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लखनऊ स्थित किंग जार्ज मेडिकल कालेज (केजीएमयू) में करोड़ों रुपये के दवा घोटाले का खुलासा होने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

UP News : लखनऊ स्थित किंग जार्ज मेडिकल कालेज (केजीएमयू) में करोड़ों रुपये के दवा घोटाले का खुलासा होने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि गरीब और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए खरीदी गई महंगी दवाओं का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग किया गया। जांच एजेंसियों को संदेह है कि कैंसर, किडनी और अन्य असाध्य रोगों के मरीजों के नाम पर दवाएं निकाली गईं और बाद में उन्हें बाजार में बेच दिया गया।
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मामले का खुलासा तब हुआ जब प्रशासन ने देखा कि असाध्य योजना के तहत दवाओं की खरीद में असामान्य बढ़ोतरी हो रही है। जहां पहले हर महीने लगभग 10 लाख रुपये की दवाएं खरीदी जाती थीं, वहीं 2026 की शुरुआत में यह खर्च बढ़कर 40 से 45 लाख रुपये प्रतिमाह तक पहुंच गया। इस असामान्य वृद्धि ने अधिकारियों का ध्यान खींचा और आंतरिक जांच शुरू की गई।
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पांच सदस्यीय जांच समिति ने रिकॉर्ड, मरीजों की फाइलें, दवा वितरण रजिस्टर और भुगतान संबंधी दस्तावेजों की जांच की। शुरुआती रिपोर्ट में करीब 2.5 करोड़ रुपये की दवाओं की खरीद और उपयोग में गंभीर अनियमितताओं की पुष्टि हुई है। जांचकतार्ओं को ऐसे कई मामले मिले, जिनमें दवाओं के उपयोग का रिकॉर्ड वास्तविक चिकित्सा जरूरतों से मेल नहीं खाता था।
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जांच के दौरान करीब 40 ऐसे मरीजों की पहचान हुई, जिनके नाम पर बार-बार अस्पताल में भर्ती दिखाया गया। रिकॉर्ड में उन्हें कई बार उपचार प्राप्त करते हुए दर्शाया गया, जबकि वास्तविक परिस्थितियां अलग थीं। अधिकारियों को आशंका है कि मरीजों की यूनिक हेल्थ आईडी (यूएचआईडी) और अन्य दस्तावेजों का इस्तेमाल कर दवाओं की फर्जी मांग तैयार की गई।
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जांच रिपोर्ट के अनुसार, कथित घोटाला कई चरणों में संचालित किया जा रहा था। पहले फर्जी ओपीडी पर्चियां तैयार की जाती थीं। इसके बाद महंगी दवाओं का प्रिस्क्रिप्शन बनाया जाता और दवा की मांग संबंधित कार्यालय भेजी जाती। दवाएं आने के बाद उन्हें रिकॉर्ड में मरीजों को जारी दिखाया जाता, लेकिन वास्तविक मरीजों तक वे नहीं पहुंचती थीं। संदेह है कि बाद में इन दवाओं को अस्पताल के बाहर बेच दिया जाता था।
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जांच में कुछ ऐसे मामले भी सामने आए जहां एक इंजेक्शन, जिसे सामान्य तौर पर छह महीने में एक बार दिया जाना चाहिए, उसे रिकॉर्ड में एक ही महीने में चार-पांच बार उपयोग दिखाया गया। इन इंजेक्शनों की कीमत 8,000 से 10,000 रुपये तक बताई गई है। इससे जांच टीम को दवा वितरण प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर हेराफेरी का संदेह हुआ।
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प्रारंभिक रिपोर्ट सामने आते ही कुलपति सोनिया नित्यानन्द ने सख्त कदम उठाए। यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर अपुल गोयल को विभागाध्यक्ष की जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया गया। प्रशासन का कहना है कि विभागीय निगरानी में गंभीर लापरवाही के चलते यह कार्रवाई की गई है। घोटाले में कथित संलिप्तता पाए जाने पर तीन आउटसोर्स कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दिया गया है। वहीं एक नियमित फार्मासिस्ट को निलंबित कर उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने दोषियों से सरकारी धन की वसूली की कार्रवाई भी शुरू कर दी है।
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केजीएमयू प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि मामले में आपराधिक मुकदमा दर्ज कराया जाएगा। जांच समिति ने संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की सिफारिश की है। अब पुलिस और अन्य एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि दवाओं का वास्तविक लाभ किसे मिला और उन्हें अस्पताल से बाहर किस नेटवर्क के जरिए बेचा गया। यह मामला केवल आर्थिक अनियमितता तक सीमित नहीं है। यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन गरीब मरीजों को हुआ है जिन्हें सरकारी योजना के तहत मुफ्त और जीवनरक्षक दवाएं मिलनी थीं। कैंसर और किडनी जैसी गंभीर बीमारियों के मरीजों के नाम पर कथित फजीर्वाड़ा स्वास्थ्य तंत्र की निगरानी व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़े करता है।
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