उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सरकार समर्थक मीडिया पर जमकर हमला बोला है। X प्लेटफार्म पर अपनी पोस्ट में उन्होंने "दानाजीवी मीडिया हाउस" शब्द का प्रयोग करते हुए कुछ मीडिया हाउसों की आलोचना की। अखिलेश यादव ने परिवारवाद, राजनीति और पत्रकारिता में नैतिकता पर भी जोर दिया।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से बड़ी खबर आई है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से आई यह खबर समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से जुड़ी हुई है। उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री व सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने सोशल मीडिया के X प्लेटफार्म पर एक लम्बी पोस्ट लिखी है। उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने X पर लिखी अपनी पोस्ट में सरकार के पक्षधर मीडिया पर बड़ा हमला बोला है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कुछ मीडिया हाउसों के द्वारा परिवार तथा परिवारवाद की नई व्याख्या करने के मुद्दे पर मीडिया हाउसों को घेरा है।
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सरकार के पक्षधर मीडिया को नया नाम दिया है। अभी तक सरकार के पक्षधर मीडिया को ‘‘गोदी मीडिया” कहा जाता था। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ‘‘गोदी मीडिया” को नया नाम देते हुए ‘‘दानाजीवी मीडिया हाउस” कहा है। उनका इशारा यह है कि कुछ मीडिया हाउस सरकार के दाने पर जीवित हैं। ऐसे मीडिया हाउस को ‘‘दानाजीवी मीडिया हाउस” ही कहा जा सकता है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने X पर लिखी गई पोस्ट में बार-बार ‘‘दानाजीवी मीडिया हाउस” शब्द का प्रयोग किया है।
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने X पर जो पोस्ट लिखीहै उसे हम यहां ज्यों की त्यों प्रकाशित कर रहे हैं। अखिलेश यादव ने लिख है कि, प्रिय परिवारवालों, कुछ मीडिया हाउस हमारे महाकाव्यों की बातों और संदर्भों को गलत तरीके से प्रस्तुत करके उनका अपमान कर रहे हैं और इन महाकाव्यों को माननेवालों की धार्मिक भावनाओं को आहत भी कर रहे हैं। ये राजनीतिक ‘दानाजीवी मीडिया हाउस’ बार-बार परिवारवाद के नाम पर जो एजेंडा चला रहे हैं क्या वो ये नहीं जानते हैं कि हमारे दोनों महाकाव्यों के पीछे की सांकेतिक महाकथा का आधार परिवार रहा है। दरअसल सत्ता-भक्ति में लीन ये लोग जाने-अनजाने में ‘परिवार’ के नाम पर हमारी पौराणिक महागाथाओं का मखौल उड़ा रहे हैं और उनकी प्रतीकात्मक कहानियों को बदनाम कर रहे हैं। ऐसी बातों से परिवार कमजोर होते हैं और महाकाव्यों का अपमान होता है। सच तो ये है कि ये जिन स्वार्थी लोगों के लिए काम कर रहे हैं, वो स्वयं परिवार और संबंधों को कोई महत्व नहीं देते हैं। ये ‘मीडिया हाउस’ उनके परिवारों की कहानियां छापने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाते हैं? उनके उपेक्षित छोड़ दिये गये घरवालों के बारे में समाचार प्रकाशित क्यों नहीं करते हैं?
जो लोग राजनीति को पैसा कमाने की मशीन समझते हैं, उनके मन के अंदर चोर बैठा होता है, इसीलिए वो राजनीति को खराब मानकर अपने परिवार को राजनीति में सामने से नहीं पिछले दरवाजे से लेकर आते हैं। जो लोग राजनीति के प्रति सकारात्मक सोच रखते हैं और उसे जन सेवा का माध्यम मानते हैं वो ही ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की भलाई के लक्ष्य से प्रेरित होकर अपने परिवार को संघर्ष के लिए समर्पित कर देते हैं। ये परिवारवाद नहीं, बलिदानवाद होता है क्योंकि उनके परिवारवालों को भी अहंकारी सत्ताओं और वर्चस्ववादी लोगों से लड़ना पड़ता है, हर तकलीफ का सामना करना पड़ता है। जबकि इसके विपरीत सुविधाभोगी लोग अपने परिवार को ऐशो-आराम के कामों मे लगाकर, उनके जरिए अपने लिए जायदाद-दौलत इकट्ठा करने में लग जाते हैं। अगर परिवार इतना ही बुरा है तो भाजपाई और उनके अपरिवारवादी संगी-साथी व दानाजीवी मीडिया हाउस घोषित कर दें कि :
