अकबर की चोट सबसे ज्यादा उन पर पड़ती थी जो अपनी मिट्टी से दूरी बनाकर नकली ‘मॉडर्न’ होने को तरक्की समझते थे। उनकी नजर में यह सिर्फ फैशन नहीं, पहचान का संकट था। यही कारण है कि भारतीय समाज ने उनकी आवाज़ को “लिसानु’ल-अस्र” यानी ‘अपने युग का प्रतिनिधि कवि’ कहकर सम्मान दिया।

Akbar Allahabadi : सैयद अकबर हुसैन (16 नवंबर 1846–9 सितंबर 1921), जिन्हें साहित्य जगत “अकबर इलाहाबादी” के नाम से याद करता है, उर्दू शायरी के उन बेजोड़ व्यंग्यकारों में हैं जिनकी मुस्कान के पीछे समाज का आईना छिपा रहता है। उन्होंने हँसी को हथियार बनाकर अपने दौर की सबसे बड़ी बेचैनी पश्चिमी सभ्यता के बढ़ते प्रभाव से उपजी सांस्कृतिक दुविधा को बेधड़क उजागर किया। अकबर की चोट सबसे ज्यादा उन पर पड़ती थी जो अपनी मिट्टी से दूरी बनाकर नकली ‘मॉडर्न’ होने को तरक्की समझते थे। उनकी नजर में यह सिर्फ फैशन नहीं, पहचान का संकट था। यही कारण है कि भारतीय समाज ने उनकी आवाज़ को “लिसानु’ल-अस्र” यानी ‘अपने युग का प्रतिनिधि कवि’ कहकर सम्मान दिया।
अकबर इलाहाबादी का जन्म इलाहाबाद जिले के बारा कस्बे में हुआ। उनका परिवार सैयद वंश से था, जिनके बारे में माना जाता है कि वे मूल रूप से फारस से भारत आए और सैनिक परंपरा से जुड़े रहे। उनके दादा सैयद फज़ल-ए-मोहम्मद शिया विचारधारा के थे, लेकिन परिवार की अगली पीढ़ी में मतांतर दिखाई देता है उनके तीनों पुत्र वसील अली, वारिस अली और तफज्जुल हुसैन सुन्नी थे। अकबर के पिता मौलवी तफज्जुल हुसैन, अपने भाई वारिस अली के अधीन नायब तहसीलदार के रूप में कार्यरत थे, जबकि वारिस अली तहसीलदार के पद पर थे। उनकी माता बिहार के गया जिले के जगदीशपुर गांव के एक जमींदार परिवार से ताल्लुक रखती थीं।
1 - दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ,
बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ।

2 -अकबर दबे नहीं किसी सुल्ताँ की फ़ौज से,
लेकिन शहीद हो गए बीवी की नौज से।

3 - ग़ज़ब है वो ज़िद्दी बड़े हो गए,
मैं लेटा तो उठ के खड़े हो गए। 
4 - मज़हबी बहस मैं ने की ही नहीं।
फ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं। 
5 - खींचो न कमानों को न तलवार निकालो,
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो। 