही किसी नेता में देखने को मिला हो। 2014 में जब नरेंद्र मोदी सरकार बनी तो उन्हें विदेश मंत्री की जिम्मेदारी दी गई। यहां से उन्होंने एक ऐसा इतिहास रचा जिसने विदेश मंत्रालय को आम आदमी का मंत्रालय बना दिया। उन्होंने बताया कि विदेश नीति सिर्फ बड़ी-बड़ी मीटिंगों और बैठकों तक सीमित नहीं है यह उन लोगों की भी चिंता करती है जो विदेशों में मुश्किल में फंसे होते हैं।
पाकिस्तान को दिया करारा जवाब
2016 और 2017 की संयुक्त राष्ट्र महासभा में सुषमा स्वराज के भाषणों ने न केवल पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर घेरा बल्कि दुनिया को भारत की स्पष्ट विदेश नीति का संदेश भी दिया। उनके शब्दों की गूंज विश्व मंचों तक सुनाई दी। दुर्भाग्यवश 2019 में स्वास्थ्य कारणों से सुषमा स्वराज का निधन हो गया। उस समय पूरे देश ने उन्हें नम आंखों से विदाई दी। सोशल मीडिया से लेकर संसद तक हर जगह बस एक ही बात थी हमने एक सच्ची जननेता को खो दिया।
आज भी जब कोई भारतीय विदेश में संकट में होता है तो सुषमा स्वराज की यादें खुद-ब-खुद जहन में ताजा हो जाती हैं। उन्होंने राजनीति को सेवा का जरिया बनाया और हर उस व्यक्ति तक पहुंचीं, जिसे जरूरत थी। सुषमा स्वराज सिर्फ एक नेता नहीं थीं वे भरोसे का नाम थीं और यही भरोसा उन्हें भारत की राजनीति में हमेशा जीवित रखेगा।