- वो आज ही उन सब लोगों को अपनी पार्टी और संगठन से निकाल देंगे, जिनके माता-पिता या परिवार का अन्य कोई सदस्य कभी भी राजनीति में रहा है।
- उन सभी को छोटे पद से लेकर मुख्यमंत्री जैसे बड़े पद तक से हटा देंगे, जिनकी मठाधीशी का आधार पारिवारिक संबंध है।
- ये उनसे चंदा नहीं लेंगे जिनके कारोबार में परिवार लगा है।
- नाम के बाद आनेवाले पारिवारिक नाम (सरनेम) का प्रयोग बंद कर देंगे।
- जिनके भी परिवार हैं उनसे वोट नहीं लेंगे।
- सरकार ये नियम बना दे कि अधिकारी की बेटी या बेटा अधिकारी नहीं बनेगा; डॉक्टर का, डॉक्टर नहीं बनेगा, वकील और न्यायाधीश का एडवोकेट या जज नहीं बनेगा; पत्रकार का जर्नलिस्ट नहीं बनेगा, कारोबारी का कारोबारी नहीं बनेगा और मीडिया हाउस के मालिक की बच्ची या बच्चा मीडिया हाउस का मालिक नहीं बनेगा… इत्यादि।
- दानाजीवी मीडिया हाउस भी घोषित करें कि अपने परिवार के लोगों से मैनेजमेंट के सारे पद और शेयर वापस ले लेंगे और अपने एम्प्लॉयीज़ को दे देंगे। अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो उनके विरुद्ध भी शांतिपूर्ण जन आंदोलन करने का हक़ उनके एम्प्लॉयीज़ और जनता को होगा।
सच्चाई तो ये है कि भाजपा और उनके अपरिवारवादी संगी-साथी चाहते है कि परिवार तोड़ दिये जाएं, लोगों को अकेला कर दिया जाए, फिर उनको डराकर अपने प्रभाव में लेकर उनका शोषण किया जाए। भुखमरी, ग़रीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार, भर्ती-नौकरी, खेती-मजदूरी, काम-कारोबार, तंगी-मंदी जैसे मुद्दों पर लोग इकट्ठा न हो पाएं। ये सब नकारात्मक स्वार्थी लोग एकजुटता से डरते हैं और चूंकि परिवार एकजुटता की पहली सीढ़ी होते हैं, इसीलिए परिवार को नकारते हैं। परिवार, कुनबा, कुल जब सकारात्मक होकर एक-दूसरे से जुड़ते हैं तभी समाज बनता है। सच्चा समाज नकारात्मक लोगों के ख़िलाफ होता है, इसीलिए जब कोई चोर-डकैत गाँव-बस्ती में घुस आता है तो ये सारा समाज इकट्ठा होकर, एक होकर उसको खदेड़ देता है। भाजपाई और उनके संगी-साथी अंदर से डरे हुए लोग हैं, इसीलिए परिवार की बुराई करते हैं। इनका बस चले तो कल को ये शादी-विवाह भी बंद करवा दें जिससे कि परिवार बने ही नहीं यहां तक कि पारिवारिक एकजुटता की तस्वीरों को भी बैन कर दें।,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,कुछ स्वार्थी मीडिया हाउस भी चाहते हैं कि परिवार टूट जाएं और लोग अकेले पड़ जाएं जिससे अकेले लोग अलग-अलग घरों में रहें और उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिले, हर किसी का अपना टीवी, फ्रिज और बाक़ी सामान हो जिसकी बिक्री बढ़ाने के लिए कंपनियाँ अपना विज्ञापन करें और इनको विज्ञापन के लिए पैसे देकर, इनका ख़ज़ाना भरें। ये मीडिया हाउस बताएं कि ‘प्रायोजित समाचार, फ़ेक न्यूज़, एजेंडा-प्रोग्राम चलाने की दानापोषी व विज्ञापनों से कमायी गई अपनी अरबों की कमाई में से इन्होंने कितना परिवार को दिया और कितना अपने एम्प्लॉयीज़ को।
इन मीडिया हाउस और उनके पोषकों के अंदर इतनी नैतिकता तो होनी ही चाहिए कि जो लोग अब दुनिया में नहीं हैं उनको सम्मान के साथ प्रदर्शित करें। दिवंगतों के प्रति सम्मान की भावना रखना हमारी सांस्कृतिक परंपरा रही है। इन जैसे धनलोभी मीडिया हाउसों से पत्रकारिता के मान, मूल्य, मर्यादा और सैद्धांतिक सीमाओं की अपेक्षा करना तो व्यर्थ है लेकिन अपने देश की सांस्कृतिक पंरपरा की निरंतरता की रत्ती भर उम्मीद तो की जा सकती है या इनमें इतनी भी नैतिकता नहीं बची कि कम-से-कम गुज़रे हुए लोगों को तो अपनी ख़ुदगर्ज़ी का शिकार न बनाएं। सम्मान नहीं कर सकते तो अपमान भी न करें! क्या इस अपमान का आधार ये है कि ऐसे लोग शोषित-वंचित समाज से आते हैं? उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अंत में लिखा है कि अब पीडीए नहीं सहेगा, खुलकर कहेगा! हर परिवारवाले के दुख, दर्द, तकलीफ़ को अपना माननेवाला… हर परिवार की तरक़्क़ी, ख़ुशहाली और परिवारों से मिलकर बननेवाले समाज में अमन-चैन चाहनेवाला…
आपका
अखिलेश