UP assembly elections : पांच राज्यों में विधानसभा की सरगर्मी तेजी से चल रही है। (UP assembly elections) हाल यह है कि कड़ाके की ठंड और रिमझिम बारिश की बौछारें पड़ने पर भी चुनावी गतिविधियों पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। एक समय था जब उत्तर प्रदेश में में निर्दलीय प्रत्याशियों का काफी बोलबाला रहता था। विधानसभा में निर्दलीयों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। आपको बता दें कि 1989 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में 40 निर्दलीय जीतकर आए थे, वहीं 2017 में इनकी संख्या घटकर केवल तीन तक पहुंच गई है। निर्दलीय विधायकों की विधानसभा में लगातार कमी आने के पीछे कई वजहें हैं। सबसे बड़ी वजह यूपी की राजनीति में जातीय समीकरण है। इसकी वजह से अब जनता निर्दलीय उम्मीदवारों को तवज्जो नहीं दे रही है।
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UP assembly elections आखिर अब क्यों नहीं रहा निर्दलीयों का बोलबाला[/caption]
आजादी के बाद शुरुवाती तीन चार विधानसभा चुनावों तक ऐसा देखने को मिल रहा था कि दलीय प्रत्याशियों के खिलाफ यदि तगड़ा निर्दलीय होता था तो जनता को उसका समर्थन भी मिलता था। कहने का मतलब ये है कि पहले चेहरा मायने रखता था राजनीतिक दल नहीं। हांलाकि पहले राजनीतिक दलों की संख्या भी आज के मुकाबले काफी कम थी। निर्दलीय उम्मीदवारों में राजा, जमीदार या समाजसेवा से जुड़े लोग होते थे। लेकिन मौजूदा समय में जातीय समीकरण के आधार पर राजनीतिक दलों की संख्या भी काफी बढ़ गई है। इसलिए निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या में काफी कमी आई है।
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पिछले चुनावों के आंकड़ों पर गौर करें तो निर्दलीय प्रत्याशियों की संख्या कम होने के बाद भी जितने वालों की संख्या दहाई के अंक में ही होती थी। 1989 में 40 निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। 1957 में 39 निर्दलीय जीते थे। कई बार निर्दलियों की संख्या 20 से ज्यादा हुआ करती थी। लेकिन 2002 के बाद निर्दलीय विधायकों कि संख्या लगातार घटती चली गई। 2002 के विधानसभा चुनाव में 16 निर्दलीय विधायक ही चुने गए थे। इसके बाद 2007 के चुनाव में 9, 2012 के चुनाव में 6 और 2017 के चुनाव में केवल 3 उम्मीदवार ही जीतकर विधानसभा पहुंच पाए। उत्तर प्रदेश चुनाव में निर्दलियों का दखल इस कदर था कि 60 के दशक में उन्होंने एकबार उत्तर प्रदेश की सरकार गिरा दी थी। राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि 1967 में कांग्रेस को 425 सीटों में 199 सीट मिली थी। जनसंघ को 98 सीटें मिली थी जबकि 37 निर्दलीय जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। इस परिस्थिति में निर्दलियों की भुला अहम हो गई थी। कांग्रेस विधायक दल के नेता चंद्रभानु गुप्ता चुने गए थे। उन्होंने 223 विधायकों के समर्थन का पत्र राज्यपाल को सौंपा था। गुप्त ने सरकार तो बना ली लेकिन कांग्रेसी विधायकों के टूटने और निर्दलियों के विपक्ष से हाथ मिलाने की वजह से 11 दिन में ही सरकार गिर गई थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पहले जातीय समीकरण उतना हावी नहीं था। लोग सेवाभाव से प्रेरित होकर राजनीति में आते थे और पूरे पांच साल तक अपने क्षेत्र में सक्रिय रहते थे। अस्सी के दशक से पहले स्वतंत्रता आंदोलन का भी असर था। उस समय ऐसा देखा जाता था कि लोग सेवाभाव से लगे रहते थे। उन्हें पैसा, पॉवर और पोजीशन से कोई मतलब नहीं होता था। आज की तुलना में राजनीतिक दल भी कम थे जिससे इतनी चुनौतियां नहीं थीं। जो लोग सक्रिय होते थे वो चुनाव जीत जाते थे। जनता भी राजनीतिक दलों के बजाए योग्य निर्दलीय उम्मीदवारों पर भरोसा करती थी। यही कारण है कि अस्सी के दशक के बाद एक तरफ जहां राजनीतिक दलों की संख्या में वृद्धि हुई वहीं दूसरी ओर जातीय समीकरण हावी होता चला गया। अब सबकुछ जातीय समीकरण पर ही तय होता है और चुनाव भी खर्चीला हो गया। यही वजह है कि अब निर्दलियों की संख्या में कमी आ रही है।