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प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर रंगों के जरिए बड़ा संदेश देने की कोशिश शुरू हो गई है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव अब पीडीए 2.0 रणनीति के साथ मैदान में उतरते दिख रहे हैं।

UP News : उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर रंगों के जरिए बड़ा संदेश देने की कोशिश शुरू हो गई है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव अब पीडीए 2.0 रणनीति के साथ मैदान में उतरते दिख रहे हैं। लाल टोपी के साथ नीला गमछा पहनकर उन्होंने साफ संकेत दिया है कि पार्टी अब पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग को एक मंच पर लाने की नई रणनीति पर काम कर रही है।
अंबेडकर जयंती के मौके पर लखनऊ के हजरतगंज में बाबा साहेब की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते समय अखिलेश यादव का लुक चर्चा का विषय बन गया। लाल टोपी के साथ नीला गमछा सिर्फ एक परिधान नहीं, बल्कि एक सियासी संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। सुल्तानपुर दौरे में भी यही कॉम्बिनेशन दोहराया गया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि यह कोई संयोग नहीं बल्कि रणनीति का हिस्सा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि समाजवादी पार्टी अब बहुजन समाज पार्टी के पारंपरिक दलित वोट बैंक में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। नीला रंग दलित राजनीति का प्रतीक माना जाता है, और इसी प्रतीक को अपनाकर सपा एक नया संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह दलित समाज के हितों की नई आवाज बन सकती है।
लोकसभा चुनाव 2024 में समाजवादी पार्टी को दलित वोटों का आंशिक समर्थन मिला था। अब पार्टी इस समर्थन को स्थायी आधार में बदलना चाहती है। पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉमूर्ला को और मजबूत कर 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सपा अपनी जमीन तैयार कर रही है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, यह रणनीति आने वाले समय में और आक्रामक रूप ले सकती है।
अंबेडकर जयंती के मौके पर अखिलेश यादव ने भाजपा पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार में दलितों के साथ अन्याय बढ़ा है और संविधान के मूल्यों को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। साथ ही उन्होंने कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग भी दोहराई और सामाजिक न्याय की लड़ाई जारी रखने की बात कही। भारतीय राजनीति में प्रतीकों और रंगों की अहम भूमिका रही है। लाल टोपी जहां समाजवादी विचारधारा का प्रतीक है, वहीं नीला रंग दलित अस्मिता से जुड़ा हुआ है। इन दोनों का मेल पीडीए 2.0 के रूप में एक नए सामाजिक समीकरण को जन्म दे सकता है, जिसका असर आने वाले चुनावों में साफ दिखाई दे सकता है।
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